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मंगलवार, 20 अप्रैल 2021

बेटे के महानगर में

 


 

 बेटे के महानगर में

कोई धरती, कोई आसमान नहीं

सिर्फ बॉलकनी है, जहाँ से दिखती हैं

यहाँ-वहां सरकती बौनों की कतार

दर्पण से विमुख, आपको हक है

मानते रहो खुद को विशालकाय गुलीवर.

 

बेटे के महानगर में

बहुत कुछ स्वचालित है

मौसम के मिज़ाज से लेकर

प्रेमपगा नगमा तक सुनाने वाला एलेक्सा है

तरह तरह की बातें

समय रहते याद दिलाने वाले उपकरण  हैं

कहीं कोई भूलचूक नहीं, सभी कुछ अचूक.

 

बेटे के महानगर में

सुकून भरे जिंदादिल घर-बार नहीं

बच्चों की किलकारियों से भरे आंगन  नहीं

एक दूसरे को चुपके-चुपके निहारती

लालसा भरी अलमस्त सरगोशियाँ नहीं

हाउसिंग लोन की ईएमआई का गुणा-भाग है.

 

बेटे के महानगर में

राजधानी के बगलगीर होने का

पराई हल्दी की गाँठ पा

पंसारी बन बैठने का बहुरुपियापन है

वीकेंड पर छीजती जिन्दगी रिचार्ज करने को

मसालेदार पानी-पूरी गटकने या

ठण्डी-ठार बियर पीने की बेमिसाल ऐय्याशी है.

 

बेटे के महानगर में

फोन या लैपटॉप में ऊँगलियां  फिराते ही

हुक्म बजा लाने वाले जिन्न मौजूद हैं  

वे कभी किसी बात पर सॉरी नहीं उच्चारते 

थैंक्यू कहे जाने की उम्मीद नहीं करते

अपने काम से काम रखते हैं.

 

बेटे के महानगर का

कोई मोहनजोदड़ो या हड़प्पा नहीं

सिर्फ सख्त खुरदरी बंजर जमीन है

जहाँ चीटियों तक ने अरसा हुआ आत्महत्या कर ली 

तितलियाँ ने मकरंद की आस स्थगित की

खुशबु और स्वाद बोतलबंद हुए.

 

बेटे के  महानगर में

उजाला खिडकियों में लगे कांच के पीछे रहता है

अँधेरा स्वेच्छाचारी है

उसके होने या न होने से कोई खास फर्क नहीं पड़ता

अलादीन का चिराग नदारद  हैं

उआज्ञाकारी जिन्न ही जिन्न हैं चारों ओर.

 

बेटे के महानगर में

कार्यकुशल रोबोट ही रोबोट हैं

शिनाख्त हरदम गले में झूलती  है

विविध पासवर्ड समय-असमय गुम हो लेते  हैं

उसका नाम वर्तमान की तरह ऑब्सलीट हुआ  

जिसे बताता वह बेवजह शरमाता है.

 

बेटे के महानगर में

मेरा बेटा वहां नहीं रहता

डाटा से लबरेज़ मैमोरी कार्ड रहता है

चाहे –अनचाहे

उसे खंगालने हमें  बार-बार

उसके पास प्राय: आना जाना होता है.

 

 


शुक्रवार, 29 जून 2018

बच्चे खेलते हैं


बच्चे क्लाशिनोकोव से खेलते  हैं
निकलते हैं मुंह से
तड़-तड़ ; गड़ -गड़ की आवाज़
खेल ही खेल में
वे धरती पर लोटपोट हुए जाते हैं
जिंदगी के पहले पहर में कर रहे हैं
मृत्यु का पूर्वाभ्यास .

खेलते हुए बच्चों  के भीतर
रगों के दौड़ते लहू को
जल्द से जल्द उलीचने की  आतुरता है
लड़ते हुए मर जाना
उनके लिए
रिंगा रिंगा रोज़ेस और
छुपम छुपाई से अधिक रोमांचक  खिलवाड़  .

बच्चे जिसे  समझते हैं खेल
वह खेल होकर भी दरअसल
खेल जैसा खेल है ही नहीं
अमन की उम्मीद और
रक्तरंजित धरती के संधिस्थल पर
अपरिहार्य युद्ध की आशंकाओं से भरी
एक खूंखार हिमाकत है.

बच्चे सिर्फ बारूद  से खेलना जानते हैं
हथगोले हमारे अहद की फ़ुटबाल हैं
कटी हुई गर्दनें हैं शांति की  रूपक
भुने हुए सफेद कबूतर
पसंददीदा पौष्टिक आहार
एटम बम को लिटिल बॉय कहते हुए
वे गदगद हुए जाते हैं .

बच्चे अब बेबात खिलखिलाते नहीं  
गुर्राते हैं ,हिंसक षड़यंत्र रचते
खेलते हैं घात प्रतिघात से भरे खेल
झपटते हैं एक दूसरे की ओर
नैसर्गिक उमंग के साथ
बच्चे सीख गये हैं 
मारने और मरने की खिलंदड़ी.

शुक्रवार, 25 सितंबर 2015

मेरी कविता में


मैं अपनी कविता में
कभी किसी को नहीं बुलाता।
मेरी कविता में
कोई सायास नहीं आ सकता।
इसमें जिसे आना होता है
वह आ ही जाता है
अनामंत्रित।
जैसे कोई मुसाफिर आ बैठे
किसी पेड़ के नीचे
उसके तने से टिककर
बेमकसद, लगभग यों ही।
बैठा रहे देर तक
अपनी ख़ामोशी को कहता सुनाता।

मेरी कविता में
डरे हुए परिदों और

मायूस बहेलियों के लिए
कोई जगह ही नहीं है।
पर अँधेरे में दिशा भूला
हर परिंदा यहाँ आ कर
जब चाहे अपना बसेरा बना ले।

मेरी कविता में
किसी की कोई शिकायत
आद्र पुकार या चीत्कार
या मनुहार कभी नहीं सुनी जाती।
इसके जरिये वशीकरण का
कोई काला जादू भी नहीं चलता।
यह किसी को कुछ नहीं देती
न कुछ माँगती है।
लेन देन का कारोबार इसे नहीं आता।

मेरी कविता में
कुटिल मसखरे अपनी ढपली
अपना राग लेकर नहीं आते।
न वीरता का परचम लहराते
योद्धाओं के लिए इसमें जगह है।
इसमें कोई मस्त मलंग जब चाहे
अपनी धुन में गाता गुनगुनाता
जब चाहे तब आ सकता है।

मेरी कविता में
इतिहास में रखे
नृशंस राजाओं के ताबूतों को
सजाने के लिए जगह नहीं।
अनाम फकीरों की
गुमशुदा आवाजों को सुनने के लिए
इसके कान तरसते हैं।

मेरी कविता में
ऐसा बहुत कुछ है
जो है परंपरागत समझ से बाहर
पर उपलब्ध सच के आसपास।
सच को सच मानने में
बड़ी दिक्कत है।

यकीन करें
मेरी कविता और मेरी जिंदगी में
बित्ते भर का भी नहीं है। 

रविवार, 20 सितंबर 2015

यात्रा में ...


रेलगाड़ी धडधडाती हुई लगातार दौड़ रही है

वह एक ही जगह सदियों से खड़ा है

उसे सांझ ढले घर पहुँचने की कोई जल्दी नहीं

न उसे यह बात ठीक से पता कि

रेलगाड़ी वाकई कहीं जा भी रही है

गति यात्रा का पुख्ता सुबूत नहीं होती.

 

रेलगाड़ी धडधडाती हुई लगातार दौड़ रही है

बगल वाली पटरी पर एक और रेलगाड़ी  

उसके बगल वाली पर भी शायद एक 

जितनी पटरियां उतनी रेलगाडियां  

होड़ से बाहर खड़ा तमाशबीन  

बड़ी एहतियात के साथ मुस्कुराता है.

 

रेलगाड़ी धडधडाती हुई लगातार दौड़ रही है

रेलवे फाटक पर तैनात गेटमैन

ईंट जोड़ कर बनाये चूल्हे पर

जल्दी जल्दी सेंक रहा है  रोटियां

पटरी किनारे के फाटक पर   

भूख और रेलगाड़ी कभी भी आ धमकती है  .

 

रेलगाड़ी धडधडाती हुई लगातार दौड़ रही है

प्लेटफार्म पर अजब हलचल है

पर नहीं है सफर खत्म होने का कोई चिन्ह 

पूछताछ खिड़कियों पर बिना कुछ जाने बूझे

लोग कर रहे हैं अपने से गुपचुप बातें

बातें और यात्राएँ कभी नहीं थमती है.

 

रेलगाड़ी धडधडाती हुई लगातार दौड़ रही है

खिड़की के पार गांव घर याद धुआं  

सब भाग रहे हैं विपरीत दिशा में

वह देख रहा है कनखियों से

जलती बुझती रोशनियों का खेल  

हर यात्रा का अपना तिलस्म होता है.

 

मोची राम

साइन लैंग्वेज और कटफोड़वा की खट-खट

महामारी के भीषण दिनों में उन लोगों ने बातून नौनिहालों को जबरन सिखवाया सिर्फ इशारों ही इशारों में अपनी जरूरत भर की बात कह लेना किसी मूक बघिर...