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शनिवार, 1 मई 2021

कैमरे की जद में करियर


 

फोटोग्राफ एक क्षण है-शटर दबाने के बाद, वह कभी लौटकर नहीं आता - रेने बरी

वह वहां खड़ा है कैमरा हाथ में थामे

शमशान में सीली हुई लकड़ियों से उठते धुंए को फोकस करता

अग्निशिखा के पार छज्जे पर खड़ी एक किशोरी

अपने भारी भरकम भाई को गेंद की तरह उछालती लपकती

उसके कैमरे के लेंस और दृष्टि की परिधि में है

हो सकता है एक दिन वह रघु राय जैसा

कोई नामवर फ़ोटोग्राफ़र बन जाये।

 

वह रोजाना यहाँ आ डेरा जमाता है आजकल

एक एक चिता की तफ़सील कैद करता

अपने उसी डिजिटल कैमरे में

जिसमें वह कभी अपने होंठ चबाता

दर्ज करता फिरता था किसी सुडौल मॉडल की देह के

प्रत्येक चक्रवात की हर बारीकी को सिलसिलेवार।

 

अख़बार के बाज़ार  में इन दिनों

मुर्दाखोर परिंदों, कीटों और धधकते शोलों की बड़ी डिमांड है

खौफ़ की मंडी  भयावह तस्वीरों से अंटी  है

सम्प्रति सुहाने सपनों का कोई तलबगार नहीं

मौत के पैने पंजे से बच निकलने के लिए

देशज नीमहकीमी नुस्खों की भरमार हैं।

 

बचा रहा  तो सुनहरे फ्रेम में जड़वा लेगा

सीना फुलाए योद्धा होने की प्रतीति देती निजी छवि

सच भले ही वक्त में बिला जाये

नयनाभिराम झूठ प्राय कालजयी होता है।

 

शमशान में कैमरा हाथ में लिए निर्लिप्त खड़ा वह

खटाखट उतार रहा है तस्वीरें

उसके मन के भीतर करियर का ग्राफ

भर रहा है कुलांचे

नैराश्यपूर्ण माहौल में

वह मन ही मन रॉबर्ट कापा* बनने का

दुर्लभ सपना देख रहा है।


#हंगरी में जन्मे अमरीका में पले बढे रॉबर्ट कापा शुरुआती दौर के उन दुर्लभ फोटोग्राफरों में सबसे प्रमुख हैं जिन्होंने युद्ध की विभीषिका को अपना विषय बनाया। 

 

 

 

रविवार, 25 अप्रैल 2021

आज अलसभोर

 







अलसभोर घर की छत पर खिंची

कपड़े सुखाने वाली प्लास्टिक की डोर पर

एकाकी चिड़िया चहचहा रही

वह वाकई चहचहा रही या

पुकारती अपनी बांधवी को , कौन जाने

दिन की शुरुआत का यह अप्रत्याशित तरीका है.

 

आज का बिना खुला अखबार

दरवाजे पर पड़ा बेवजह फड़फड़ाता है

उसके अंदरूनी पेजों  से

रिस रही है रह रह कर

गिद्धों के महाभोज की खबर

मुखपृष्ठ पर स्वादिष्ट स्वास्थ्यवर्धक

चाॅकलेट के आमद की महत्वपूर्ण सूचना है.

 

उसके हाशिये पर यकीनन छपी होंगी

उचित इलाज न मिलने के चलते मरे आदमी

बिलखते बच्चों और विलाप करती औरतों की तस्वीरें

गैस और प्राणरक्षक दवा के लिए

दर दर भटकते भाग्यविहीन लोगों की तकलीफों का  

सिंगल कॉलम व्यंग्यात्मक  विवरण भी होगा.

 

अखबार उठाते -खोलते मन डरता है

सुनाई देती है इसमें से

मंत्रोच्चार के साथ कूच करती हुतामाओं की

कूटनीतिक पदचाप

इस क्रूर और जटिल समय में

जीना भी हुआ लगभग हास्यास्पद.

 

बरामदे में रखी सरकंडे की कुर्सी पर बैठ

रोज सुबह सवेरे ख्याल आता है

बिना कुछ लिखे पढ़े

महज़ अटपटे अनुमानों, भदेस चुटकुलों और

अनमोल वचनों  के सहारे

जितना वक्त निरापद गुजर जाये

चैन की सांस  लेते, वही बेहतर.

 

 

 

रविवार, 4 अप्रैल 2021

राजा का सच


 कविता के लोकतंत्र में

राजा खुलेआम निकलता है
मौलिक नँगई का राजदण्ड लिए
नंगे को नंगा कहने वाला बच्चा
पोर्नोग्राफी पर निगाह गड़ाये है
ज़रा -सी फुरसत मिले
तो दोबारा सच बोले.

बुधवार, 14 अक्टूबर 2020

मेज़ पर रखा सफ़ेद हाथी

 


लिखने की मेज़ पर सफ़ेद हाथी है

उसके हौदे पर उगा है

हरेभरे पत्तों वाला मनीप्लांट

वह तिरछी आँखों से देख रहा

उँगलियों से उगते कविता के कुकरमत्ते

जल्द ही यहाँ उदासी की फ़सल पनपेगी.

 

गुलाबी फ्रॉक पहने एक लड़की टहलती चली आती है

रोज़ाना मेरी  बोसीदा स्मृति  के आसपास

मैं उसका नाम लिए  बिना

पूरी शिद्दत से उसे पुकारता  हूँ

वह देखते ही देखते तब्दील हो जाती है

किताब के पन्नों के बीच  रखे बुकमार्क में.

 

मेरे इर्दगिर्द न जाने क्या क्या है

प्यार की दीगर स्मृति जैसा कुछ

कभी किसी उदास उचाट दिन

कागज पर खींची  बेतरतीब लकीरों का ज़खीरा

ख़ुद को याद दिलाते रहने  के लिए

कूटभाषा में यहाँ वहां दर्ज़ चंद हिदायतें.

 

कोई समझा रहा

मेज पर हाथी पर सवार मनीप्लांट नहीं

लकी बैम्बू सजाओ या

जेड प्लांट या शमी का पौधा लगा लो

या  घोड़े के नाल के आकार वाले  पेपरवेट के नीचे  

अपना मुकद्दर  दबा  कर रख लो.

 

लेपटॉप के भीतर रखे पन्ने

भूल चुके  हैं हवा में फड़फड़ाना

उसमें सहेज कर रखी किताबें

कब करप्ट हो जाएँ,पता नहीं

मेज पर रखा सफ़ेद हाथी बिना हिलेडुले

शरारती  बच्चे सा हौले से हंसता है.

 

 

 

 

 

शुक्रवार, 11 सितंबर 2015

मेरे होने के मायने

मेरे न होने पर
कुछ नहीं बदलेगा
सब कुछ वैसा ही रहेगा
सब कुछ वैसा ही चलेगा
न सूरज अपने उगने की
दिशा बदलेगा
न चाँद अपनी कलाओं में
कोई हेरफेर करेगा.
और तो और नुक्कड़ वाला
मेरा दुकानदार मित्र
मुझसे वक्त ज़रूरत कर्ज मिल जाने की
उम्मीद मिट जाने के बावजूद
बदस्तूर दारू पीता रहेगा.

मेरे न होने पर
घर के बाहर लगे
गुलमोहर की पत्तियों का रंग
चटख हरा ही रहेगा
उनका रंग एक पल को
दिखावे में ही सही
पीला नहीं होगा
न उसके सुर्ख फूलों के रंग जर्द पड़ेंगे.

मेरे न होने पर
भरी दोपहरी में
हरदम तीखी आवाज़ में बतियाती
सेवन सिस्टर्स* का बालकनी में
रखे गमलों के इर्द गिर्द
पंचायत लगाना बंद नहीं होगा.
न मेरे घर का रास्ता भूल चुकी
गौरेया का पुनरागमन होगा .

मेरे न होने पर
बड़के का बात बात पर तुनकना
छोटे का दिन चढ़े तक सोते रहना
पत्नी का काम पर जाते हुए
घर के भीतर कुछ भूल जाने पर
वापस लौट कर आना
फिर खुद बंद किए ताले को
अविश्वास से निहारना बंद नहीं होगा.

मेरे न होने पर
चंद दोस्तों को क्षणिक बैचैनी होगी
जब वे अपने मोबाइल से
मेरा नम्बर डिलिट करेंगे
उन्हें अपनी ऊब से उबरने के लिए
किसी नए नम्बर को फीड करना होगा.
मेरे तमाम शुभचिंतकों का
मेरी उन्मुक्त हो चुकी रूह को
मशविरा देना बंद नहीं होगा.

मेरे न होने पर
बदलते मौसमों की हठधर्मिता पर
जरा भी फर्क नहीं पड़ने वाला
आवारा शोहदों का
सड़क से गुजरती लड़कियों पर
फब्तियां कसना यूं ही चलेगा
फेसबुक और ट्विटर पर
वक्तकटी का कारोबार बंद नहीं होगा.

मेरे न होने पर
जब कुछ नहीं बदलने वाला
तब मुझे अपने होने के मायने को
नए सिरे से खंगालना है
ताकि मेरे बाद अन्यत्र कारणों से
किसी को मेरी याद न आये.

(*भूरे रंग की चिड़ियाँ जो सात या नौ के समूह में रहती हैं और खूब चीं –चीं करती हैं.)

शनिवार, 19 जनवरी 2013

रामखिलावन जीना सीख रहा है

तवा चूल्हे पर था
रामखिलावन की तर हथेलियों पर
रोटी ले रही थी आकार
तभी सीधे गाँव से खबर चली आई
बड़के चाचा नहीं रहे .
अब वह क्या करे
रोटी बनाये
कुछ खाए या
फिर शोक मनाये .

रामखिलावन अपने गांव से इतनी दूर
अपनों को रुलाकर
उनकी  भूख की खातिर ही तो आया है
वह यहाँ गुलछर्रे उड़ाने
रोने बिसूरने नहीं आया .
वह कमाएगा तभी तो
कुछ खायेगा
घर गांव के लिए
उसमें से कुछ बचा पायेगा .


रामखिलावन गांव छोड़ चला तो आया
पर  उससे गांव छूटा कहाँ
वह यहाँ सुदूर शहर में आ धमकता है
खूबसूरत यादें  लिए
कभी आँखों के लिए पानी
तो कभी घर लौट आने की
मनुहार लिए
गांव से कभी सिसकियाँ आती हैं
तो कभी हौंसला
और कभी कभी दुखदायी ख़बरें भी .

रामखिलावन हठयोगी है
वह बिना हथियार के भी
लड़ना सीख चुका  है .
अपना काम करना कभी नहीं भूलता
वह दुःख सुख की
परंपरागत परिभाषा से
बाहर निकल आया है
पर निष्ठुर नहीं हुआ है वह .

रामखिलावन के भीतर
अभी भी उसका गांव बसा है .
जिसकी याद में वह सुबकता भी है
मन ही मन रीझता भी है
शोकाकुल भी होता है
वहां की हर अनहोनी पर .
पर वह अपने काम के समय
सिर्फ  काम करता है .

बाकी बचे खुचे समय में  वह वही
गांव  वाला रामखिलावन होता है
जिसे  बड़के चाचा का यूं चले जाना
बहुत  हिला देता है
पर उसके हाथ इस खबर को पाकर भी
थमते  नहीं ,रोटी बनाते हैं
वह रोटियों का मर्म जानता है
उन्हें खाए बिना तो
ठीक से रो पाना भी मुश्किल  है .

रामखिलावन बहुत उदास है
पर  वह जुबानी मातमपुर्सी के लिए
दौड़ा दौड़ा गांव नहीं जायेगा .
वह अब शहर में रह कर
सलीके से जीना सीख रहा है .












बुधवार, 16 जनवरी 2013

समय के होने का मतलब

समय कभी नहीं बीतता
वह निरंतर मौजूद रहता है
अपनी प्रखर अभिव्यक्ति के साथ
अतीत से भविष्य तक
जहाँ देखो वहां वह है
बदलते मौसमों
बदलते चेहरों और
उनकी बदलती भावभंगिमाओं को
मुँह चिढाता .
कोई चाहे या न चाहे
समय कभी असमय नहीं होता .

समय एक निरंकुश शासक भी है
बेहद संवेदनशील दोस्त भी
बात बात पर मुहँ बिसूर लेने वाला
हठी बच्चा भी
मन को बेचैन कर देने वाली
कहीं दूर से आती
किसी मलंग की वाणी भी .

समय अपनी उपस्थिति के लिए
किसी का मोहताज नहीं
न  किसी सत्ता का
न किसी दैवीय अनुकम्पा का
न किसी नक्षत्रीय व्यवस्था  का
न घड़ी की यंत्रवत सरकती सुइयों का या 
कलेंडर पर बदलती तारीखों का .

समय का अपना निजाम है
निजी  संविधान
अपनी न्यायप्रणाली
वैयक्तिक संवेदनशीलता
स्वैच्छिक   आकार
आराजक गतिशीलता
नितांत अपरिभाषित मौन
एकदम अपरिचित संगीत .

समय है इसीलिए सब कुछ है
गहरे अवसाद के भीतर धीरे धीरे बजती
आनंद की जलतरंग है
किसी घोंसले में आर्तनाद करते
भूखे  बच्चों के लिए
उनकी माँ की चोंच में
दबा चुग्गा है
और उसके पंखों में इतनी ऊर्जा
जो अपने बच्चों के पास आने जाने में
कभी चुकती नहीं .

समय  तटस्थ तो है
पर इतना निर्लज्ज  नहीं
कि आततायियों के साथ गलबहियां करे
किसी की भूख में चटखारे ले
किसी की उम्मीद के आखिरी दिए को
अपनी फूंक से बुझा कर अट्टहास करे .

समय किसी को नहीं बख्शता
वह  दबे पाँव चलता है.

सच भी यही है
समय हमेशा उनके साथ होता है
जो  उसके होने का मतलब
ठीक से समझते हैं .










मोची राम

साइन लैंग्वेज और कटफोड़वा की खट-खट

महामारी के भीषण दिनों में उन लोगों ने बातून नौनिहालों को जबरन सिखवाया सिर्फ इशारों ही इशारों में अपनी जरूरत भर की बात कह लेना किसी मूक बघिर...