बरसों बरस की डेली पैसेंजरी के दौरान रची गई अनगढ़ कविताएँ . ये कवितायें कम मन में दर्ज हो गई इबारत अधिक हैं . जैसे कोई बिगड़ैल बच्चा दीवार पर कुछ भी लिख डाले .
शनिवार, 25 दिसंबर 2021
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मोची राम
साइन लैंग्वेज और कटफोड़वा की खट-खट
महामारी के भीषण दिनों में उन लोगों ने बातून नौनिहालों को जबरन सिखवाया सिर्फ इशारों ही इशारों में अपनी जरूरत भर की बात कह लेना किसी मूक बघिर...
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चुप रहो चुपचाप सहो समझ जाओ जो चुप रहेंगे वे बचेंगे बोलने वालों को सिर में गोली के जरिये सुराख़ बना कर मार डाला जायेगा खामोश रहने वालो...
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लिखने की मेज़ पर सफ़ेद हाथी है उसके हौदे पर उगा है हरेभरे पत्तों वाला मनीप्लांट वह तिरछी आँखों से देख रहा उँगलियों से उगते कविता के ...
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