बुधवार, 23 अगस्त 2017

शेर और बकरी के बीच

यह समय कुछ ऐसा है
मैं सिर्फ दो तरह की कविता लिख सकता हूँ
जैसे सिक्का हवा में उछले
शेर आयेगा या फिर बकरी
तीसरी चौथी पांचवी या छठी
कोई सम्भावना नहीं.

शेर आया तो उपसंहार 
बकरी आई तो चूल्हा जला
बड़े दिनों के बाद
स्वाद को जिह्वा पर जगह मिली
मौत  और चटख भूख के बीच
सिर्फ अनंत खालीपन है.

आरम्भ से पहले अंत तय है
रंगों की पिटारी  में दो ही रंग हैं
सफेद या स्याह
पाप और पुण्य के मध्य
जीवन बेवजह थरथराता है
सब एक दूसरे की अनुकृति या प्रतिकृति हैं.

हाशिये के दोनों ओर
घुटने पर झुके लोग हैं
करना तो चाह रहे हैं प्रार्थना
पर केवल मिमिया भर रहे हैं
इस दोरंगी दुनिया में
शेर का बकरी के बीच 
रक्तरंजित उदासी  है.

उम्र के साथ –साथ


उम्र चेहरे तक आ गयी
कंठ में  भी शायद
लेकिन जिह्वा पर अम्ल  बरकरार है
शेष है अभी भी हथेलियों पर स्मृतियों  की तपन
वक्त के साथ सपने भस्माभूत नहीं होते
काफी कुछ बीत जाने पर भी
कुछ है यकीनन कि कभी नहीं बीतता.

देह बीत जाती है
रीत जाता है भीतर का पानी
इतने रूखेपन में भी
जरा –सा गीलापन ढूंढ कर
बची रह जाती है
चिकनी हरी काई और
निर्गंध बैंगनी  गुलाबी अवशेष.

उम्मीद आज  जीवंत सर्वनाम है
कामनाएं कल की पुरकशिश संज्ञा
कविताओं में अभी तक
शब्दों की आड़ में दिल थरथराता है
तितलियों के पीछे भागता बचपना
वक्त के संधिस्थल पर
मचाता है अजब धमाचौकड़ी.

समय की अंगुली पकड़
चलते चलते हम निकल आये
कितनी दूर
पतझड़ के मौसम में झड़ी पत्तियां
बहार की आमद पर करती हैं
बदलती रुत के साथ कानाबाती.

मंगलवार, 22 अगस्त 2017

आओ जुबान चलायें



मेरी देह पर हर उस जगह रिसते हुए घाव हैं
जहाँ मेरी थूक से लिथड़ी हुई जुबान को पहुंचना नहीं आता
जीभ पर तैरते हैं हजारों हज़ार या मिलियन ट्रिलियन विषाणु
घाव को चाटने में बहुत जोखिम है ,भाई
आओ दर्द से मुंह मोड़कर
पूरी बेशर्मी के साथ जुबान चलायें
इतिहास तटस्थ रहने वालों का जब गुनाह लिखेगा
यकीन करो ,तब उसके फुटनोट्स में
बड़बोलों की जयकार जरूर दर्ज रहेगी,
बोलना बड़ी बात है
हर जरूरी सवाल को घसीट कर
कविता के अंधकूप में उतर जाना
उससे भी अधिक आवश्यक है
जैसे आदमखोर घसीट ले जाते हैं
तड़पते हुए शिकार का गला दबाकर
किसी झाड़ी या दीवार या फिर
मंच के पीछे बने ग्रीन रूम में.
घाव चाटने से दुरुस्त नहीं होते
उनकी बड़े जतन से तुरपाई करनी पड़ती है
किसी रफूगर की चतुराई से
पूरना पड़ता है
रेशा रेशा कर हर किस्म की क्षुद्रता को
खून की सामन्ती शिनाख्त होने तक
किसी टीस का कोई मतलब नहीं होता.
जिनकी जुबान लम्बी है ,लचीली है
सधी हुई है ,पलट जाने में निष्णात है
कृत्रिम आग में तपाकर पैनाई हुई है
यह कविता उनके लिए नहीं है ,भाई
जाओ जाओ ,अपना काम करो
छोटे बच्चे ताली और
बड़े लोग मजे से बगले बजाएं.

बुधवार, 2 अगस्त 2017

कुर्सी बुनते हुए




कुर्सी बुनते बुनते
थकी हुई उँगलियाँ भूल जाती हैं
उम्र को गिनना 
तब प्लास्टिक के तानेबाने में
वक्त बिछाने लगता है चौकोर खानों की बिसात
तजुर्बे से लबरेज मन
गढ़ता है ख्वाबों का सिलसिला.

कुर्सी बड़ी निर्मम होती हैं
वे भेद नहीं करती
अपने पराये में
सबसे पहले झपटती हैं
हुनरमंद हाथों पर
ताजमहल की फ़िजाओं से निकल
तैरते हैं पूरी कायनात में
क्रूरता के लहुलुहान किस्से.

कुर्सी कभी कदीमी नहीं होतीं
उनको सजाना संवारना पड़ता है बार बार
कुर्सीसाज़ का कौशल
मौजूद रहता है
बिनाई कमजोर होने के बावजूद
चलती हुई सांसों और भूख के इर्दगिर्द.

कुर्सी शायद वही बुनते हैं
जिनको कभी नहीं आया
उस पर आसीन होने का सलीका
करीगर के थके हुए मायूस हाथ तो
अकसर पसर जाते रहे हैं
कुर्सी वाले के आगे.

आदमी और आदमी के बीच
कुर्सी किसी मसखरे की तरह ठहाके लगाती है
बुनकर तैयार होते ही
वह अपने बुनने वाले को
सबसे पहले दिखाती है
बाहर का रास्ता।

गुलाबी छतरी वाली लड़की


बंद खिड़की से छन कर
चला आया अनचीन्ही खुशबु का झोंका
जाती है शायद किसी पीर की शाही हवा  
खिड़की खोली तो दिखी गुलाबी छतरी वाली
बरसात और धूप से खुद को बचाती
बूंदे बादलों में हों तो हों
धूप छिपी बैठी मेघों की ओट में.


रोजाना पहले नमूदार होती है गंध
फिर दिल धड़कता है
प्यार से नम हो जाती हैं आँख
इसके बाद उम्र का ख्याल आता है
छाते पर चस्पा फडकते दिलों के सिलसिले
लडकपन की दहलीज तक जा निकलते हैं.

एक दिन ऐसा हो जाये
तेज हवा चले
बरसने लगे झमाझम बारिश
छाता उलट पलट होता उड़ जाए
वह दौड़ पड़े बेसाख्ता
जैसे भागती हैं हैरान मम्मियां
शैतान बच्चे के पीछे.

गुलाबी छतरी उड़ती चली जाए
तैरने लगे बहते पानी में
क़ागज की नाव की तरह
मन में ठहरा हुआ पानी
महकने लगे गुलाब जल बन कर.

फिर मैं अपने निरापद बरामदे में
आराम कुर्सी पर बैठा ऐसा भीगूँ
स्मृतियाँ हो जाएँ तरबतर
और अधिक भीगने के लिए
देह और कामनाओं का क्षेत्रफल
पड़ जाए थोड़ा कमतर.

गुलाबी छतरी के तले
पहुंचे हुए पीर का आस्ताना है
जहाँ मन्नतें रोज
अगरबत्ती की तरह गंधाती हैं
यहाँ वहाँ बंधे उम्मीदों के धागे 
रचते हैं रोज नया तिलिस्म.

सोमवार, 17 अप्रैल 2017

नदी और उसका अतीत


कल तक जहाँ नदी थी
वहाँ झींगुरों का अभ्यारण्य है
उनसे कहो
वे अपने मुकद्दर पर न इतराएँ
उन्नत किस्म के कीटनाशक
उन्हें ज्यादा देर तक  नहीं गाने देंगे.

कल तक जिसके जल में
मछलियाँ तिरती थीं रात दिन
इन्द्रधनुषी आभा लिए
उनके जीवाश्म अब
इतिहास की गीली मिटटी में
गहरे तक धंस हैं.

नदी की जगह उग आये हैं
इस्पात और कंक्रीट के
सभ्य और सुसंस्कृत फूल
जहाँ कमजोर मादाओं और मर्दों के समुच्चय
अपने अपने तरीके से
विकास की नीव रखने की जल्दबाजी में है.

नदी सूख गयी इक दिन
जल ने भर लिया
भाप होने का स्वांग
अब सिर्फ रुई जैसे बादल हैं
गरजते हैं  ,चमकते हैं  
बरसने के लिए बरसते नहीं है.

नदी के पास नहीं है
अब कलकल कर बहने 
निरंतर प्रावाहित होने की
कोई पुख्ता वजह
उसके पास गीली स्मृतियों के सिवा
अब कोई और अतीत है भी नहीं.

आनायास कुछ नहीं होता

कभी कुछ अनायास नहीं होता
न बीज धरती में स्थ होता है
न पंछी एक डाल से दूसरी डाल की ओर
उडान भरते हैं
न किसी लड़की के गाल
प्यार ,अपमान,तिरस्कार या गुस्से से
लाल भभूका हो तमतमाते हैं.

कभी कुछ हरदम मनचाहा नहीं होता
न सांस तयशुदा तरीके से चलती है
न शिराओं में उत्तेजना का रक्त बहता है
न केवल चाह लेने भर से
देह में सिहरन सी उठती है
न कोई आहट आकार ग्रहण करती है.


कभी कुछ सही समय पर याद नहीं आता
होठों पर मुस्कान पहले आ जाती है
वजह अनुमान की ओट में रह जाता  है
उन्माद दिल में धडकने लगता है
मुस्कराहट  की गहरी परत के पीछे का अतीत
अपनी भनक तक नहीं लगने देता.

कभी कुछ योजनाबद्ध तरीके से नहीं होता
समय कभी कदमताल नहीं करता
बीतने का बावजूद ढेर सा वर्तमान
बचा रह जाता है वक्त की परिधि के बाहर
कामनाओं  के लिपेपुते चेहरो पर 
उम्र की शिनाख्त अनचाहे ही सही
बार बार हस्ताक्षर बनकर उभरती  हैं.

अनायास फिर भी कितना कुछ बीत जाता है
किसी के आने जाने की पदचाप तक सुनाई नहीं देती.



मंगलवार, 21 मार्च 2017

निशब्दता की मुनादी


थक गया हूँ शायद
सरकंडे की कुर्सी पर बैठा अकेला
अब तो कोई यह भी नहीं कहता
परे सरको हमें भी दो  
टिकने लायक जगह
रिक्तता ऐसी जैसे निशब्द बियाबान.

लिखने के लिए स्निग्ध कागज है
बेहतरीन कलम है
बिना स्याही में डुबाये
फरफर हवा की तरह चलने वाली
हवा है ही नहीं जो उड़ा ले जाए पन्ने
पर अक्षर हैं कि शब्द में बदलते ही नहीं.

बंद खिडकियों के पल्ले निस्तब्ध हैं
गमले में खिले निर्गंध फूलों तक आ पहुंची
तितलियाँ हैरान हैं
रंग हैं पर उड़ान का कौतुहल नदारद है
पौधों की परछाईंयों में
सुकून का अतापता नहीं.

रोशनदान में ठुंके हैं
दफ्ती के अवरोधक
रौशनी की लकीरें
खड़ी हैं घर के बाहर
उदासी का पुनर्पाठ करती
पता नहीं कबसे हांफती हुईं सी.

यह दरअसल थकन का नहीं
हवा पानी गंध और तितलियों के लिए
जिंदा रहते हुए भी
वक्त से पहले मर जाने की मुनादी है
चरमरा रही है कुर्सी
यकीनन बिखर जायेगी तिनका तिनका होकर.



शनिवार, 3 सितंबर 2016

साठ पार का आदमी


साठ पार के आदमी को
घुटने मोड़ कर चारपाई पर बैठे रहना चाहिए
उठते बैठते हर बार
जोर से कराहना चाहिए
फूल तितली खुशबु और प्यार की बात
मन ही मन बुद्बुदाना निषेध है. .

उसे अतीत की चादर को कस कर जिस्म से
हरदम लपेटे रहना चाहिए
उसकी देह से पसीने और उदासी की गंध
हर समय आनी चाहिए
गमन की भविष्यवाणी करनी चाहिए
रोज मौसम विभाग की तरह.

उसे अपने अंतिम क्षणों का रिहर्सल
नियमित रूप से करना चाहिए
लोगों को हरदम यकीन दिलाना चाहिए
कि बस कुछेक दिन की बात और है
उसे करनी चाहिए
 
जीने से अधिक
सिर्फ मरने की फ़िक्र.

उसे हर उबासी के साथ दोहराना चाहिए
प्रभु बहुत हुआ अब तो उठा ही ले
फिर सहमते हुए आसमान की ओर देखना चाहिए
कहीं आसमान के कान तो नहीं उग आये
प्रार्थनाओं को करते हुए
इस कदर जल्दबाज़ी करना ठीक नहीं.

साठ की दहलीज लांघते हुए
जोड़ घटा का अंकगणित भूल जाना चाहिए
जिस्म को छोड़ देना चाहिए अकेला
हर बात पर बेबसी की नुमाइश करते हुए
इस तरह हंसना चाहिए
कि वजह का सुराग तक किसी को न मिले.

साठ पार के आदमी को
कायदे से तो किसी कौए की तरह
उतर जाना चाहिए निर्जन बियाबान में
जहाँ आवाजें खो जाती हों
द्रुम लताओं की गहराइयों में
पत्तियां हवा के झोंकें में भी सरसराती न हो.

साठ पार गया आदमी
कोई अलार्म घड़ी नहीं रखता
 
यदि होती भी है तो
वह उसके जाग जाने के बाद बजती है
कलगी वाला मुर्गा बांग देने के मामले में
उससे रोज हार जाता है.
उसके हर कथोपकथन में होती हैं
निजी जीवन से जुड़ी
 
झूठ से लबरेज शौर्य गाथाएं
जिनका पुनर्पाठ करते
वह कभी नहीं थकता
कंठस्थ कर लेता है.

साठोत्तर का आदमी
दरअसल बड़ा शातिर होता है
उम्र भर एकत्रित की गयी चालाकियों का
बखूबी इस्तेमाल करता है
हर जरूरी गैर जरूरी बात पर
बेवजह बेआवाज़ सुबकता है.
वह बड़ी शिद्दत से
वक्त के सरोंते से
काट पाता है एक एक दिन को
कठा सुपारी की तरह.

अपना पूरा नाम और
असल उम्र बताने में हकलाता है.
साठ पार का आदमी वक्त रहते
निश्ब्द्ता के आरपार चला जाना चाहता है.


गुरुवार, 14 अप्रैल 2016

कबाड़खाने में


किताबों के ढेर में से
अपने लिए एक अदद किताब ढूंढना
वैसा ही है जैसे
कलकल कर बहती नदी में से
चुल्लू भर निर्मल जल
भर लेने की हठ करना.

जहाँ तहां कागज के पुर्जों पर लिखी 
कविताओं में से
एकाध आधी अधूरी पंक्ति
तलाश लेना भी वैसा ही है
जैसे पा जाना
अपनी आत्ममुग्धता के लिए  
कोई भूला बिसरा टोटका.

मन के सघन वर्षावन में
रोज उगते हैं अनगिन
नीले पीले बैंगनी फूल
मादकता का नया मुहावरा गढ़ते
कंटीले अहसास के साथ
स्मृतियों को लहूलुहान करते.

वक्त की हथेली से झड़ रही है उम्र  
बेआवाज़ बेसाख्ता 
कामनाएं मौजूद हैं देह में
पूरी ढिठाई  के साथ
समय सिद्ध नुस्खों की पाण्डुलिपि के
जर्जर पन्नों  को  पलटती.

वक्त  के कबाड़खाने में
सीलन है ,अँधेरा है
ठण्डक है ,आद्रता है  
शरीर में झुरझुरी पैदा करती.
ऐसे में हो जाती हैं अक्सर
पढ़ी लिखी बातें बेकार.

शनिवार, 6 फ़रवरी 2016

माँ को याद करते हुए ..................


उस रात जब अँधेरा बहुत घना था
मौसम ज़रा गुनगुना  
माँ ने अपने सर्द हाथों में थाम
मेरे हाथ को कहा  
अरे तू तो तप रहा है भट्टी सा
उसके यह लफ्ज़ मेरे कान तक पहुंचे
और बिखर गये आँखों से
पिघलते आइसक्यूब की तरह पानी बन कर.

उस रात पहली बार उसने कहा
सरका दो खिडकियों पर लगे मोटे परदे
मैं देखना चाहती हूँ कालिमा में भी 
बगीचे में खिले वासंती फूलों की आभा
आसमान में तिरते खूबसूरत पंछी
और परस्पर उड़ान की होड़ में लगी
बहुरंगी पतंगों का तिलिस्म.

उस रात उसके कहते ही
खिडकियों के पट चौपट खुल गये
रोशनदान के लाल पीले नीले कांच से छनकर
फुदकने लगा चांदनी  का रूपहला छौना
उसकी चारपाई पर बिछी चादर की सिलवटों पर
पूरा कमरा भर गया मौसमी फलों की सुवास से.

उस रात उसने कहा
जा जल्दी ले आ थोड़े से लौकाट मेरे लिए
बड़ी भूख लगी है मुझे
तेरे पिता होते  ले आते
लाहौर वाले क़ादिर के बाग़  से
रुमाल में बाँध रस से चुह्चुहाते फल.

उस रात माँ देखती रही सघन अँधेरे में
रोशन उम्मीदों के सपने खुली आँखों   
बाट जोहती मेरे पिता की
प्रेमपगे उलहानों के  साथ  
पूछती रही मुझसे निरंतर
क्या रेडियो पर आनी बंद हुई युद्ध की खबरें
क्या आज भी डाकिया नहीं लाया
उनकी कोई खोज खबर.


उस रात वह अचानक चली गयी
मेरे हाथों में सौंप
अपनी यादों और इंतजार की अकूत विरासत
अँधेरे और रोशनी के आरपार
मैं उसके ठंडे हाथों को
अपनी रूह में सम्भाले रोज पूछता हूँ.  
क़ादिर के बाग़ का पता.






मोची राम

साइन लैंग्वेज और कटफोड़वा की खट-खट

महामारी के भीषण दिनों में उन लोगों ने बातून नौनिहालों को जबरन सिखवाया सिर्फ इशारों ही इशारों में अपनी जरूरत भर की बात कह लेना किसी मूक बघिर...