बरसों बरस की डेली पैसेंजरी के दौरान रची गई अनगढ़ कविताएँ . ये कवितायें कम मन में दर्ज हो गई इबारत अधिक हैं . जैसे कोई बिगड़ैल बच्चा दीवार पर कुछ भी लिख डाले .
रविवार, 23 मई 2021
मई महीने की कविता
गुरुवार, 20 मई 2021
फिसलता वक्त
एक-एक कर छूटती जा रही
मनपसंद आदत, शानदार
शगल, दिलफ़रेब लत
जीवन में गहरे तक समायी
अराजकता
जब तब उदासी ओढ़
लेने का हुनर और
कहीं पर कभी भी
बेसुध नींद में उतर जाना
मानो मन ने भुला दिया अरसा हुआ।
उम्र फिसल रही है
हाथ से धीरे-धीरे..
बहुत दिनों तक हर
फ़िक्र को
बेहद लापरवाही से
धुंए में उड़ाया
मन बेवजह मुदित
हुआ तो
नुक्कड़ वाले
हलवाई के यहाँ जा जीम आये
दौने में धर दो
चार इमरती
देर तक पानी न
पिया कि
जीभ पर टिका
स्वाद तत्क्षण गुम न जाये।
ढेर सारी हिदायत
तमाम परहेज
हर सांस के साथ
तरह-तरह की नत्थी शर्तें
जिन्दा बने रहने
को बार-बार करना हो
प्राणांत का
फुलड्रेस रिहर्सल
देह से गमन ऐसा
जैसे अमरत्व का कोई स्वांग.
मरना जीने से भी जटिल हुआ मानो।
रविवार, 9 मई 2021
एक बार
एक बार बस एक ही बार
गुरुवार, 6 मई 2021
अतीत और इतिहास
लड़कियों के ख्वाब
कोई कहीं
घुमाती होगी सलाई
रंगीन ऊन के गोले
बेआवाज़ खुलते होंगे
मरियल धूप में बैठी
बुनती होगी
एक नया इंद्रधनुष.
लड़कियां
कितनी आसानी से उचक कर
पलकों पर टांग लेती हैं
सतरंगे ख्वाब.
अलविदा
बैग पैक करते हुए
उसने हवाओं से कहा
शायद आखिरी बार
तो अब?
इसका जवाब सादा था
पता था हमें
कहना बड़ा मुश्किल.
अलविदा .....
दुनिया का सबसे अधिक
जिंदा जावेद और जटिल लफ्ज़ है.
तितली और तानाशाह
उसके होठों के नीचे
तितली हमेशा बैठी मिली
तानाशाह कहाँ छुपाये रहा
उम्र भर अपना प्यार
और खिला हुआ
मकरंद से भरा गुलाब.
कविता और साजिश
इतिहास के पन्नों के बाहर
खांटी सच के इर्द -गिर्द
साफ़ लफ्जों में दर्ज है
कमोबेश हर तानाशाह
विध्वंस के मंसूबे बनाता
लिखता रहा
उसके हाशिये पर कवितायें.
कविता हमारे अहद की
सबसे खतरनाक साजिश है.
मंगलवार, 4 मई 2021
अभी अभी
अभी अभी एक लड़की नहा
कर गीले बाल लिए छत पर आई है
जहाँ तेज धूप से
लिपटी गर्म हवा, धूल के कण और उचाट उदासी है
सामने वाले घर की खिड़की
अधखुली है
जहाँ हमेशा एक दुबला
लड़का हथेली पर चेहरा टिकाये रहता है
कहते हैं कि सदियों
से वह वहां खड़ा
आती जाती लडकियों की ओर नि:शब्द फब्तियां उछालता है
कभी कभी उसकी
युक्तियों कामुकता भरी होती है
फिर भी उस लड़के के होने
भर के अनुमान से
कतिपय मादा देह रह-रह
कर सिहर-सिहर उठती हैं.
अभी अभी भरी दोपहर
में गली के दूसरे सिरे से
कुत्तों के गुर्राने
और बिल्लियों के रोने की भ्रामक आवाजें आई हैं
अपने एकांत में घिरा
घर का इकलौता बुजुर्ग सोचता है
हरदम गली में चिल्ल-पों
करते बच्चे कहाँ गुम हुये यकायक
वे छुपम-छुपाई खेलते
कहीं बड़प्पन की तलाश में
वक्त की अल्पज्ञात दिशाओं
में तो नहीं निकल गये
गली में फैली सूखी पत्तियों के ऊपर से
किसी अपशकुन की तरह दूर सड़क से हूटर बजाती एम्बुलेंस गुजरी है.
कोई कहीं कोने में
चुपचाप खड़े आदमी से कोई पूछ रहा है
ए , तू यहाँ क्यों
खड़ा , मंशा क्या है
यहाँ तेरे लायक कोई
नहीं दूर दूर तक
वैसे तेरी उम्र क्या
है ?
आदमी खड़ा खड़ा उँगलियों
पर गिनने लगा
अतीत के स्याह सफ़ेद
पन्ने
बोला, तुमने तो यह क्या
काम दे दिया मुझे
अब बाकी बची उम्र तो
बेसाख्ता बीत जाएगी
समय की गिनतियों को
जोड़ते-घटाते-मिटाते.
छोटे से शहर में
आजकल सिर्फ दीवारे ही दीवारें हैं
कोई खुलेआम यहाँ ताकाझांकी
नहीं करता
हर सुगबुगाहट से बुरी
खबर आती है
किसी घर के भीतर
खाली बर्तनों से भूख रिसती है
बच्चे रोते-पीटते झपटते
हैं एक दूसरे पर
उन्होंने चमत्कारिक
मदद के लिए
आसमान की ओर ताकना
छोड़ दिया है
वहीँ कहीं एक घर ऐसा
भी है
जिसके अंदर की बेमकसद
ठण्डक में गलीचे पर लेटे
भरपेट खाए-अघाए लाला-लालाइन
खेलते हैं लूडो
सोचते हैं,आओ चलो हँसते खेलते दबे पाँव
अपने वक्त के आरपार
निकल जाएँ.
शनिवार, 1 मई 2021
कैमरे की जद में करियर
फोटोग्राफ एक क्षण है-शटर दबाने के बाद, वह कभी लौटकर नहीं आता - रेने बरी
शमशान में सीली हुई
लकड़ियों से उठते धुंए को फोकस करता
अग्निशिखा के पार
छज्जे पर खड़ी एक किशोरी
अपने भारी भरकम भाई
को गेंद की तरह उछालती लपकती
उसके कैमरे के लेंस
और दृष्टि की परिधि में है
हो सकता है एक दिन
वह रघु राय जैसा
कोई नामवर
फ़ोटोग्राफ़र बन जाये।
वह रोजाना यहाँ आ
डेरा जमाता है आजकल
एक एक चिता की तफ़सील
कैद करता
अपने उसी डिजिटल
कैमरे में
जिसमें वह कभी अपने
होंठ चबाता
दर्ज करता फिरता था किसी
सुडौल मॉडल की देह के
प्रत्येक चक्रवात की
हर बारीकी को सिलसिलेवार।
अख़बार के बाज़ार में इन दिनों
मुर्दाखोर परिंदों, कीटों
और धधकते शोलों की बड़ी डिमांड है
खौफ़ की मंडी भयावह तस्वीरों से अंटी है
सम्प्रति सुहाने सपनों
का कोई तलबगार नहीं
मौत के पैने पंजे से
बच निकलने के लिए
देशज नीमहकीमी नुस्खों
की भरमार हैं।
बचा
रहा तो सुनहरे फ्रेम में जड़वा लेगा
सीना फुलाए योद्धा
होने की प्रतीति देती निजी छवि
सच भले ही वक्त में
बिला जाये
नयनाभिराम झूठ प्राय
कालजयी होता है।
शमशान में कैमरा हाथ
में लिए निर्लिप्त खड़ा वह
खटाखट उतार रहा है तस्वीरें
उसके मन के भीतर करियर
का ग्राफ
भर रहा है कुलांचे
नैराश्यपूर्ण माहौल
में
वह मन ही मन रॉबर्ट कापा* बनने का
दुर्लभ सपना देख रहा
है।
#हंगरी में जन्मे अमरीका में पले बढे रॉबर्ट कापा शुरुआती दौर के उन दुर्लभ फोटोग्राफरों में सबसे प्रमुख हैं जिन्होंने युद्ध की विभीषिका को अपना विषय बनाया।
मोची राम
साइन लैंग्वेज और कटफोड़वा की खट-खट
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