रविवार, 13 सितंबर 2015

खचाखच भरी रेलगाड़ी

खचाखच भरे रेलगाड़ी के डिब्बे में
एक पैर पर अपना संतुलन बना  
उसने कर लिया  खुद को स्थगित
अब उसके सिवा सभी को है 
जल्द से जल्द घर वापसी की 
आकुल आतुरता .

खचाखच भरे रेलगाड़ी के डिब्बे में
गमकता है पसीना नमक की तरह
द्रव अपने बहने के लिए
जबरन रास्ते ढूंढ लेता है
आदमी के पास नहीं होता
ऐसा कोई विकल्प .

खचाखच भरे रेलगाड़ी के डिब्बे में
सब पहचानते हैं एक दूसरे को
लेकिन बने रहते हैं अनजान
तकलीफों की  निजता के बीच  
दूरियों का  होता  है 
अपना तिलिस्म  .

खचाखच भरे रेलगाड़ी के डिब्बे में
बजती है ढोलक झनझनाते  हैं मजीरें 
बंटते  है प्रसाद के बताशे
मिलता है सिर्फ उन्हीं  को
जो सबको धकिया देते हैं
अपनी आस्था के  बाहुबल से.

खचाखच भरे रेलगाडी के डिब्बे में
कोई न कोई पा लेता है
छत पर टंगे  पंखे की जाली पर
धूलभरी चप्पल को टिका
आलथी पालथी मारने की जगह
प्रजा  जानती है पादुकासीन होना .

खचाखच भरे रेलगाड़ी के डिब्बे में
जिंदगी कभी नहीं थमती
लोहे की पटरियों पर घिसटती है निरंतर
कोई रोज  पूछता है  आज से
क्या डिब्बा कल भी भरा होगा
आज की तरह खचाखच ?

कल रात

कल पूरी रात
आंखों से बहता रहा पानी
बाहर का अँधेरा भीतर चला आया
लेपटॉप पर  खोजता रहा
नींद को झपट लेने की
सिक्काबंद तदबीरें .

कल पूरी रात
बादल गरजते रहे रुक रुक कर
उमस ने पसीने में से नमक अलग किया
तकिये पर कढ़ी देख
गुड नाईट की इबारत
याद आई भूली बिसरी सुबह.

कल पूरी रात
मन के कारागार में हलचल रही
जल्लाद और जेलर
फंदे और तख्ते  परखते
करते रहे जश्न की तैयारी
उदासी के बंदनवार सजाते.

कल पूरी रात  
मुस्कुराने की कोशिश रही नाकाम
समय चलता रहा घड़ी में
बेखुदी  की मुंडेर पर दबे पाँव 
किसी ने नहीं पूछा
इस कदर खामोशी का  सबब.

कल पूरी रात
डायरी के पन्ने फडफडाते रहे
देहगंध के निराकार साये में
उम्मीदें नाचती रहीं  
मगन होकर
सुर ताल लय को धता बताती.

कल पूरी रात
रात हुई ही नहीं
अँधेरा घिरा रहा चारों ओर
कामनाओं की चादर ओढ़  
मौजूद रही कालिमा 
तमाम चुनौतियों के बीच..

मेरे पास....

मेरे पास छोटे छोटे सपने हैं
या कहूँ ख्वाहिशें
इनके पीछे पीछे दौड़ते
मन तो नहीं भरा 
भर आईं पिंडलियाँ .
देह की होती  है सीमारेखा.


मेरे पास उमंग है
या कहूँ दीवनापन
इसने कभी थकने न दिया
पूरी शिद्दत के साथ जिया
जीने का कोई तयशुदा
प्रारूप नहीं होता.

मेरे पास उतावलापन है
या कहूँ अधैर्य
धीमी राफ्तार वाला घटनाक्रम
खीझ से भर देता है
फास्ट फॉरवर्ड मोड में
आती हैं फर्जी तसल्लियाँ.

मेरे पास उत्सुकता है
या कहूँ उम्मीद के चंद कतरे
इनके जरिये कुछ नहीं होता
निराधार बतकही से सिवा
बंद कमरे में बहसियाते कापुरुष
क्रांति के सूत्रधार नहीं होते.
 .
मेरे पास घटाटोप अधेरा हैं
या कहूँ काला चकमक पत्थर
जिसमें से चमक का उठना निश्चित है
अँधेरा जितना सघन होगा
रौशनी उतनी अधिक होगी
कालिमा अधिक देर नहीं टिकती.

मेरे कोई निजी एजेंडा नहीं
या कहूँ खामोख्याली
मेरे भीतर कोई अजायबघर नहीं
न उसमें सजाने लायक कोई सामान
इतिहास रच संरक्षित करने की मूर्खता
मसखरेपन से इतर कुछ नहीं होती
++++

शुक्रवार, 11 सितंबर 2015

पहला सबक


हाथ में गुलेल लिए
एक शैतान बच्चा
गुज़रा गली से
और गली के पुराने
मेहराबदार मकानों की
मुँडेरों पर पसरे कबूतर
फुर्र से उड़े
और गायब हो गए
आकाश की गहराइयों में कहीं
बस, एक कौआ बैठा रहा
घर की अलगनी में
काँव-काँव करता
बच्चे को चिढ़ाता
कौआ जानता है-
गुलेल से पत्थर फेंकने की
संपूर्ण प्रक्रिया
शैतान बच्चे की
लक्ष्यवेधी क्षमता
और आपातकाल में
आपने बचाव के उपाय
कबूतर जानते हैं-
भरपेट दाना चुगना
गुटरगूँ-गुटरगूँ करना
ऊँचे आकाश में उड़ान भरना
और तीव्र गति से फेंके गए
पत्थर से
आहत हो धरती पर गिर जाना
इसके सिवा कुछ भी नही

मासूम कबूतरों की मृत देहों के सहारे
परवान चढ़ी है
शैतान बच्चे की क्रूरता
अब उसकी निगाह
फुर्र से उड़ जाने
वाले कबूतरों पर नहीं
कौए की चतुराई पर टिकी है
बच्चा सीख रहा है
गुलेल को पीठ के पीछे
छुपाकर
अपने मासूम चेहरे को
मासूमियत से ढाँप
दुनियादार होने का पहला सबक.

यही वक्त है

कुछ बच्चे खेल रहे हैं
छुपम छुपाई
इन बच्चों के मन में
नहीं है नवाब बनने की ख्वाहिश
इनके सपने निहायत आत्मघाती हैं.
उनकी जिद है कि
वे तो ऐसे ही खेलेंगे उम्र भर
बच्चे बड़े होने की जल्दी में नहीं हैं.

अधिकांश बच्चे जा चुके हैं
खेल की दुनिया से बाहर
इनके मन में राजे रजवाड़े सामंत
अहलकार, भांड, विदूषक बनने का
एक ऐसा ख्वाब है
जो पलक झपकने या नींद खुलने पर
कभी टूटने वाला नहीं है
बच्चे बड़े होने की जल्दी में हैं.

बच्चो ! इतना समझ लो
यदि यूं ही पढोगे लिखोगे
तब कुछ न बन पाओगे
न नवाब न कुछ और.
यदि ऐसे ही खेलते रहोगे
छुपम छुपाई
तुम एक दिन अकेले पड़ जाओगे
जिंदगी की दौड़ में
कोई तुम्हें ढूँढने न आएगा.

बच्चो ! खेल ही खेल में
कोई है आतताई जो
तुम्हारे बचपन पर घात लगाये बैठा  है
खुद मत छुपो, इन्हें ढूंढो
ठीक से पढों
और इन लोगों की मक्कारी लिखो.

यह सलीके से खेलने
ढंग से पढ़ने लिखने
लिजलिजे ख्वाबों को
कूड़ेदान में फेंक कर
अपने समय को
ठीक से समझने का
सही वक्त है.

सुबह ऐसे आती है

पुजारी आते हैं नहा धोकर
अपने अपने मंदिरों में
जब रात घिरी होती है.
वे जल्दी जल्दी कराते हैं  
अपने इष्ट देवताओं को स्नान
इसके बाद वे फूंकते हैं शंख
बजाते हैं घंटे घड़ियाल
सजाते हैं आरती का थाल
करते हैं आरती
गाते हैं भजन
उन्हें यकीन है कि
इतने शोरगुल के बाद
सुबह आ ही जायेगी
अँधेरे की चादर के पीछे से.

कमोबेश धरती के सारे धर्म
प्रतिदिन सुबह को औपचारिक रूप से
ऐसे ही बुलाते आये हैं
और उन्हें कलगी वाले  मुर्गे की तरह
सदियों से ग़लतफ़हमी है
कि सुबह उनके सद्प्रयासों से आती  है.

उन्हें नहीं मालूम कि
सुबह इस तरह से
किसी के बुलावे पर कभी नहीं आयी 
वह तो बिन बुलाए आ जाती है
कभी भी कहीं भी
जब कोई मासूम बच्चा नींद में
रात के अँधेरे से डर जाता है.
जब किसी बच्ची का मन
दिन के उजाले में
अपनी गली में इक्क्ल दुक्क्ल
खेलते हुए पूरी धरती को
नापने के लिए मचलता है.
जब रात को खाली पेट सोया आदमी
अपने फर्ज़ी सपनों से बाहर आकर
नए सिरे से जीने का अहद लेता है.

सुबह की पूरी कोशिश रहती है
वह भव्य देवालयों से पहले
जितनी जल्दी हो सके पहुंचे
गंदगी से बजबजाती उन कुरूप बस्तियों में
जहाँ बीमार बच्चों और
सुबकती हुई माओं की
आवाज़ें आती हैं.
और वहां के अंधकार को दे दे
निर्णायक मात.

सुबह बड़ी बिंदास होती है
अँधेरे से उसकी पुरानी अदावत है
वह उसके खिलाफ अपनी लड़ाई
खुद लडती है
और रोज लड़ती है
उसे अपनी लड़ाई में
किसी भी  धर्माचारी की
दखलंदाजी कतई पसंद नहीं.


सुबह उनके लिए बेनागा आती है
जिनके पास करने के लिए
कोई प्रार्थना भी  नहीं है.

मेरे होने के मायने

मेरे न होने पर
कुछ नहीं बदलेगा
सब कुछ वैसा ही रहेगा
सब कुछ वैसा ही चलेगा
न सूरज अपने उगने की
दिशा बदलेगा
न चाँद अपनी कलाओं में
कोई हेरफेर करेगा.
और तो और नुक्कड़ वाला
मेरा दुकानदार मित्र
मुझसे वक्त ज़रूरत कर्ज मिल जाने की
उम्मीद मिट जाने के बावजूद
बदस्तूर दारू पीता रहेगा.

मेरे न होने पर
घर के बाहर लगे
गुलमोहर की पत्तियों का रंग
चटख हरा ही रहेगा
उनका रंग एक पल को
दिखावे में ही सही
पीला नहीं होगा
न उसके सुर्ख फूलों के रंग जर्द पड़ेंगे.

मेरे न होने पर
भरी दोपहरी में
हरदम तीखी आवाज़ में बतियाती
सेवन सिस्टर्स* का बालकनी में
रखे गमलों के इर्द गिर्द
पंचायत लगाना बंद नहीं होगा.
न मेरे घर का रास्ता भूल चुकी
गौरेया का पुनरागमन होगा .

मेरे न होने पर
बड़के का बात बात पर तुनकना
छोटे का दिन चढ़े तक सोते रहना
पत्नी का काम पर जाते हुए
घर के भीतर कुछ भूल जाने पर
वापस लौट कर आना
फिर खुद बंद किए ताले को
अविश्वास से निहारना बंद नहीं होगा.

मेरे न होने पर
चंद दोस्तों को क्षणिक बैचैनी होगी
जब वे अपने मोबाइल से
मेरा नम्बर डिलिट करेंगे
उन्हें अपनी ऊब से उबरने के लिए
किसी नए नम्बर को फीड करना होगा.
मेरे तमाम शुभचिंतकों का
मेरी उन्मुक्त हो चुकी रूह को
मशविरा देना बंद नहीं होगा.

मेरे न होने पर
बदलते मौसमों की हठधर्मिता पर
जरा भी फर्क नहीं पड़ने वाला
आवारा शोहदों का
सड़क से गुजरती लड़कियों पर
फब्तियां कसना यूं ही चलेगा
फेसबुक और ट्विटर पर
वक्तकटी का कारोबार बंद नहीं होगा.

मेरे न होने पर
जब कुछ नहीं बदलने वाला
तब मुझे अपने होने के मायने को
नए सिरे से खंगालना है
ताकि मेरे बाद अन्यत्र कारणों से
किसी को मेरी याद न आये.

(*भूरे रंग की चिड़ियाँ जो सात या नौ के समूह में रहती हैं और खूब चीं –चीं करती हैं.)

मैं जरा जल्दी में हूँ

अब मैं जरा जल्दी में हूँ
मेरे पास इतनी भी फुरसत नहीं
कि बैठ कर किसी के पास
अपनी ख़ामोशी कह सकूँ
उसकी तन्हाई सुन सकूं.

मैं चींटियों की तरह
सीधी लकीर में चलता हुआ
अब उस मुकाम पर हूँ
जहाँ आसमान से टपकती
पानी की बूंदों से
अपने-अपने कागजी लिबास बचाने की 
मारक होड़ मची है.

अब मैं जरा जल्दी में हूँ
मेरे पास न जीतने को कुछ है
न गंवाने लायक कुछ
फिर भी निरंतर भागते जाना है
क्या पता कहीं बंटता हुआ मिल जाये
कोई ऐसा अनचीन्हा सुख
जिसके लिए कोई प्रतिस्पर्धा
कोई कतार न हो.

अब मैं जरा जल्दी में हूँ
मेरे पास अभी एकाध सपना बचा है
कुछेक सांसें हैं
उम्मीद के चंद कतरे हैं
यादों का कबाडखाना, 
गुमशुदा कल 
और लावारिस यकीन हैं
क्या पता कहीं मिल जाये
उम्मीदों का जादुई चिराग
बिन तेल बिन बाती जलता हुआ.

अब मैं जरा जल्दी में हूँ
मेरे पास आस है
जो कभी नहीं हुआ अब हो जाये
थोड़ा सा दुलार कहीं से मिल जाये
वो न मिले तो न सही
ऐसी कटार मिल जाये
जिससे कट जाएँ एक ही वार में
मेरे तमाम निरर्थक खौफ.
कायरता से लबरेज़ बहानेबाजी के कवच.
  
अब मैं जरा जल्दी में हूँ
धैर्य की सारी सीमा रेखाओं को
लाँघ कर चला आया हूँ
किसी नाटक का मूक दर्शक
मुझे नहीं बनना है
अपना नियामक खुद बनना है.

बहुत जी लिया इतिहास के ग्रंथों के
मानचित्रों के जरिये 
अब और नहीं रेंगना
अतीत की कंदराओं में
आधारहीन अनुमानों के सहारे.

अब मैं जरा जल्दी में हूँ
ऊबने, उंघने, अघाने  का
समय कब का रीत चुका है.
बिना कुछ किये मरने से बेहतर है

जल्दबाजी में कुछ करते हुए मर जाना .

सपना देखते हुए

उस दिन भी वही हुआ 
जो अमूमन रोज होता था
मुझे बस में आखिरकार मिल गई
खिड़की के पास वाली सीट
मैं उस पर पसर गया
और आँखें मूँद कर
तुरंत ही देखने लगा
कोई ऊलजलूल सपना.

उस वक्त सपने में मैंने क्या देखा
यह तो ठीक से याद नहीं
पर यह मुझे अच्छी तरह मालूम है
अपने सपने के भीतर
मैं बड़े एहतियात से मुस्कराया था
कि मेरी मुस्कान का कोई सुराग
किसी को बाहर न मिलने पाए

पर ऐसा हो न सका
और बगल की सीट पर बैठी
एक छोटी –सी बच्ची ने भांप लिया था उसे
और वह खिलखिलाई थी.
इस सलीके से
कि उसके हँसने को
केवल मैं ही सुन पाया था नींद में
और हो उठा था बेतरह असहज
जैसे कोई देख ले किसी को
उसकी निजता के बीच
दर्पण के सामने खड़े होकर
तरह तरह की मुद्राएँ बनाता.

बस चल दी, चलती रही
बच्ची कनखियों से मुझे देखती रही
और एक शब्द भी उच्चारित किये बिना
मुझसे कहती रही निरंतर
अंकल, देखो न वही सपना
जिसे देखते हुए आप
इतने खुश थे.

मैं उस नन्ही सी बच्ची को कैसे बताऊँ
सपनों की अपनी परिधि होती है
उसके पार निकल जाने पर
वह धुआं धुआं हो जाते हैं
किसी छलावे की तरह
और फिर कभी लौट कर नहीं आते.
पर मेरी बच्ची यह तो बता 

तुझे किसने सिखाया
सपनों की कूटभाषा को यूं पढ़ लेना ?

वह अभी अभी आया है

वह अभी अभी आया है
सात समन्दर को लाँघ
अपनी समृद्धि की कीर्ति ध्वजा फहराता
चमक दमक लहराता
माँ के लिए ढेर सारी डार्क चॉकलेट ,
दिव्य खुशबू में लिपटे टिशु पेपर ,
ब्लडप्रेशर मापने की मशीन ,
ग्लूकोमीटर और
अपनी कामयाबी के किस्से  लिए .

वह अभी अभी आया हैं
साकार हो गए सपनों  में तैरता हुआ
गुरुत्वीय आकर्षण को धता बताता  
माँ को विस्मित कर देने की चाहत लिए .

वह अभी अभी आया है
माँ को अपने आने की खबर दिए बिना
इस  उम्मीद के साथ कि
उसके बिना  बताये ही 
माँ उसके आने की भनक पा लेगी
और मिलेगी घर के चौखट पर खड़ी
सूती धोती के किनारे से
पनीली आँखों को पोंछती .

वह अभी अभी आया है
और हैरान है यह देख कर
माँ घर में मौजूद है
देख कर भी उसे न देखते हुए
एकदम खामोश
कुछ भी जानने सुनने
जताने के  मोह से परे
एक एक साँस को इस एहतियात से लेती
मानो वह निकल आई  हो देह  से परे .

वह अभी अभी आया है
माँ घर के अपने कमरे में
बिछी चारपाई के उड़न खटोले पर बैठ
निकल चुकी है परिलोक की सैर पर
जहाँ उसे  किसी की चाहत नहीं
किसी का इंतजार नहीं .

वह अभी अभी आया है
प्रवास का मिनट दर मिनट
पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम लिए
उसे वापस लौटने की कोई
हड़बड़ी  न होने के बावजूद
यहाँ से लौटना ही होगा
तय समय से पूर्व प्लेटफार्म छोड़ चुकी
रेलगाड़ी के मुसाफिर की तरह .

खबरनवीस

वह अजीब सा खबरनवीस है
दिन रात बीनता फिरता है खबरें
हत्या बलात्कार चोरी डकैती की
दुर्घटनाओं का साक्षी बनता
बारात और वारदात को
एक ही तरीके से सनसनीखेज़ बनाता. .


वह अजीब सा खबरनवीस है
पोस्टमार्टम को पीएम
प्रेस कांफ्रेंस को पीसी
अपने कम्पयूटर को मशीन
और खुद को अखबार मालिक के
कारखाने का पुर्जा बताता .


वह अजीब सा खबरनवीस है
सपने में भी सिर्फ हादसे देखता
हर अफवाह के पीछे दौड़ लगाता
गड़े हुए मुर्दे उखाड़ता
और उसे एक्सक्लूसिव बता कर
ब्रेकिंग न्यूज़ देता हुआ इतराता .


वह अजीब सा खबरनवीस है
360 डिग्री पर आँख घुमाता है
उल्लू की तरह आधी रात तक
गली कूंचों पगडंडियों पर उड़ान भरता
शब्दों से चटपटी स्टोरी और
खबरों के लिए मनभावन व्याकरण गढता .


वह अजीब सा खबरनवीस है
रात भर जागता
दिन चढ़े तक सोता
नींद पूरी न हो पाने की
किसी से शिकायत नहीं करता
वहाट्सअप के चुटकले पढ़ कर हंसता .


वह अजीब सा खबरनवीस है
खबरों के बीच रहते रहते
उन्हें ही रात दिन ओढ़ते बिछाते
उन पर धर कर भजिया खाते खिलाते
वह खुद ही बन चुका है
एक अखबार का आधा अधूरा पन्ना .


वह अजीब सा खबरनवीस है
बड़ी बड़ी बातें बनाता है
लेकिन रोज भूल जाता है
अपनी लगातार कंकाल बनती बीवी को
डॉक्टर को दिखाना
और बच्चों का स्कूल में दाखिला कराना .


वह अजीब सा खबरनवीस है
हर समय जल्दी में रहता है
उसके बच्चे बिना अक्षर ज्ञान किये
बड़े होते जा रहे हैं
वे पानी को पप्पा कहते हैं
और रोटी को अभी भी हप्पा .


वह अजीब सा खबरनवीस है
उसे पता है एक दिन उसे भी
किसी रद्दी अखबार की तरह
दरकिनार कर दिया जायेगा
वह अपनी उदासी की खबर में
किसी को साझीदार नहीं बनाता .

मोची राम

साइन लैंग्वेज और कटफोड़वा की खट-खट

महामारी के भीषण दिनों में उन लोगों ने बातून नौनिहालों को जबरन सिखवाया सिर्फ इशारों ही इशारों में अपनी जरूरत भर की बात कह लेना किसी मूक बघिर...