शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2015

मेरठ : एक समय ऐसा भी गुजरा


एक समय ऐसा भी गुजरा
जब मेरे शहर आया था श्रवणकुमार
कांधे पर बेंगी को संतुलित करता 
उसके पलडों में धरे
दृष्टिहीन और अशक्त माँ बाप को
तीर्थाटन के लिए ले जाता हुआ .
एक समय ऐसा भी गुजरा
जब रूपसी मंदोदरी जाया करती
अपनी सहेलियों के साथ चुहुल करती
गाती गुनगुनाती
निर्मल जलाशयों में स्नान करने जाती
निर्विघ्न निर्द्वन्द्व .
एक समय ऐसा भी गुजरा
जब हस्तिनापुर से कुरुक्षेत्र की ओर
कूच करती सेनाओं की पदचाप से
दहल उठा था सारा नगर
और लोग खोजते रह गए थे
धर्म और युद्ध के संधिस्थल .

एक समय ऐसा भी गुजरा
जब रणबांकुरे निकले थे सड़कों पर
तलवारें लहराते बारूद दागते
एकजुट एकमुश्त
आज़ादी के तरानों से
सोयी पड़ी इंसानियत को जगाते .
एक समय ऐसा भी गुजरा
जब शहर भर के मसखरे जा घुसे
इतिहास के पीले पन्नों में
और यहाँ की फिजाओं को
उन्होंने रंग डाला
बदनामी के पुनर्पाठ से .
एक समय ऐसा भी गुजरा
जब इतिहास पुरुष बना दिए गए
जातिगत गौरव के सुदर्शन चेहरे
श्रवणकुमार ने बेंगी को धरती पर पटक
माँ बाप को कर दिया
अपने नेह और वक्त से बाहर .
एक समय ऐसा भी गुजरा
जो ठीक से बीता नहीं
ठहरा ही रह गया
मेरे शहर की गंदगी से बजबजाती
संकरी गलियों में
किसी अश्लील किस्से की तरह .
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शनिवार, 15 नवंबर 2014

सच से भी ज्यादा

  
मुझे किसी ने बताया कि
जब कभी किसी ने किसी से प्यार करके
उसे जताने की कोशिश की
तभी उसने पहली बार ऐसा झूठ बोला
जो किसी सच से अधिक खूबसूरत था .

मुझे किसी ने बताया कि
झूठ के जरिये लिखी जाती रही हैं
सदा कालजयी प्रेम कथाएं
सच के नीले लिटमस पेपर पर तो
केवल अम्लता ही दर्ज होती है .

मुझे किसी ने बताया कि
झूठ प्रिज्म जैसा  होता  है
इसमें से उपजता है इन्द्रधनुष
सच का प्रभामंडल पारदर्शी होता है  
उसमें से कोई अक्स नहीं उभरता  .

मुझे किसी ने बताया कि
झूठ समय की शिला पर घिसते घिसते
सच जैसा आकार पा जाता  है
सच इतना सख्तजान  होता है
जहाँ है जैसा है पड़ा रहता है .

मुझे किसी ने बताया कि
झूठ न होता तो
दुनिया में एक भी कविता न होती
सच कभी किसी के लिए  
अभिनव रचने  की जिद नहीं  बनता  .

मुझे किसी ने बताया कि
झूठ के पास उम्मीद है
एक दिन सच में तब्दील हो जाने की
लेकिन सच का अहंकार
उसे टस से मस नहीं  होने देता  .

मुझे किसी ने बताया कि
जिंदगी को बिंदास जियो
झूठ और सच से इतर भी
एक भरीपूरी दुनिया है .
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शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

हमारे तुम्हारे बीच


हमारे तुम्हारे बीच
जब कोई सहमति नहीं थी
तब हमारे दरम्यान
बहती थी गीली हवा
देह को  बड़ी एहतियात से छूती .
तब हम अपनी निशब्दता में
किस कदर बतियाया करते
अधर स्थिर रहते
और चुम्बन की गर्माहट
सीधे दिल में उतर आती .
तब हमारे पास था कितना कुछ
अपनी ख़ामोशी में
लगातार सुनने सुनाने को
मन के भीतर बजती थी जलतरंग
निजता में निरंतर संलिप्त  .
तब हम चहलकदमी करते हुए
पहुँच जाते  क्षितिज तक
और तुम एड़ियों पर उचक कर
अपनी अंजुरी में भर लेती थीं
इन्द्रधनुष के सारे रंग .
तब हमारे पास थी फुर्सत
उन्मुक्त  कवितायें
मस्त हवाओं के साथ
कामनाओं के जंगल में
नाचने का उतावलापन  .
अब जब हमने बना लिया
अपनी देहों के बीच कामनाओं  का पुल
देखते ही देखते बहने लगी
एक चिड़चिड़ी नदी हमारे पैरों तले
सब्र और पुल का इम्तेहान लेती .

रविवार, 20 जुलाई 2014

रात के दस बजे


रात के सिर्फ दस बजे हैं
और शहर में बकायदा रात हो चुकी है
जिसके बारे में धारणा यह है कि रात होती ही इसलिए है
ताकि जैसे तैसे पेट को भर लिए जाने के बाद
चारपाई पर औंधे मुहँ गिर कर सोया जा सके
अगली सुबह उठने वाले सवालों से बेपरवाह
किसी भी तरह की उम्मीद को
जूठे बर्तनों  की तरह  कोने के हवाले करते  हुए .

रात के सिर्फ दस बजे हैं
जिंदगी के  कुछ अपरिहार्य  सबूतों के सिवा
अधिकांश  साक्ष्य गायब हो चुके हैं .
चंद सिरफिरे लोगों के मस्तिष्क की हांड़ी में
अँधेरे के खिलाफ बगावत के पुलाव पक रहे है
ये लोग फर्ज़ी सपनों के खिलाफ
लामबंद होने की कोशिश में हैं .
और इनकी नींद पर
सवालिया निशान लटका है .

रात के सिर्फ दस बजे हैं
राज्य के गुप्तचर गली गली घूम रहे हैं
जागते हुओं की हरारतों को सूंघते
 प्रत्यक्षतः सोये  हुए  शहर की धड़कन में
विस्फोट से पहले की टिक - टिक को सुनते .

रात के सिर्फ दस बजे हैं
शहर के घंटाघर पर लगी घड़ी
सदियों से दस बज कर दस मिनट ही बता रही है
यह  समय यहाँ  से होकर कब गुजरा था ,
दिन में बीता था या रात में
किसी को  न तो  पता है
और न जानने की दिलचस्पी है.
इस घड़ी के शीशे के बारे में
कम- से- कम मैं कुछ नहीं जानता .

रात के सिर्फ दस बजे हैं
अपने बसेरे से अंगडाई भर कर उड़ा चमगादड़
घड़ी की सुईं पर जा फंसा है
और इतिहास के पन्नों में अटका हुआ शहर
एक मासूम परिंदे की नादानी से
अनायास जाग उठा है .

रात के सिर्फ दस बजे हैं
लोगों को नीम अँधेरे में सुनाई दे रही है
एक चमगादड़ की फड़फड़ाहट .


तकिया


मैंने अपने तकिये पर
बड़े आहिस्ता से सिर टिकाया
दीवार पर टंगी घड़ी से उठती 
जिद्दी टिक - टिक को टोका
फिर लम्बी गहरी सांस ली
जिंदगी का एक दिन और
कम हो जाने का जश्न मनाया .
मैंने अपने तकिये पर
सिर टिकाये टिकाये अनुरोध किया
भईया भूलना मत
नींद और सपनों की फ़िक्र किये बिना
मुझे अल्लसुबह ही जगा देना
कल मुझे भरपूर जिंदगी जीते हुए
अनेक जरूरी काम निबटाने हैं .
मैंने अपने तकिये पर
हमेशा बहुत भरोसा किया है
और उसने मुझे कभी निराश नहीं किया
वह मेरे हर राज का राजदार है
उस पर अंकित है
मेरी आत्मकथा की हर इबारत
गम और जूनून की तफ़सील के साथ .
मैंने अपने तकिये पर
लिख रखा है अपना शोकगीत
इस यकीन के साथ कि मेरे बाद
जिन्दा बची नस्लें इसी पढ़ेंगी
और शोकाकुल होने की
वजह न पाकर खिलखिला पड़ेंगी .
मैंने अपने तकिये पर
अगले सात जन्मों की यात्रा का
मानचित्र टांक रखा है .

स्मृति का अस्तबल

स्मृति के अस्तबल में हिनहिना रहे हैं
बीमार  अशक्त और उदास घोड़े
अतीत की सुनहरी पन्नी में लिपटे
इन घोड़ों को यकीन नहीं हो रहा
कि वे वाकई बूढ़े हो चले  हैं |

रेसकोर्स में सरपट भागते भागते
वे भूल चुके थे स्वेच्छा से थमना
ठिठकना और ठिठक कर मुड़ना
पीछे घूम कर अपने फौलादी खुरों के साथ
निरंतर घिसते  हुए  समय को देखना.

घोड़े अपने सपनों में अभी भी दौड़  रहे हैं
बीत गए वक्त को धता बताते
असलियत के मुख को  धूलधसरित करते
अपनी जीत और जीवन का जश्न मनाते
यह  उनका  सच को नकारने का अपना तरीका है .

अस्तबल में खूंटे से बंधे बूढ़े घोड़े
अभी तक जब तब हिनहिना लेते हैं
ताकि शायद  उनकी कोई सुध ले
उन्हें लौटा दे  बीता हुआ वक्त
उमंग उत्साह और रफ़्तार |

 स्मृति के अस्तबल में
बीमार अशक्त और उदास घोड़े ही नहीं
अनेक अगड़म सगड़म चीजों के साथ
कुछ ऐसे दु:स्वप्न भी रखे  हैं
जिन्हें इत्तेफाक से
घोड़ों की तरह हिनहिना  नहीं आता |

और सबसे हैरतअंगेज़ बात यह कि
ये घोड़े आईने के नहीं बने हैं
फिर भी इनमें कभी कभी  मुझे
अपना अक्स दिख जाता है .

रविवार, 9 मार्च 2014

बिकाऊ


बिकाऊ 
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उसने मद्धम स्वर में कहा 
लगभग फुसफुसाते हुए 
मैं बिकाऊ नहीं हूँ मान्यवर 
सजेधजे बाजार की पारदर्शी खिड़कियों पर 
टकटकी लगाये लोगों ने 
उसे शक्की निगाह से घूम कर देखा 
और फिर मशगूल हो गए 
अपने हिस्से के सपनों के 
मोल तोल में .

उसने ऊँची आवाज में कहा
लगभग चीखते हुए 

फिर वही बात दोहराई हुए
मैं बिकाऊ नहीं हूँ मान्यवर
इस बार किसी ने
उसकी ओर मुड़कर भी नहीं देखा
समझदार खरीददारों के पास
ऐसे फालतू कामों के लिए
फुरसत नहीं हुआ करती .

इसके बाद वह हताश हो गया
वापस लौट आया बाजार से
हाथों में सीख का ठोंगा लिए कि
बाजार में सच्ची बातें
या उन्हें कहने का अंदाज़ नहीं
सिर्फ दुकानदार का काइयांपन ,
उसे परसने का सलीका
और हमारी आदमकद मूर्खताओं की
अनवरत तिजारत होती है .

शुक्रवार, 7 मार्च 2014

वसंत का इंतजार

वसंत का इंतजार 
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दीवार पर बेवजह टंगे कैलेंडर ने 
बता दिया समय रहते  
कि लो आ पहुंचा है वसंत 
इस बार भी 
तमाम विलोम परिस्थितियों के बावजूद 
 जैसे फांसी के तख्ते पर खड़ा आदमी 
ठहाका लगा कर हंस पड़े  
हाथ में रस्सी थामे जल्लाद के
मुहँ से बहती राल पर 
भिनकती मक्खियों को  देख कर .

वसंत को गुमशुदा हुए अरसा हुआ 
उसके आने की अफवाह बरस दर बरस चली आती है 
जर्द फूलों ,पंख फडफडाती बेरंग तितलियों
अविश्वास के  हरेपन से लिपटी वनस्पति   
और उदासी से लबरेज खुशबुओं के सहारे 
जैसे आ जाते हैं तमाम उत्सव 
अपने सदियों से तय समय पर 
निराशा के ढोल मजीरे पीटते .

वसंत की उस वासन्तिक आभा का 
इस सदी को बेसब्री से इन्तजार है  
जो बिना किसी तामझाम के 
उतर आती थी मन की 
अतल गहराइयों में चुपचाप 
जैसे जंगल में मोर के नाचते ही 
वहां के सन्नाटे में बज उठे 
कोई ऐसी  सिम्फनी  
जिसे सुन संगीत के प्रामाणिक ग्रंथों के पन्ने 
उसे दर्ज करने के लिए बेचैन हो जाएँ .

वसंत अब जब भी आएगा 
तब उसके आने की पूर्व सूचना 
किसी को नहीं होने वाली 
वह आएगा इतिहास प्रसिद्ध
रंगों की शिनाख्त को धता बताता 
पारंपरिक उपादानों  को मुहँ चिढ़ाता 
जैसे कभी मिथकीय युद्ध से लौटा था एक सम्राट 
अपने अहंकार को तिरोहित कर 
जिंदगी के नए मुहावरे के साथ . 

आओ प्रतीक्षा करें उस वसंत की 
जिसके आने के बाद बदल जायेंगे 
 समस्त शब्दकोशों में मौजूद 
सम्पूर्ण दुनिया के मायने ..

गुरुवार, 6 मार्च 2014

मोची राम

मेरी खिड़की के उस पार 
काली मटमैली सड़क के किनारे 
एक बूढ़े पीपल के तने के करीब 
फटेहाल छाते के नीचे 
जूते गांठने वाले मोचीराम की दुकान है .

सदियां बीत गईं 
दुकान और मोचीराम जस के तस है 
एक पल को भी नहीं हटे 
हर हाल में डटे रहे 
शाम ढले जब मोचीराम जाता है 
औजारों का झोला और छाता लपेट कर 
वह दुकान वहीँ मौजूद रहती है 
स्मृतियों के प्रस्तर पर जमी जिद्दी फफूंद की तरह .

मेरी खिड़की पर ठुँकी हुई है पतली जाली के 
हर बारीक सुराख़ में 
मौजूद है मोचीराम का अक्स
एकदम जीवंत दृश्यावली की तरह 
हरदम सक्रिय हरदम मुस्तैद 
अपने हाथ की उँगलियों से 
अपने वर्तमान को हौले हौले ठोंकता सिलता 
धूसर हौंसले को लगातार चमकाता हुआ .

मोचीराम कितने बरस का है 
किसी को ठीक ठाक तरीके से नहीं मालूम 
वह तब भी था जब पंडित नेहरु की मोटर कार 
सामने वाली सड़क से होकर गुजरी थी .
वह तब भी था जब सारा शहर 
सन सैंतालीस के दंगों में धूं –धूं कर जला था .
वह भी था जब जान बचाकर जाने कहाँ से चले आए थे 
हजारों औरत मर्द बच्चे चीखते चिल्लाते 
और डरे हुए हजारों लोग गुम हो गए थे 
रक्ताभ आंधी के थपेडों में . 

वह अट्ठारह सौ सत्तावन के 
गदर के दौरान भी था 
जब बूढ़े पीपल पर जा लटकी थी 
जुझारू लड़ाकों की मृत देह 
अबाबील के घोंसलों की तरह . 
शायद इससे पहले भी था मोचीराम 
इसके बाद भी है वह मौजूद रहेगा 
हर छोटी बड़ी वारदात का साक्षी बना 
अपनी पनीली आँखों को आस्तीन से पोंछता हुआ .

मोचीराम अजर है अमर है 
समय को बड़ी शिद्दत के साथ 
अपने से दूर ढकेलता हुआ 
अपनी छतरी को बड़ी जतन से सहेजता 
अपने मामूली से औजारों से 
जिंदगी की भीषण जंग लड़ता हुआ 
उसकी लड़ाई कभी खत्म नहीं होने वाली .

मोचीराम को देखते देखते 
मेरी ऑंखें बूढ़ी हो चलीं 
सब कुछ धुंधला धुंधला सा दिखता है 
पर इतना भर तो दिखता ही है 
कि वह खिड़की के आरपार अभी तक डेरा जमाए है 
वर्तमान के जूतों पर 
अपनी ऐतिहासिक समझ की पैबंद लगाता 
उसे दुरुस्त करने की पुरजोर कोशिश करता .

शुक्रवार, 30 अगस्त 2013

जब हम लौटेंगे


एक दिन
हमें लौटना होगा
जैसे आकाश छूती लहरों के बीच से
लौट आते हैं मछुआरे अपनी जर्जर नाव
और पकड़ी हुई मछलियों के साथ .
हमें लौटना होगा
जैसे लौट आते हैं योद्धा लहूलुहान
यह बता पाने में असमर्थ
कि वहां कौन जीता किसकी हार हुई .
हमें लौटना होगा
जैसे बहेलिये लौट आते हैं
अरण्यों से रीते हाथ
यह बताने में लजाते हुए
कि अब वहां अदृश्य परिंदे रहते हैं
जो निकल जाते हैं जाल के आरपार .
हमें लौटना होगा
जैसे दिन भर चमकने वाला सूरज
चला जाता है अस्ताचल में
अँधेरे को बिना बताये
निशब्द .
हमें लौटना होगा
जैसे एक थकी हुई लड़की
दिन भर यहाँ वहां भटकने के बाद
कोई निरर्थक गीत गुनगुनाती
चली आती है वीराने घर में .
हमें लौटना होगा
अपने अपने प्रस्थान बिंदुओं की ओर
यह सोचते हुए
आगामी यात्रा सुखद होगी .
हमें लौटना होगा
ठीक वैसे ही जैसे हमारे पुरखे
लौटा करते थे शमशान से
किसी आत्मीयजन को जला कर .
हमें लौटना होगा
एक दिन
खुद को इतिहास समझने की
ग़लतफ़हमी के साथ
जबकि होगा यह
हम फिर कभी नहीं लौटेंगे
.

सोमवार, 19 अगस्त 2013

कभी कभी : एक उदास दिन में लिखी कविताएँ




लाइब्रेरी में बैठ कर किसी एक
किताब को बांचना बड़ा मुश्किल है
कभी कभी शेल्फ में रखी तमाम किताबें
मुझे भी मुझे भी का कोरस गाती हैं .
+++
शेल्फ में रखी किताबों को
मैं बड़ी एहतियात से छूता हूँ
कभी कभी जरा सी लापरवाही से किताबें
बच्चों की तरह मुहँ फूला ल्रेती हैं .
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कल तक जो थीं  मेरे दिल के पास
आज वह रद्दी वाले के तराजू में हैं
कभी कभी किताबों का भी
आदमी -सा हश्र होता है .
+++
मैं किताबों को पढ़ता नहीं
उनसे बतियाता हूँ
कभी कभी लोगों को लगता है
मैं उम्र के साठवें पड़ाव पर हूँ .
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आतंकवादी से लेकर नेताओं तक की
दाढ़ियों में तिनके ही तिनके हैं
कभी कभी तिनकों से बने घोंसलों में
किंग कोबरा भी रहते हैं .
+++
 मैं हूँ पानी केरा बुदबुदा
अस मानुस की जात
कभी कभी नहीं हमेशा से
सिर्फ काक्रोच ही कालजयी होते हैं .



मोची राम

साइन लैंग्वेज और कटफोड़वा की खट-खट

महामारी के भीषण दिनों में उन लोगों ने बातून नौनिहालों को जबरन सिखवाया सिर्फ इशारों ही इशारों में अपनी जरूरत भर की बात कह लेना किसी मूक बघिर...