मंगलवार, 21 मार्च 2017

निशब्दता की मुनादी


थक गया हूँ शायद
सरकंडे की कुर्सी पर बैठा अकेला
अब तो कोई यह भी नहीं कहता
परे सरको हमें भी दो  
टिकने लायक जगह
रिक्तता ऐसी जैसे निशब्द बियाबान.

लिखने के लिए स्निग्ध कागज है
बेहतरीन कलम है
बिना स्याही में डुबाये
फरफर हवा की तरह चलने वाली
हवा है ही नहीं जो उड़ा ले जाए पन्ने
पर अक्षर हैं कि शब्द में बदलते ही नहीं.

बंद खिडकियों के पल्ले निस्तब्ध हैं
गमले में खिले निर्गंध फूलों तक आ पहुंची
तितलियाँ हैरान हैं
रंग हैं पर उड़ान का कौतुहल नदारद है
पौधों की परछाईंयों में
सुकून का अतापता नहीं.

रोशनदान में ठुंके हैं
दफ्ती के अवरोधक
रौशनी की लकीरें
खड़ी हैं घर के बाहर
उदासी का पुनर्पाठ करती
पता नहीं कबसे हांफती हुईं सी.

यह दरअसल थकन का नहीं
हवा पानी गंध और तितलियों के लिए
जिंदा रहते हुए भी
वक्त से पहले मर जाने की मुनादी है
चरमरा रही है कुर्सी
यकीनन बिखर जायेगी तिनका तिनका होकर.



शनिवार, 3 सितंबर 2016

साठ पार का आदमी


साठ पार के आदमी को
घुटने मोड़ कर चारपाई पर बैठे रहना चाहिए
उठते बैठते हर बार
जोर से कराहना चाहिए
फूल तितली खुशबु और प्यार की बात
मन ही मन बुद्बुदाना निषेध है. .

उसे अतीत की चादर को कस कर जिस्म से
हरदम लपेटे रहना चाहिए
उसकी देह से पसीने और उदासी की गंध
हर समय आनी चाहिए
गमन की भविष्यवाणी करनी चाहिए’
रोज मौसम विभाग की तरह.

उसे अपने अंतिम क्षणों का रिहर्सल
नियमित रूप से करना चाहिए
लोगों को हरदम यकीन दिलाना चाहिए
कि बस कुछेक दिन की बात और है
उसे करनी चाहिए
 
जीने से अधिक
सिर्फ मरने की फ़िक्र.

उसे हर उबासी के साथ दोहराना चाहिए
प्रभु बहुत हुआ अब तो उठा ही ले
फिर सहमते हुए आसमान की ओर देखना चाहिए
कहीं आसमान के कान तो नहीं उग आये
प्रार्थनाओं को करते हुए
इस कदर जल्दबाज़ी करना ठीक नहीं.

साठ की दहलीज लांघते हुए
जोड़ घटा का अंकगणित भूल जाना चाहिए
जिस्म को छोड़ देना चाहिए अकेला
हर बात पर बेबसी की नुमाइश करते हुए
इस तरह हंसना चाहिए
कि वजह का सुराग तक किसी को न मिले.

साठ पार के आदमी को
कायदे से तो किसी कौए की तरह
उतर जाना चाहिए निर्जन बियाबान में
जहाँ आवाजें खो जाती हों
द्रुम लताओं की गहराइयों में
पत्तियां हवा के झोंकें में भी सरसराती न हो.

साठ पार गया आदमी
कोई अलार्म घड़ी नहीं रखता
 
यदि होती भी है तो
वह उसके जाग जाने के बाद बजती है
कलगी वाला मुर्गा बांग देने के मामले में
उससे रोज हार जाता है.
उसके हर कथोपकथन में होती हैं
निजी जीवन से जुड़ी
 
झूठ से लबरेज शौर्य गाथाएं
जिनका पुनर्पाठ करते
वह कभी नहीं थकता
कंठस्थ कर लेता है.

साठोत्तर का आदमी
दरअसल बड़ा शातिर होता है
उम्र भर एकत्रित की गयी चालाकियों का
बखूबी इस्तेमाल करता है
हर जरूरी गैर जरूरी बात पर
बेवजह बेआवाज़ सुबकता है.
वह बड़ी शिद्दत से
वक्त के सरोंते से
काट पाता है एक एक दिन को
कठा सुपारी की तरह.

अपना पूरा नाम और
असल उम्र बताने में हकलाता है.
साठ पार का आदमी वक्त रहते
निश्ब्द्ता के आरपार चला जाना चाहता है.


गुरुवार, 14 अप्रैल 2016

कबाड़खाने में


किताबों के ढेर में से
अपने लिए एक अदद किताब ढूंढना
वैसा ही है जैसे
कलकल कर बहती नदी में से
चुल्लू भर निर्मल जल
भर लेने की हठ करना.

जहाँ तहां कागज के पुर्जों पर लिखी 
कविताओं में से
एकाध आधी अधूरी पंक्ति
तलाश लेना भी वैसा ही है
जैसे पा जाना
अपनी आत्ममुग्धता के लिए  
कोई भूला बिसरा टोटका.

मन के सघन वर्षावन में
रोज उगते हैं अनगिन
नीले पीले बैंगनी फूल
मादकता का नया मुहावरा गढ़ते
कंटीले अहसास के साथ
स्मृतियों को लहूलुहान करते.

वक्त की हथेली से झड़ रही है उम्र  
बेआवाज़ बेसाख्ता 
कामनाएं मौजूद हैं देह में
पूरी ढिठाई  के साथ
समय सिद्ध नुस्खों की पाण्डुलिपि के
जर्जर पन्नों  को  पलटती.

वक्त  के कबाड़खाने में
सीलन है ,अँधेरा है
ठण्डक है ,आद्रता है  
शरीर में झुरझुरी पैदा करती.
ऐसे में हो जाती हैं अक्सर
पढ़ी लिखी बातें बेकार.

शनिवार, 6 फ़रवरी 2016

माँ को याद करते हुए ..................


उस रात जब अँधेरा बहुत घना था
मौसम ज़रा गुनगुना  
माँ ने अपने सर्द हाथों में थाम
मेरे हाथ को कहा  
अरे तू तो तप रहा है भट्टी सा
उसके यह लफ्ज़ मेरे कान तक पहुंचे
और बिखर गये आँखों से
पिघलते आइसक्यूब की तरह पानी बन कर.

उस रात पहली बार उसने कहा
सरका दो खिडकियों पर लगे मोटे परदे
मैं देखना चाहती हूँ कालिमा में भी 
बगीचे में खिले वासंती फूलों की आभा
आसमान में तिरते खूबसूरत पंछी
और परस्पर उड़ान की होड़ में लगी
बहुरंगी पतंगों का तिलिस्म.

उस रात उसके कहते ही
खिडकियों के पट चौपट खुल गये
रोशनदान के लाल पीले नीले कांच से छनकर
फुदकने लगा चांदनी  का रूपहला छौना
उसकी चारपाई पर बिछी चादर की सिलवटों पर
पूरा कमरा भर गया मौसमी फलों की सुवास से.

उस रात उसने कहा
जा जल्दी ले आ थोड़े से लौकाट मेरे लिए
बड़ी भूख लगी है मुझे
तेरे पिता होते  ले आते
लाहौर वाले क़ादिर के बाग़  से
रुमाल में बाँध रस से चुह्चुहाते फल.

उस रात माँ देखती रही सघन अँधेरे में
रोशन उम्मीदों के सपने खुली आँखों   
बाट जोहती मेरे पिता की
प्रेमपगे उलहानों के  साथ  
पूछती रही मुझसे निरंतर
क्या रेडियो पर आनी बंद हुई युद्ध की खबरें
क्या आज भी डाकिया नहीं लाया
उनकी कोई खोज खबर.


उस रात वह अचानक चली गयी
मेरे हाथों में सौंप
अपनी यादों और इंतजार की अकूत विरासत
अँधेरे और रोशनी के आरपार
मैं उसके ठंडे हाथों को
अपनी रूह में सम्भाले रोज पूछता हूँ.  
क़ादिर के बाग़ का पता.






मंगलवार, 27 अक्टूबर 2015

शतदल में प्रकाशित कविताओं की समीक्षा

आजकल बहुत सी कविताओं में संवेदनाओं की जगह ज्ञान ने ले ली है। याने सभी उद्धव हुए बैठे हैं , अब कृष्ण कोई न रहा।
मेरा ऐसा सोचना भर था के मुझे शतदल के दो सो बयान्वे पन्ने पर चौपनवे कवि निर्मल गुप्त जी मुस्कुराते हुए मिल गए।
इनकी कवितायेँ पढ़ कर यकीन हो गया की सम्वेंदनाएं छुपी रह सकती हैं , लेकिन कभी मर नहीं सकती।
सच बिना संवेदनाओं के कविता तो जैसे मृत शरीर सी है। आइये पढ़ते हैं निर्मल गुप्त जी की शतदल में शामिल खुल कर सांस लेती चार खूबसूरत कवितायेँ "तब समझ लेना" , "तकिया " , "चाहत " और "रात के दस बजे" .
तब समझ लेना
,,,,,,,
"रोटी का पहला कौर तोड़ते हुए
जब खेत खलिहान में लहलहाती
दूध से भरी गेहूं की बालियाँ याद न आयें .
गर्म दूध को पीने से पहले
फूंक मार कर उसे ठंडाते हुए
गाय के थन में अपना जीवन टटोलते
बछड़े का अक्स सामने न उभरे ."
"रात के घुप्प अँधेरे में
सुदूर गांव से आती
सिसकियाँ और मनुहार
सुनाई देनी कतई बंद हो जाएँ .
गर्मागर्म जलेबी को खाते हुए
गांव वाली जंगल जलेबी का
मीठा कसैला स्वाद जिह्वा पर
खुदबखुद न तिर आये . .
तब समझ लेना
तुम चले आये हो
अपने घर बार से दूर
इतनी दूर
जहाँ से वापस लौट आने की
अमूमन कोई गुंजाईश नहीं रहती ."
आह ..... कितनी खूबसूरत कविता .... सही कहा सर आपने जिस दिन हम इन छोटी छोटी खुशियों को और इन नन्हे नन्हे दुखों को भूल जायेंगे ना जिसे ये दिल सहेजे बैठा है समझेंगे हम इंसान नहीं रहे पत्थर के हो गए हैं।
हम हमारी महत्वाकांक्षाओं के चलते अपनी ज़मीन से अपनी जड़ें उखाड़ तो लेते हैं लेकिन एक वक़्त आता है जब तरस जाते हैं जुड़ाव को। उस लगाव को। हम जीतने की कोशिश में जाने कितनी दफा हारते हैं। फिर भी दिल को तसल्ली नहीं मिलती। ये जीत ज़िद होती है हमारी। जो हम किसी भी हाल में बस छीनना चाहते हैं। हम पा तो लेते हैं वो मुकाम जो हमें चाहिए था मगर अपनी असल खुशियों और सुकून से इतनी दूर निकल आते हैं कि-
"जहाँ से वापस लौट आने की
अमूमन कोई गुंजाईश नहीं रहती ."
खैर अगर हमारे पथराए दिल में जज़्बात ज़रा भी बाकी हो तो पलट आना मुश्किल नहीं होता।
चलिए आइये पढ़ते हैं एक और बेहद प्यारी सी कविता "तकिया "
बड़ा ही करीबी साथी है ये तकिया। बचपन से आज तक के हर दुःख का हर ख़ुशी का। कभी कभी सोचती हूँ इस लुगलुगे से तकिये में रुई भरी है या मेरे जज़्बात हैं सीले हुए ।
ये रुई से जज़्बात जितनी जल्दी सीला जाते हैना उतनी ही जल्दी आग भी पकड़ लेते हैं। और कभी कभी इतने घुट जाते हैं की सड़ांध मारने लगते हैं। ज़रूरी हो जाता है धूप लगाना इन्हे।
आइये देखें तो हमारे निर्मल जी के तकिये में छुपे जज़्बात क्या कहते हैं ....
"मैंने अपने तकिये पर
सिर टिकाये टिकाये अनुरोध किया
भईया भूलना मत
नींद और सपनों की फ़िक्र किये बिना
मुझे अल्लसुबह ही जगा देना
कल मुझे भरपूर जिंदगी जीते हुए
अनेक जरूरी काम निबटाने हैं .
मैंने अपने तकिये पर
हमेशा बहुत भरोसा किया है
और उसने मुझे कभी निराश नहीं किया
वह मेरे हर राज का राजदार है
उस पर अंकित है
मेरी आत्मकथा की हर इबारत
गम और जूनून की तफ़सील के साथ .
मैंने अपने तकिये पर
लिख रखा है अपना शोकगीत
इस यकीन के साथ कि मेरे बाद
जिन्दा बची नस्लें इसी पढ़ेंगी
और शोकाकुल होने की
वजह न पाकर खिलखिला पड़ेंगी .
मैंने अपने तकिये पर
अगले सात जन्मों की यात्रा का
मानचित्र टांक रखा है ."
आह बेहद खूबसूरत ............
"नींद और सपनों की फ़िक्र किये बिना ,मुझे अल्लसुबह ही जगा देना "
सच कहा सर कई दफा मैं भी यही सोचती हूँ के ज़िन्दगी कम ना पड़ जाए , जाने कितने काम बाकी हैं अभी, अधूरे छूटे काम रोज़ ही मुझे मुंह चिड़ाते हैं। चाहती हूँ ये जो लोग अभी पत्थर उठाये घूम रहे हैं आखरी वक़्त मुझे मेरे दोस्तों में शामिल मिलें।
अभी जाने कितनी बातें ऐसी हैं जो मेरी आँखें में भर आती हैं और मैं तकिये से कह दिया करती हूँ। क्यूंकि उन्हें समझने वाला कोई है नहीं। कई दफा मैं भी यही सोचती हूँ सर की-
"मैंने अपने तकिये पर लिख रखा है अपना शोकगीत
इस यकीन के साथ कि मेरे बाद जिन्दा बची नस्लें इसी पढ़ेंगी"
लेकिन क्या पता वे भी इसे समझ पाएंगे या नहीं , क्या पता उनके समझने तक ये सीले जज़्बात ही पथरा जाएँ ....
फिर भी मेरे प्यारे तकिये.....
"नींद और सपनों की फ़िक्र किये बिना ,मुझे अल्लसुबह ही जगा देना "
मुझे भी कई काम निपटाने हैं ....
इनकी हर कविता ऐसी लगती है जैसे एक दूसरे से कहीं न कहीं जुडी हैं। पहली कविता में हमने जज़्बात जानने चाहे की बचे हैं भी या नहीं। दूसरी कविता "तकिया" में हमने उन जज़्बातों को चुप चाप छुपा हुआ पाया। अब अगली कविता चाहत - देखें तो ये क्या कहती है ………
चाहत जो कभी हमारी ज़िद हुई तो कभी बस एक आस सी। कभी बदल गयी तो कभी मरते दम तक साथ रही, जीवनसाथी सी।
मगर वक़्त के साथ इंसान बदलता है , सोच बदलती है , और उसकी चाहत भी उसकी सुविधाजनक क्षेत्र पर निर्भर हो कर रह जाती है।
आइये पढ़ते हैं एक और निराली कविता - "चाहत"
"हमें अच्छी लगती है
बालकनी की रेलिंग पर
फुदक फुदक कर चहकती चिड़िया
लेकिन तभी तक
जब तक वह अपने बसेरे की जिद में
घर के किसी रौशनदान पर
बरबस अपना हक न जताने लगे . .
हमें अच्छी लगती है
घर आंगन में पसरी हुई
तेजतर्रार सुनहरी धूप
लेकिन तभी तक
जब तक हम देख पायें
एयरकंडीशन कमरे की खिड़की से
सड़क पर चलते पसीने में लथपथ राहगीरों को ."
आह .... कितनी सटीक बात कह दी ना वो भी बिना किसी झोल के। और कितना बड़ा सच है ये हमारा, जिसे हम जान के भी अनजान बने फिरते हैं। हमें हर वो चीज़ अच्छी लगती है जिससे हमें ज़रा भी तकलीफ न हो। हम बिल्लियों के , फुदकती चिड़ियों के हमारे कंप्यूटर पर वॉलपेपर तो रख सकते हैं लेकिन उनकी शैतानियों को उनके हमारी ज़िन्दगी में दखल को बर्दाश्त नहीं कर सकते।
और ये देखिये .................
"हमारे भीतर चाहतों का अजायबघर है
लेकिन उसमें कुछ भी ऐसी नहीं
जिसके वहां होने का कोई कारण न हो
ध्यान से देखोगे तो दिखेगा
उन सबके साथ नत्थी हैं
हमारी क्रूरताओं के पारदर्शी दस्तावेज़ ."
उफ़ ....... छिद गया ना दिल। हो गया ना छलनी। यही है न सच मेरा, आपका, हम सबका। क्या वाक़ई हम इतने क्रूर हैं ?
नहीं करते ना हम समझौते। किसी से भी किसी भी हाल में। जब तक मतलब है बस तब तक का साथ ।सब देखते हैं , सब समझते हैं , कराह कानो तक पहुँचती भी है , मगर पता नहीं दिल पर असर क्यों नहीं हो पाता। हम पहले तो ऐसे नहीं थे ना। पलट कर देख ही लिया करते थे भीड़ में हमारे पैरों से किसी के कुचले हुए पांवो को । मांग लिया करते थे आँखों ही आँखों में माफ़ी। आज क्या हुआ है हमें क्यों बस बढ़े जा रहें हैं आगे ही आगे एक दूसरे को पछाड़ते हुए। कैसी दौड़ है ये के ठहर कर पीछे देखने का वक़्त ही नहीं देती। सोचते ही नहीं के क्या छूट गया है , क्या टूट गया है। आआह ………
इस दुःख को कलेजे से लगा, आपको निर्मल जी की चौथी कविता "रात के दस बजे " पूरी की पूरी सुना रही हूँ। इस कविता को की हर लाइन अपने आप में सम्पूर्ण है और हमारे अधूरेपन का बोध कराने में पूरी तरह से सक्षम है ।
आइये पढ़ते हैं और महसूसते हैं ये कविता -
"रात के सिर्फ दस बजे हैं
और शहर में बकायदा रात हो चुकी है
जिसके बारे में धारणा यह है कि रात होती ही इसलिए है
ताकि जैसे तैसे पेट को भर लिए जाने के बाद
चारपाई पर औंधे मुहँ गिर कर सोया जा सके
अगली सुबह उठने वाले सवालों बेपरवाह
किसी भी तरह की उम्मीद को
झूठे बर्तनों की तरह कोने मे दरकिनार करते हुए .
रात के सिर्फ दस बजे हैं
जिंदगी के कुछ अपरिहार्य सबूतों के सिवा
अधिकांश साक्ष्य गायब हो चुके हैं .
चंद सिरफिरे लोगों के मस्तिष्क की हांड़ी में
अँधेरे के खिलाफ बगावत के पुलाव
ये लोग फर्ज़ी सपनों के खिलाफ
लामबंद होने की कोशिश में हैं .
रात के सिर्फ दस बजे हैं
राज्य के गुप्तचर गली गली घूम रहे हैं
जागते हुओं का सुराग सूंघते
प्रत्यक्षतः सोये हुए शहर की धड़कन में
विस्फोट से पहले की टिक - टिक सुनते
लोगों की नींद पर लगा है सवालिया निशान .
रात के सिर्फ दस बजे हैं
शहर के घंटाघर पर लगी घड़ी
सदियों से दस बज कर दस मिनट पर अटकी है
यह समय यहाँ से होकर कब गुजरा था ,
दिन में बीता था या रात में
किसी को न तो पता
और न जानने की दिलचस्पी .
रात के सिर्फ दस बजे हैं
अपने बसेरे से भटक कर
उड़ता हुआ कबूतर
जा बैठा घड़ी की सुईं पर
और इतिहास के पन्नों में अटका हुआ शहर
एक मासूम परिंदे की नादानी से
अनायास जाग उठा है .
रात के सिर्फ दस बजे हैं
लोगों को नीम अँधेरे में सुनाई दे रही है
भोर के आने की आहट और
एक कबूतर की फड़फड़ाट ."
................ रात का अकेलापन ज़िन्दगी का अधूरापन और यह कविता अगर साथ हो तो सुबह का इंतज़ार ही ना रहे मुझे।
रात में कई रिश्ते जुड़ते है , और कई टूट भी जाते हैं। सभी को समाये हुए है रात अपने अंतस में।
ये १० बजकर १० मिनट वाली मुस्कान अक्सर जिस पहर में रुंआसी हो जाती है गहराना शुरू हो जाती है रात , गहरी और गहरी।
आइये चुप सी इस रात को यही छोड़ें , इकठ्ठा करें अपनी बिखरी संवेदनाओं को और उठा ले झोला दिन का। सूरज आ चुका है वसूलने ज़िन्दगी का कर।
निर्मल सर सच मैं भूल ही गयी थी इन्हे पढ़ते पढ़ते के ये आपकी कवितायेँ हैं। यूँ लगा जैसे मेरे ही मन की बातें हैं सारी।
आप यूँही लिखते रहें। ताकि संवेदनाएं बरकरार रह सके। ईश्वर आपको बहुत तरक्की
दे।
आपकी
निवेद

रविवार, 25 अक्टूबर 2015

मम्मा और उसका बेटा

मम्मा  बदहवास है
बच्चा गहरी नींद में है
उसके होंठों पर थिरक रही है 
दुनिया की  पवित्रतम मुस्कान
माँ को ऑफिस पहुँचने की जल्दी है  
चैन से साँस तक लेने फुरसत नहीं.

समय तेजी से भाग रहा है
कच्चा हुआ जाता है मम्मा  का मन
वह तुरंत रो देना चाहती है
बच्चा नन्हे नन्हे हाथ पैर हिला कर
उसे  देता है  दिलासा
आप जाओ काम पर बेफिक्र.

बच्चा दिन भर हँसता खेलता है
खूब करता है ठिठोली
आपको देखता है तो रोने लगता है
क्रेच वाली बहलाती है
बच्चा माँ की गोद में दुबक कर
अपना सिर धीरे धीरे  हिलाता है.

गोद में बच्चे को लिए
घर वापस जाती मम्मा  
पूरे रास्ते बतियाती है उससे
बीच बीच में पूछती जाती  है सवाल
मम्मा काम पर न जाए
तो तू खूब खेलेगा उसके  साथ.

बच्चा घर आकर खूब किलकता है
मम्मा  की नाक को छू छू कर
जताता है बेपनाह प्यार
वह हुम हुम कर कुछ कहता है उससे
वह  समझती  है उसकी हर बात
उसके बिना क्रेच में वह कितना रोता होगा.

बस तू ज़रा-सा  बड़ा हो जा
फिर तू यहीं रहेगा मम्मा के पास
बस्ता लेकर स्कूल जाएगा
बस्ता और नर्म परांठे लेकर  
तब हम खूब मस्ती करेंगे साथ साथ  
मम्मा के पास दुलार भरा  सपना है.

बच्चा मम्मा  से बेतरह लिपटा
मानो समझ रहा है सारी बात
वह भी समझ रही है सब  
लेकिन आज वह निश्चिंत है
कल छुट्टी है पर परसों...
दोनों मगन हैं परसों से मुंह फेरे हुए.  

शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2015

दोस्त जो चला गया समय के आरपार


एक दोस्त और चला गया
बहुत जल्दी में था
चाहता तो ठहरता कुछ दिन और
कम से कम तब तक जब कोई कहता
कविता के सच पर
मुश्किल हो रहा है यकीन करना।

वह अपनी कविता में 
समय की आँखों में आँखे डाल 
पंजा लड़ाने की बात करता 
उसका कांपता हुआ बायाँ हाथ 
बता देता कि 
सब वही नहीं है जो वह लिखता है।

उसके लिए कविता में उतरना 
लगातार होता जा रहा था कठिन 
जैसे चार कदम चलता हुआ
वह् हांफ जाता 
कहता ,वक्त मिले तो 
पढ़ना वह भी जो उसने नहीं लिखा।

वह शब्दों के चप्पू से 
जिंदगी की जर्जर नाव 
खेने की पुरजोर कोशिश करता
खोजता भाषा का खोया तिलस्म 
उसे बिल्कुल नहीं पता था 
टूट चुका है कविता का जादू।

उसे जाना ही था इसी तरह 
जैसे सबको जाना है एक दिन
सराय में मुसाफिर का ठहराव तय होता है 
और आदमी की सांसों की गिनती
उसकी कविताओं में उसे ढूँढने की 
जिम्मेदारी अनायास आन पड़ी है।

वह समय से नहीं हारा
जीत भी नहीं पाया यकीनन                                        
बस साथ चलते चलते 
चला गया समय के आरपार अचानक
घड़ी के अंदर जो टिकटिक करता है 
समय केवल वही नहीं होता।

दोस्त, जाने से पहले इतना मौका तो देते 
हांफते कांपते हम साथ साथ चलते 
तमाम कविताओं का पुनर्पाठ करते 
सूखी हुई पत्तियों पर एहतियात से पाँव रखते 
किसी वीरान सड़क पर दूर तलक 
बीच बीच में खुद से बतियाते हुए।


शनिवार, 10 अक्टूबर 2015

पिता और व्हील चेयर

पिता व्हील चेयर पर बैठे थे
एकदम इत्मिनान के साथ
उनके अलावा सबको पता था
वह हो सकते हैं वहां से
किसी पल भी लापता  
मौत यहीं कहीं है आसपास.

वह बार बार कर रहे थे
बर्मा ले चलने की जिद
बड़ी आत्मीयता से जिक्र करते
लाहौर की पेचीदा गलियों का
द्वितीय विश्व युद्ध के किस्से
अनवरत दोहराते.

वह आश्वस्त थे
हमेशा की तरह  
एक बार यहाँ से चले भी गये
लौट आयेंगे आस्तीन से पसीना पोंछते
उनको कभी नहीं रही
कही आने -जाने की जल्दी .

वह आँखें मूंदे  थे
मां हताशा में ले रही थी
लम्बी लम्बी सांसे
खंगाल  रही थी शायद
आखिरी बार या पहली बार अनमनी –सी  
उनसे रूठ जाने की पुख्ता वजह.

उन्होंने पूछा था
तब हम सबसे या
कमरे की नम हवा से
यार ,वह स्टीफन हाकिंग की  
खुद-ब-खुद चलने वाली व्हील चेयर
क्या अब मिलने लगी है बुद्ध बाज़ार में.

वह बिना हिले डुले बैठे थे
बैठे ही रहे देर तक
हम लोगों को मालूम नहीं था  
उनके सवाल का जवाब
तभी वह चले गये चुपचाप  
व्हील चेयर वहीँ छोड़ कर . 

मोची राम

साइन लैंग्वेज और कटफोड़वा की खट-खट

महामारी के भीषण दिनों में उन लोगों ने बातून नौनिहालों को जबरन सिखवाया सिर्फ इशारों ही इशारों में अपनी जरूरत भर की बात कह लेना किसी मूक बघिर...