सोमवार, 24 अगस्त 2015

पाँव घसीटती हुई ट्रेन


मेरे शहर तक पहुँचते पहुँचते
राजधानी से आने वाली पैसेंजर ट्रेन
अकसर हांफने लगती है
वह बड़े बेमन से आती है
लगभग पाँव घसीटते हुए
माँ हमेशा बताया करती थी
धरती पर पैर घसीट कर चलना
दरिद्रता की निशानी होती है.

माँ की नसीहत के बावजूद
घर लौटता हुआ मैं सदा चलता रहा
जैसे चलती है ट्रेन
रोंगटे खड़े कर देने वाली रगड़ को   
अपने भीतर महसूस करता हुआ
निरंतर यात्रा  की ऊब को
सलीके से सहेजता .

घर से बाहर तक
दरिद्रता की ट्रेन रेंगती रही
मेरी शिराओं और उम्मीदों में
माँ सपना देखती रही
तमाम आशंकाओं के बावजूद 
मेरी निरापद घर वापसी
रगड़ की कर्कशता से मुक्ति का.

ट्रेन हमेशा सर्र से जाती
और बोझिल पांवों के साथ लौटती रही
उसकी गति के साथ
सरकती घिसटती रही जिंदगी
मैंने चाहा कि एक दिन ट्रेन से पूछूं 
तुम आने और जाने के बीच
इतना बदल क्यों जाती हो .

ट्रेन में रोज आते जाते
खचाखच भरे डिब्बे के किसी कोने में
जैसे तैसे टिकी देह सफर के दरम्यान
अपने होने को आहिस्ता से पॉज कर देती
मैं उलटी सीधी साँसें लेता
अपने से कहता ,यार बहुत हुआ
अब बंद करो पाँव घसीट कर चलना.

दबे पाँव चलता हुआ
चला आया हूँ मैं बहुत दूर
अब न माँ है ,न उसकी नसीहतें
मेरे पांवों में नहीं बचा है
रगड़ से होने वाला पहले जैसा रोमांच
अलबत्ता ट्रेन अब भी लौटती है
उसी तरह पाँव घसीटती हुई.
++++





  





शुक्रवार, 21 अगस्त 2015

बाहर आते ही .....

वह अभी अभी बाहर आया है
घरवालों से मिले उलहानों को
सलीके से तह बना कर
रुमाल के साथ जेब के हवाले करता
कायदे से तो वह रोना चाहता है
पर वह ढूंढता है
तेज हवा का ऐसा झोंका
जो उड़ा ले जाये उसकी सारी नादानियाँ .

वह अभी अभी बाहर आया है
एक अदद नीम हकीम को तलाशता
जो उसके सपनों को
स्मृति से मिटाने वाला रबर देदे
वह सपनों से इस कदर डर चुका है
कि नींद को आते देख
भाग खड़ा होता है.

वह अभी अभी बाहर आया है
काली जिल्द वाली पुरानी डायरी
अपनी कांख में दबाए
जिसमें उसने सहेज  रखें हैं
संभावित  प्रेमिकाओं को लिखे जाने वाले
प्रेम पत्रों के आधे अधूरे ड्राफ्ट
जिन्हें उसने या तो कविता समझा हुआ है .
या हर मर्ज के इलाज की संजीवनी बूटी .

वह अभी अभी बाहर आया है
घर से भाग कर भागते भागते  
बहुत दूर निकल जाने की चाह लिए
लेकिन एक कदम दौड़े बिना
चुहचुहा रहा है पसीना उसके माथे पर
वह दौड़ना तो चाहता है लेकिन  
उसके पैरों को खरामा खरामा
चलने की आदत है .

वह अभी अभी बाहर आया है
मुहँ को साफ़ करने की जरूरत को  
शिद्दत से महसूस करता 
उसकी जेब में रुमाल जैसा रुमाल है
फर्जी उम्मीदों के इत्र में डूबा 
उलहानों को अपने में समेटे
वह अपने बेनूर चेहरे को लिए
कहीं चले जाने से कतरा रहा है.

वह अभी अभी बाहर आया है
सोच रहा है कि डायरी में दर्ज कर ले
कहीं कुछ कर गुजरने से पहले
कविताओं जैसी कुछ अस्फुट पंक्तियाँ
जो सदियों से लिखी  जाती रही हैं 
ताकि सनद बनी रहे
और वक्त जरूरत काम आये .

वह अभी अभी बाहर आया है
उसके मन और पैर ने
अभी से मचलना शुरू कर दिया है
घर वापस जाने के लिए .

 .
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शनिवार, 8 अगस्त 2015

सोना जागना


दिन भर के सफर के बाद
रात में सोने की
पुरजोर कोशिश करता आदमी
बड़ा मासूम लगता है
वह सोने से पहले 
सुबह वक्त पर उठने के लिए
खूब  तैयारी करता है
वह अपने सपनों से कहता है
तुम मत आ टपकना  
मेरी आँखों में रत्ती भर जगह नहीं..

सुबह वाली ट्रेन बड़ी बेमुरव्वत होती है
वह कभी किसी का लिहाज नहीं करती
थकी हुई आत्माओं को अपने भीतर भर कर
तयशुदा समय पर सर्र से निकल जाती है
अपनी ओर लपकते हांफते हुए
बुजुर्ग तक का भी ख्याल नहीं करती
जिसके दिल की धडकनें
पैरों से तेज दौड़ रही होती हैं .

रात में सोने से पहले बेनागा
ऐसी प्रार्थना करता है आदमी
जो किसी ईश्वर को संबोधित नहीं होती
उसमें लोहे की पटरियां 
और गार्ड की हिलती हुई
हरी झंडी होती है केवल 
और होती है ट्रेन की
रवानगी वाली  कूक अनिवार्यत: .

प्लेटफार्म पर जमा बेसाख्ता भीड़ को
चीरता हुआ बदहवास आदमी
ट्रेन के पीछे दौड़ता 
कम्पार्टमेंट के दरवाजे पर लगे
हैंडिल  को अंतत: थामने का  आशावाद लिए
रात और  नींद को कोसता हुआ 
जब  ट्रेन में चढ़ता है
तो  सिर टिकाने की
जगह तलाशता है
ताकि रात की कच्ची नींद की
ज्यादा तो नहीं तो  थोड़ी ही
भरपाई कर पाए .

तमाम जद्दोजेहद के बाद
ट्रेन के किसी तंग कोने में टिक
गहरी साँसों के साथ
खर्राटे भरता आदमी
बड़ा खुदगर्ज लगता है
उसकी मासूमियत  हर  रात
चकनाचूर हो जाती  है 
नींद को पाने में  नाकामयाब होते  हुए .

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शुक्रवार, 3 जुलाई 2015

वक्त का अजायबघर


तुम जब चाहो घर लौट आना
आने में जरा भी न झिझकना
यहाँ की पेचीदा गलियाँ
अभी भी पुरसुकून हैं
घुमावदार हैं मगर
बेहद आसान हैं
इनमें से होकर तुम
मजे से गुजर जाओगे
कोई तुमसे यहाँ
लापता होने का सबब न पूछेगा
जो भी मिलेगा भूला बिसरा यार
वह जल्दबाजी में कहीं से आता
और किसी ओर जाता मिलेगा .
तुम जब चाहो घर लौट आना
वहां अब रोकने टोकने वाला कोई नहीं
बेधड़क चले आना
घर की छत पर उग आये पीपल को देख
उसे वीरान समझ
बाहर मत ठिठक जाना
वह अब भी जिंदगी से भरपूर है
वहाँ कुछ कबूतरों के जोड़े
उनके बच्चे
चंद गिलहरियां और नेवले रहते हैं
उन्होंने तुम्हारे लायक  जगह
अभी भी बचा रखी है .
तुम जब चाहो घर लौट आना
वहां तुम्हारी माँ की राख
लाल कपड़े में बंधी अभी भी रखी है
जब तुम्हारे आने का इंतजार करती वह मरी
कह गई पड़ोसियों से
सुनो ,मेरी मुट्ठी भर याद
यहीं हिफाजत से रख देना
छुटका आएगा तो उसे सीने से लगा
उसका जल प्रवाह करने से पहले
थोड़ी देर मुझ्से बतिया तो पायेगा .
तुम जब चाहो घर लौट आना
जब तुम्हें सुविधा हो तब आना
यहाँ के लोगों ने किसी के आने की
बाट जोहना बंद कर दिया है
सब अपने अपने के हिस्से  की गुरबत
इत्मीनान से जीते हैं
जीते जीते थक जाते हैं जब
अपनी बदहाली की पोटली
बच्चों को थमा कर
उनके शतायु होने की कामना के साथ
चुपचाप मर जाते हैं .
तुम जब चाहो घर लौट आना
लेकिन आना पैदल ही
यहाँ कोई सवारी अभी भी नहीं पहुँचती
दूसरों के कंधे पर
सवार होने का सुख
परलोकगमन करने पर मिलता है
जीने की चाहत रखने वालों को तो
हर हाल में पैरों के बल चलना ही होता है
यहाँ न जीना कोई खास बात है
न मरना रोमांचकारी
हर कालखंड ऐसे ही सरकता है .
तुम जब चाहो घर लौट आना
यह वक्त का अजायबघर है
जहाँ वर्तमान और इतिहास
एक साथ जिन्दा हैं
भविष्य का हाल
नीम तले बैठने  वाले ज्योतिषी के हरियल के सिवा
शायद ही कोई जानता है .
तुम जब चाहो घर लौट आना
पर आना तभी
जब तुम्हारे मुहँ पर बंद हो जाएँ
दुनियावी चक्रव्यूह से बच निकलने के सारे रास्ते .

रविवार, 28 जून 2015

यदि जानना है तो .........


हंसना  क्या होता  है
यह जानना हो तो  
किसी  मसखरे से पूछो
बाकी लोग तो बस
यूँही हँस लिया करते हैं .

मुस्कान की थाह लेनी है
तो उस रिसेप्शनिस्ट से जानें
जिसके जबडों में  
मुस्कराते रहने की जद्दोजेहद में
गठिया हो जाता है .

नग्नता का मर्म जानना है
तो उस कामगार महिला से जानो 
जो दिन भर काम पर लगे होने के बाद भी 
तन को ढंग से ढांपने लायक  
कपड़े नहीं जुटा पाती  है .

मौन की भाषा को जानना  है
तो झांक लो  
उन लाचार आँखों में
जिन्होंने अभी तक हर हाल में
सच बोलने की जिद नहीं छोड़ी है .

कविता का मर्म जानना हो
तो उसे कागजों से निकाल
रूह तक ले जाओ
कविता की मासूम भाषा में
उम्मीद अभी तक जिन्दा लफ्ज़ है .

जिंदगी का मर्म जानना है
तो मौत की दहलीज़ तक टहल आओ
इसे ऐसे सपने की तरह जियो
जो कच्ची नींद में टूट भी जाये
तो  मन कतई  मायूस न हो .

नए शब्द नए भावार्थ गढते हुए
सब खुद –ब –खुद पता चलता है
बहती नदी की गति को  
किसी तस्दीक की जरूरत नहीं





गुरुवार, 21 मई 2015

तुम्हारे बिना अयोध्या


राम !
तुम्हारी अयोध्या मैं कभी नहीं गया
वहाँ जाकर करता भी क्या
तुमने तो ले ली
सरयू में जल समाधिl

अयोध्या तुम्हारे श्वासों में थी
बसी हुई थी तुम्हारे रग-रग में
लहू बन कर l
तुम्हारी अयोध्या जमीन का
कोई टुकड़ा भर नहीं थी
न ईंट गारे की बनी
इमारत थी वहl
अयोध्या तो तुम्हारी काया थी
अंतर्मन में धड़कता दिल हो जैसे 

तुम भी तो ऊब गए थे
इस धरती के प्रवास से
बिना सीता के जीवन
हो गया था तुम्हारा निस्सार
तुम चले गए
सरयू से गुजरते हुए
जीवन के उस पारl
तुम गए
अयोध्या भी चली गई
तुम्हारे साथ 

अब अयोध्या में है क्या
तुम्हारे नाम पर बजते
कुछ घंटे घडियालl
राम नाम का खोफनाक उच्चारण
मंदिरों के शिखर में फहराती
कुछ रक्त रंजित ध्वजाएंl
खून मांगती लपलपाती जीभें
आग उगलती खूंखार आवाजेंl
हर गली में मौत की पदचाप
भावी आशंका को भांप
रोते हुए आवारा कुत्ते l

तुम्हारे बिना अयोध्या
तुम्हारी अयोध्या नहीं है
वह तो तुम्हारी हमनाम
एक खतरनाक जगह है
जहाँ से रुक -रुक कर
सुनाई देते हैं
सामूहिक रुदन के
डरावने स्वरl

राम !
मुझे माफ करना
तुम्हारे से अलग कोई अयोध्या
कहीं है इस धरती पर तो

मुझे उसका पता मालूम नहीं l

बुधवार, 20 मई 2015

भला आदमी


वह एक भला आदमी था
चुपचाप चला गया
अपनी देह से बाहर
बिना चप्पल पहने
हालाँकि  कुछ पल पहले ही
उसने अपने से कहा था
यार बड़ी भूख लगी है .

वह एक भला आदमी था
जिसे कभी न ढंग से जीना आया
और न कायदे से मरना
ऐसे चला गया जैसे
कोई झप्पर से बाहर आये
मौसम का मिजाज भांपने  .

वह एक भला आदमी था
जिन्दा रहने की ललक कहें  या मजबूरी
उसे लगातार पता लगता रहा कि
जीने के लिए बार बार मरना होता है
फिर भी जीने लायक  पुख्ता जगह
शायद ही कभी मिल पाती है .

वह एक भला आदमी था
उसके तकिये के नीचे से मिले  हैं
कुछ हस्तलिखित पन्ने
जिनकी इबारत कविता जैसी दिखती है
लोग सशंकित हो उठे हैं
वह जितना दिखता था
उतना भला तो नहीं था .

वह एक भला आदमी था
अपनी निजता संभाल नहीं पाया
ठीकठाक तरीके से
उसके बारे में उठ रहे हैं सवाल 
वह यूं क्यों चला गया दबे पाँव
इस तरह भी कोई जाता है भला !
+++++.     
 






मंगलवार, 12 मई 2015

तब समझ लेना




रोटी का पहला कौर तोड़ते हुए
जब खेत खलिहान में लहलहाती
दूध से भरी गेहूं की बालियाँ याद न आयें l

गर्म दूध को पीने से पहले
फूंक मार कर उसे ठंडाते हुए
गाय के थन में अपना जीवन टटोलते
बछड़े का अक्स सामने  न उभरे l

पानी पीने के लिए
गिलास को मुहँ से लगाते ही
कोसों दूर से मटकी भर जल लाती  
बहुरंगी ओढ़नियों से छन कर आता     
पसीने से लथपथ संगीत  सुनाई न दे l

रात के घुप्प अँधेरे में
सुदूर गांव से आती
सिसकियाँ और मनुहार 
सुनाई देनी कतई बंद हो जाएँ l

गर्मागर्म जलेबी को खाते हुए
गांव वाली जंगल जलेबी का 
मीठा कसैला स्वाद जिह्वा पर
खुदबखुद न तैर जाये   l

तब समझ लेना
तुम चले आये हो
अपने घर बार से दूर
इतनी दूर
जहाँ से वापस लौट आने की

अमूमन कोई गुंजाईश नहीं रहती l

मोची राम

साइन लैंग्वेज और कटफोड़वा की खट-खट

महामारी के भीषण दिनों में उन लोगों ने बातून नौनिहालों को जबरन सिखवाया सिर्फ इशारों ही इशारों में अपनी जरूरत भर की बात कह लेना किसी मूक बघिर...