बुधवार, 2 सितंबर 2015

शेर के पंजे का छापा और मुहर


पेड़ के नीचे बैठे – बैठे किसी ने  
अचानक मुट्ठी को बाँधा
उसे छाप दिया गीली मिट्टी पर
बब्बर शेर का पंजा उभरा  
पूरा इलाका गूँज उठा
वनराज की दहाड़ से. .

शहर के किसी दफ्तर में 
हाकिम ने हुक्मनामे पर
छोटी –सी चिड़िया बैठाई
मुहर की मुडेर पर
सैकड़ों किसानों के पैरों तले से
सरक गई उनकी जमीन और मुस्तकबिल.

जंगल में अब शेर नहीं
उनका आधा अधूरा खौफ रहता है
शहरों में रहते हैं कागजी बघेरे
वह दहाड़ते नहीं सिर्फ खीसे निपोरते हैं
ठीक वैसे जैसे चिड़िया दबोच कर
खिलखिलाता है कोई बहेलिया ..

जंगल उजड़ कर बने शहर
शेर कर गए पलायन  
अब उनकी आभासी उपस्थिति है
बस बंद मुट्ठी के छापे में
सरकारी फाइलों में नत्थी हैं
तमाम गोलमटोल मंसूबे.

पैरों तले की जमीन की
होनी है बड़ी बारीकी से पैमाइश
नक्शानवीस आयेंगे   
रंगबिरंगी पेंसिल कागज लिए
सभ्रांत इमारतों और सपनों का  
ब्लूप्रिंट बनाने की तकनीक लिए.   
.
कोई बता रहा है पुरजोर आवाज़ में
बंद मुट्ठियों में से
कोई शेर -वेर नहीं निकलता
उसके भीतर पलते हैं शेखचिल्ली के ख्वाब.
फर्जी पदचिन्हों के जरिये
सिर्फ मुगालते के जंगल पनपते  हैं.. .

मंगलवार, 1 सितंबर 2015

हस्तिनापुर के सैनिक

हस्तिनापुर से गये थे सैनिक
कुरुक्षेत्र के मैदान में
वहां जाने का मकसद और 
जिंदा बचे रहने की उम्मीद लिए बिना
हालंकि उन्होंने तब तमाम मनाहियों के बावजूद
सपने देखने स्थगित नहीं किये थे.
हस्तिनापुर से गए थे सैनिक
अस्त्र शस्त्र और ढोल नगाड़े लिए
जिनकी उपयोगिता के बारे में
वे सिरे से थे अनभिज्ञ
उनके भीतर बलबला रही थी
मासूमियत से भरी राजभक्ति.
हस्तिनापुर से गए थे सैनिक
अपने बीवी बच्चों को उम्मीद दिलाकर
कि वे जल्द लौट आयेंगे वहां से
विजयघोष करते ध्वजा फहराते
उन्होंने यह सब कहने को कहा था
उनको मालूम नहीं था वापसी का रास्ता.
हस्तिनापुर से गए थे सैनिक
अपने राजा की शान की खातिर
वे वहां धर्म ,और मर्यादा की व्याख्या
सुनने के लिए नहीं आये थे
सारथी कृष्ण ने धनुर्धर पार्थ से क्या कहा
उन्हें उसका कुछ पता नहीं.
हस्तिनापुर से सैनिक खुद –ब-खुद नहीं गए थे
ले जाए गए थे जबरिया हांक कर
उनको तो वहां मरना ही था अंतत:
उनके पास न तो कर्ण जैसे कवच कुंडल थे
न इच्छा मृत्यु का वरदान
न सुदर्शन चक्र ,न कुटिलता का कौशल.
हस्तिनापुर से गए सैनिकों के बारे में
इससे अधिक किसी को नहीं पता
अलबत्ता रजवाड़ों की भव्य वापसी के किस्से
हर किसी ने खूब सुने हैं .
.

सोमवार, 31 अगस्त 2015

उसे पता है .....


आख़िरकार उसे मिल गया
ईंटों के चट्टे के बगल में
एक ठंडी छाया का रहमदिल टुकड़ा 
अब वह इत्मीनान से बैठ
कपड़े में बंधी रोटियां निकलेगी
खोलेगी भूख का जादुई बक्सा..
वह अरसे से भूखी है
मगन होकर हर कौर को चबायेगी
साथ ही साथ डालती जायेगी
रोटी के सख्त किनारे
कौओं की ओर .
उसे अच्छी तरह मालूम है
कि खाली पेट किस कदर दुखता है.
रोटी खाने के बाद
वह जायेगी हैंडपम्प के पास
ठंडे पानी की तलाश में
अंजुरी भर भर पानी पिएगी
और लौटेगी वहां से दोनों हथेलियों में
बड़े जतन से पानी लिए
वह डाल देगी उसे
ईंटों के चट्टे के पास लगे
तेज धूप से मुरझाये
पौधे की जड़ में .
और फिर पोंछेगी  पत्तियों को
अपने गीले हाथों से हौले हौले.
पेट भर जाने के बाद भी
उसे याद है सभी की भूख प्यास
भरपेट अघाये हुए लोगों की तरह उसे
किसी को भूल जाना नहीं आता .
.....................

मेरे लिए .... .


मेरे लिए कविता लिख पाना
धीरे धीरे बहुत मुश्किल होता जा रहा है
ठीक उसी तरह जैसे किसी प्यार से भरी दरिया में
आकंठ उतर जाना
सच तो यह भी है
जिंदगी को बड़ी एहतियात से जींने की घड़ी आ गई है.

मेरे लिए ठीक से साँस ले पाना
दूभर होता जा रहा है
ठीक उसी तरह जैसे
निपट सुनसान में भी अकेले बैठ कर
कोई पुराना गीत गुनगुनाना
बढ़ती उम्र के तकादे को टालते जाने का वक्त बीत गया.

मेरे लिए किसी से बहस में उलझने का
समय चुपके से बीत गया पता न चला
अब हर बात को सुनते हुए
उसे ऊँचा सुनाई देने की दलील के साथ
अनसुना करते चले जाने का विकल्प बचा है
चेहरे पर बेचारगी लपेट कर जीते चले जाने की अजब मजबूरी है.

मेरे लिए हर नये दिन को पूरी ताकत से जीने का
मकसद ही मानो खत्म हुआ
अब कैलेंडर पर तारीखों और साल को देखते हुए
मन कांप कांप जाता है
मानो दिल कहता हो बहुत हुआ अब सामान बांधो
यह किस सफर की तैयारी है कुछ पता नहीं.

मेरे लिए जिंदगी में खुलते जा रहे है रास्ते
तमाम निराशाओं के बावजूद
सांस का हरेक कतरा मेरे लिए
उत्सव मनाने जैसा है
जिंदगी और मौत के बीच का संकरा गलियारा
घटाटोप अँधेरे से भरा है लेकिन रोशनी की उम्मीद अभी जिन्दा है.



सोमवार, 24 अगस्त 2015

पाँव घसीटती हुई ट्रेन


मेरे शहर तक पहुँचते पहुँचते
राजधानी से आने वाली पैसेंजर ट्रेन
अकसर हांफने लगती है
वह बड़े बेमन से आती है
लगभग पाँव घसीटते हुए
माँ हमेशा बताया करती थी
धरती पर पैर घसीट कर चलना
दरिद्रता की निशानी होती है.

माँ की नसीहत के बावजूद
घर लौटता हुआ मैं सदा चलता रहा
जैसे चलती है ट्रेन
रोंगटे खड़े कर देने वाली रगड़ को   
अपने भीतर महसूस करता हुआ
निरंतर यात्रा  की ऊब को
सलीके से सहेजता .

घर से बाहर तक
दरिद्रता की ट्रेन रेंगती रही
मेरी शिराओं और उम्मीदों में
माँ सपना देखती रही
तमाम आशंकाओं के बावजूद 
मेरी निरापद घर वापसी
रगड़ की कर्कशता से मुक्ति का.

ट्रेन हमेशा सर्र से जाती
और बोझिल पांवों के साथ लौटती रही
उसकी गति के साथ
सरकती घिसटती रही जिंदगी
मैंने चाहा कि एक दिन ट्रेन से पूछूं 
तुम आने और जाने के बीच
इतना बदल क्यों जाती हो .

ट्रेन में रोज आते जाते
खचाखच भरे डिब्बे के किसी कोने में
जैसे तैसे टिकी देह सफर के दरम्यान
अपने होने को आहिस्ता से पॉज कर देती
मैं उलटी सीधी साँसें लेता
अपने से कहता ,यार बहुत हुआ
अब बंद करो पाँव घसीट कर चलना.

दबे पाँव चलता हुआ
चला आया हूँ मैं बहुत दूर
अब न माँ है ,न उसकी नसीहतें
मेरे पांवों में नहीं बचा है
रगड़ से होने वाला पहले जैसा रोमांच
अलबत्ता ट्रेन अब भी लौटती है
उसी तरह पाँव घसीटती हुई.
++++





  





शुक्रवार, 21 अगस्त 2015

बाहर आते ही .....

वह अभी अभी बाहर आया है
घरवालों से मिले उलहानों को
सलीके से तह बना कर
रुमाल के साथ जेब के हवाले करता
कायदे से तो वह रोना चाहता है
पर वह ढूंढता है
तेज हवा का ऐसा झोंका
जो उड़ा ले जाये उसकी सारी नादानियाँ .

वह अभी अभी बाहर आया है
एक अदद नीम हकीम को तलाशता
जो उसके सपनों को
स्मृति से मिटाने वाला रबर देदे
वह सपनों से इस कदर डर चुका है
कि नींद को आते देख
भाग खड़ा होता है.

वह अभी अभी बाहर आया है
काली जिल्द वाली पुरानी डायरी
अपनी कांख में दबाए
जिसमें उसने सहेज  रखें हैं
संभावित  प्रेमिकाओं को लिखे जाने वाले
प्रेम पत्रों के आधे अधूरे ड्राफ्ट
जिन्हें उसने या तो कविता समझा हुआ है .
या हर मर्ज के इलाज की संजीवनी बूटी .

वह अभी अभी बाहर आया है
घर से भाग कर भागते भागते  
बहुत दूर निकल जाने की चाह लिए
लेकिन एक कदम दौड़े बिना
चुहचुहा रहा है पसीना उसके माथे पर
वह दौड़ना तो चाहता है लेकिन  
उसके पैरों को खरामा खरामा
चलने की आदत है .

वह अभी अभी बाहर आया है
मुहँ को साफ़ करने की जरूरत को  
शिद्दत से महसूस करता 
उसकी जेब में रुमाल जैसा रुमाल है
फर्जी उम्मीदों के इत्र में डूबा 
उलहानों को अपने में समेटे
वह अपने बेनूर चेहरे को लिए
कहीं चले जाने से कतरा रहा है.

वह अभी अभी बाहर आया है
सोच रहा है कि डायरी में दर्ज कर ले
कहीं कुछ कर गुजरने से पहले
कविताओं जैसी कुछ अस्फुट पंक्तियाँ
जो सदियों से लिखी  जाती रही हैं 
ताकि सनद बनी रहे
और वक्त जरूरत काम आये .

वह अभी अभी बाहर आया है
उसके मन और पैर ने
अभी से मचलना शुरू कर दिया है
घर वापस जाने के लिए .

 .
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शनिवार, 8 अगस्त 2015

सोना जागना


दिन भर के सफर के बाद
रात में सोने की
पुरजोर कोशिश करता आदमी
बड़ा मासूम लगता है
वह सोने से पहले 
सुबह वक्त पर उठने के लिए
खूब  तैयारी करता है
वह अपने सपनों से कहता है
तुम मत आ टपकना  
मेरी आँखों में रत्ती भर जगह नहीं..

सुबह वाली ट्रेन बड़ी बेमुरव्वत होती है
वह कभी किसी का लिहाज नहीं करती
थकी हुई आत्माओं को अपने भीतर भर कर
तयशुदा समय पर सर्र से निकल जाती है
अपनी ओर लपकते हांफते हुए
बुजुर्ग तक का भी ख्याल नहीं करती
जिसके दिल की धडकनें
पैरों से तेज दौड़ रही होती हैं .

रात में सोने से पहले बेनागा
ऐसी प्रार्थना करता है आदमी
जो किसी ईश्वर को संबोधित नहीं होती
उसमें लोहे की पटरियां 
और गार्ड की हिलती हुई
हरी झंडी होती है केवल 
और होती है ट्रेन की
रवानगी वाली  कूक अनिवार्यत: .

प्लेटफार्म पर जमा बेसाख्ता भीड़ को
चीरता हुआ बदहवास आदमी
ट्रेन के पीछे दौड़ता 
कम्पार्टमेंट के दरवाजे पर लगे
हैंडिल  को अंतत: थामने का  आशावाद लिए
रात और  नींद को कोसता हुआ 
जब  ट्रेन में चढ़ता है
तो  सिर टिकाने की
जगह तलाशता है
ताकि रात की कच्ची नींद की
ज्यादा तो नहीं तो  थोड़ी ही
भरपाई कर पाए .

तमाम जद्दोजेहद के बाद
ट्रेन के किसी तंग कोने में टिक
गहरी साँसों के साथ
खर्राटे भरता आदमी
बड़ा खुदगर्ज लगता है
उसकी मासूमियत  हर  रात
चकनाचूर हो जाती  है 
नींद को पाने में  नाकामयाब होते  हुए .

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शुक्रवार, 3 जुलाई 2015

वक्त का अजायबघर


तुम जब चाहो घर लौट आना
आने में जरा भी न झिझकना
यहाँ की पेचीदा गलियाँ
अभी भी पुरसुकून हैं
घुमावदार हैं मगर
बेहद आसान हैं
इनमें से होकर तुम
मजे से गुजर जाओगे
कोई तुमसे यहाँ
लापता होने का सबब न पूछेगा
जो भी मिलेगा भूला बिसरा यार
वह जल्दबाजी में कहीं से आता
और किसी ओर जाता मिलेगा .
तुम जब चाहो घर लौट आना
वहां अब रोकने टोकने वाला कोई नहीं
बेधड़क चले आना
घर की छत पर उग आये पीपल को देख
उसे वीरान समझ
बाहर मत ठिठक जाना
वह अब भी जिंदगी से भरपूर है
वहाँ कुछ कबूतरों के जोड़े
उनके बच्चे
चंद गिलहरियां और नेवले रहते हैं
उन्होंने तुम्हारे लायक  जगह
अभी भी बचा रखी है .
तुम जब चाहो घर लौट आना
वहां तुम्हारी माँ की राख
लाल कपड़े में बंधी अभी भी रखी है
जब तुम्हारे आने का इंतजार करती वह मरी
कह गई पड़ोसियों से
सुनो ,मेरी मुट्ठी भर याद
यहीं हिफाजत से रख देना
छुटका आएगा तो उसे सीने से लगा
उसका जल प्रवाह करने से पहले
थोड़ी देर मुझ्से बतिया तो पायेगा .
तुम जब चाहो घर लौट आना
जब तुम्हें सुविधा हो तब आना
यहाँ के लोगों ने किसी के आने की
बाट जोहना बंद कर दिया है
सब अपने अपने के हिस्से  की गुरबत
इत्मीनान से जीते हैं
जीते जीते थक जाते हैं जब
अपनी बदहाली की पोटली
बच्चों को थमा कर
उनके शतायु होने की कामना के साथ
चुपचाप मर जाते हैं .
तुम जब चाहो घर लौट आना
लेकिन आना पैदल ही
यहाँ कोई सवारी अभी भी नहीं पहुँचती
दूसरों के कंधे पर
सवार होने का सुख
परलोकगमन करने पर मिलता है
जीने की चाहत रखने वालों को तो
हर हाल में पैरों के बल चलना ही होता है
यहाँ न जीना कोई खास बात है
न मरना रोमांचकारी
हर कालखंड ऐसे ही सरकता है .
तुम जब चाहो घर लौट आना
यह वक्त का अजायबघर है
जहाँ वर्तमान और इतिहास
एक साथ जिन्दा हैं
भविष्य का हाल
नीम तले बैठने  वाले ज्योतिषी के हरियल के सिवा
शायद ही कोई जानता है .
तुम जब चाहो घर लौट आना
पर आना तभी
जब तुम्हारे मुहँ पर बंद हो जाएँ
दुनियावी चक्रव्यूह से बच निकलने के सारे रास्ते .

रविवार, 28 जून 2015

यदि जानना है तो .........


हंसना  क्या होता  है
यह जानना हो तो  
किसी  मसखरे से पूछो
बाकी लोग तो बस
यूँही हँस लिया करते हैं .

मुस्कान की थाह लेनी है
तो उस रिसेप्शनिस्ट से जानें
जिसके जबडों में  
मुस्कराते रहने की जद्दोजेहद में
गठिया हो जाता है .

नग्नता का मर्म जानना है
तो उस कामगार महिला से जानो 
जो दिन भर काम पर लगे होने के बाद भी 
तन को ढंग से ढांपने लायक  
कपड़े नहीं जुटा पाती  है .

मौन की भाषा को जानना  है
तो झांक लो  
उन लाचार आँखों में
जिन्होंने अभी तक हर हाल में
सच बोलने की जिद नहीं छोड़ी है .

कविता का मर्म जानना हो
तो उसे कागजों से निकाल
रूह तक ले जाओ
कविता की मासूम भाषा में
उम्मीद अभी तक जिन्दा लफ्ज़ है .

जिंदगी का मर्म जानना है
तो मौत की दहलीज़ तक टहल आओ
इसे ऐसे सपने की तरह जियो
जो कच्ची नींद में टूट भी जाये
तो  मन कतई  मायूस न हो .

नए शब्द नए भावार्थ गढते हुए
सब खुद –ब –खुद पता चलता है
बहती नदी की गति को  
किसी तस्दीक की जरूरत नहीं





मोची राम

साइन लैंग्वेज और कटफोड़वा की खट-खट

महामारी के भीषण दिनों में उन लोगों ने बातून नौनिहालों को जबरन सिखवाया सिर्फ इशारों ही इशारों में अपनी जरूरत भर की बात कह लेना किसी मूक बघिर...