गुरुवार, 3 सितंबर 2020

पापाजी नहीं रहे


 सुबह का वक्त था

वह ग्राहक के लिए जल्दी जल्दी

सामानों की पुड़िया बाँध रहे

बीच बीच में पूछते जाते ...और

लिखते जाते चीकट कागज पर सारा हिसाब

उन्होंने पेन्सिल को अपने कान के पीछे खोंसा

ऊपर गर्दन उठाते मुझे देखा, कहा –हाँ भईया.

 

मेरे पास देने को एक मनहूस खबर थी

कहा- ताऊजी पापाजी नहीं रहे

सुनते ही वह एकदम धप्प से फर्श पर उकडू बैठ गये

कब-उनका मुख खुला तो उन्होंने शायद पूछना चाहा

कब तक ले जाओगे, लेकिन पूछ ली यह बात

वह तो मुझसे पूरे चार बरस छोटा था

कोई दिक्कत महसूस हो तो कहना

उन्होंने एक दुकानदार की सी दुनियादारी वाली बात

एक एक लफ्ज़ तोलते शायद बहुत सम्भाल कर कही.

 

वापस जाने को मुड़ा तो उन्होंने कहा

भईये ज़रा रेडियो मिस्त्री को भी बताते जाना

दोनों की न जाने कितनी शामें

बर्मा में हुई भीषण जंग की तफ़सील बयाँ करते करते बीती

उनका अतीत परछाई की तरह साथ चला

मैंने उन तक जब शोक संदेश पहुँचाया

वह कोई खराब हुआ रेडियो सुधारने में लगे थे

सूचना सुनी तो उन्होंने पेचकस हवा में लहराया

इतना जीदार बंदा ऐसे कैसे मर सकता है-चुपचाप.

 

मैं साइकिल को तेजी से भगाता हर उस जगह गया

जहाँ उनके नज़दीकी दोस्तों के मिलने की उम्मीद थी

वह कहते थे-गुजर जाऊं तो उन लोगों को जरूर खबर दे आना

जिन्हें तेरी माँ सदा लफंगा समझती रही

वही तेरे काँधे का बोझ थोड़ा बहुत हल्का करेंगे

बाक़ी यदि आये तो आये ; न आये तो भी क्या

मेरे उस एमएलए मित्र को तो भनक भी लगने देना

आएगा तो बिला वजह तरह-तरह के कौतुक करेगा.

बेटा –ये सफ़ेदपोश किसी मर्ज की दवा नहीं होते.

 

ये लफंगे ही होते हैं जिंदगी के साथ भी

काम के साबित होते हैं जिंदगी के बाद भी,

तब यह कह वह जोर से हंसे थे

मेरे पिता इस तरह शायद ही पहले कभी हँसे हों  

शोक की घड़ी में उनका चेहरा कनखियों से देखा

लगा कि वह अपने ख़ास अंदाज़ में मुझे या

अपने दोस्तों को या मौत को मुंह चिढ़ा रहे हैं.

 

सोमवार, 31 अगस्त 2020

समय की बोधकथा


प्रत्येक वाक्य  आजाद कर दो

लफ्ज़ और लफ्ज़ के बीच बने सारे सेतु

भरभरा कर ढह जाने दो

बच्चों को खेलने के लिए दे दो

कविताओं के सारे आधे- अधूरे वाक्य

गिलहरियों को मवेशी बाँधने वाली जंजीरों में न बांधो.

 

बगीचे में आज भी चली आई चितकबरी तितली

सदाबहार फूलों का मकरंद पाने की लालसा लिए

वह कई दिनों से आती जाती लगातार

चली गई उड़ते-उड़ते काल के आरपार

गंध ही उसकी दिशा

सदियों से है जिंदा रहने की जिद लिए.

 

बरसात की अराजक हरियाली में

शर्मीली चिड़ियाँ दिन भर रचाती रास

आसमानी बूंदों की मादक आवाज़ में आवाज़ मिला

चहचाहट की कूटभाषा में करती परस्पर प्रणय निवेदन

तिनका-तिनका जोड़ बनाती घोसला

घर बनाने का कौशल ही दरअसल प्रेम का इज़हार है.

 

एक दिन ऐसा आएगा शायद

जब आसमान जल भरे काले मेघों से अंटा होगा

तेज हवाएं उड़ा ले जाना चाहेंगी

तमाम तरह के आर्द्र सपने

घर भले ही तिनका तिनका हो जाये

नींद की परिधि के बाहर सपनों के मोहल्ले फिर भी रहेंगे.

 

एक न एक दिन सारी संज्ञायें मिट जाएँगी

सर्वनाम फिर भी बचे रहेंगे

विशेषण जहाँ तहां चमगादड़ की तरह उलटे लटके मिलेंगे

भुतही हवेलियां रोज रक्तरंजित कथाओं का पुनर्पाठ करेंगी

वर्तमान के नेपथ्य में सिर्फ धुंध ही धुंध भरी होगी

तब इतिहास की किताबों में मनेगा कागजी उत्सव.

 

वक्त जैसे बीतता है व्यतीत होने दो

चुपचाप देखते रहो रिक्तता से भरे

प्रज्ञा के पागलखाने की दीवारों को

सुन पाओ तो कान लगा कर सुन लो  

तर्क की कसौटी पर ठिठकी ठहरी

समय की व्यर्थता भरी बोधकथा.

 

 

 

 

  

 

 

गुरुवार, 27 अगस्त 2020

एक निठल्ली दोपहर में लिखा कविता जैसा कुछ


कविता इसलिए भा गयी

इसमें विराम अर्धविराम या

ऐसे ही किसी अंडबंड चिन्ह को लगाने की

कोई बाध्यता न थी

शब्दों की चंट गिलहरियों को आज़ादी

वे किसी भी भाव को कुतरते

उम्मीद भरी मनचाही फुनगी तक जा

देर तक उस पर ठहरी रहे

 

बंध कर रहना कभी हो न सका

पंख कतर दे या उन्हें बांध दे या  

बड़े हवादार पिंजरे में रख छोड़े

उड़ना सम्भव न हुआ तब भी

पंख फडफडाना कभी न रुका

ज़िन्दगी भर जो किया

हमेशा अशर्त आवेग में किया

 

प्यार जैसे लफ्ज़ को लेकर

मन सदा सशंकित रहा

इसका वजूद ऐसा जैसे

अदृश्य परवरदिगार की उपस्थिति का विभ्रम

जैसे दूरस्थ इलाके से उठती

सामूहिक विलाप की लयबद्ध आवाजें

जैसे सदियों से उदास लड़की का

गहरी नींद में अचानक मुस्करा उठना

 

कभी कभी लगता है

मेरे पास से होकर कोई हमशक्ल गुजर गया

किसी ने मुझे बहुत धीरे से छुआ

किसी ने लगभग नि:शब्द पूछ लिया

बताओ , इस बार सफर कैसा रहा हमसफ़र

अबकी बार हर साँस के साथ

ख़ुद की शिनाख्त में कितनी एहतियात बरती.

 

अब जबकि दिन ढलने को हुआ

मन चाहता है कि ख़ामोशी टंकी चादर पर

पैरों को पसार कोलाहलपूर्ण सपने देखते

जी ली जाये बड़ी तसल्ली के साथ

एक हैरतअंगेज गहरी नींद

जिसके टूट जाने का कोई खतरा न हो.

 

 

बुधवार, 8 जुलाई 2020

सेकंड सैटरडे को मरा आदमी


उस दिन शनिवार था

वह आदमी तो चुस्त दुरुस्त था

गलत वक्त पर अनायास मर गया

लगभग आसमयिक

मरने से पहले दे गया देह

स्थानीय मेडिकल कॉलेज को.

 

गर्मी की भरी दोपहरी में

वह अपने शरीर को पलंग पर छोड़

आदतन चुपचाप फ़रार हो गया

घरवालों ने कॉलेज वालों को बताया  

मृतक के इच्छा पत्र से लेकर आधार पैनकार्ड

पासपोर्ट साईज फोटो तक सब है पांच प्रतियों में  

जल्द आओ मालवाहक लेकर और अपना सामान उठा ले जाओ.

 

कॉलेज के फोन से निकली  मशीनी आवाज़ ने कहा  

मान्यवर आज सेकंड सैटरडे है, कुछ न होगा

कृपया सोमवार को दोबारा कांटेक्ट करें, असुविधा के लिए खेद है

तब? तब तक? घर में चिंतातुर फुसफुसाहट गूंजी

शोक मनाएं मृत्यु का या फिर उत्सव जैसा चाहें.

लोगों को फुरसत से शोकाकुल हो लेने दें.

 

तभी हांफती कांपती एक मोहतरमा आई

उनका सीना सांस लेने की जल्दबाज़ी में

झटपट ऊपर नीचे होता

बोली-हमें अभी इनकी आँख ले जानी हैं

परसों तक ये बेकार हो लेंगी

घरवाले सोचते रहे कि कोई नासमझ बच्चा चीख उठा

क्या बाबा समूचे वीकेंड बिना आँखों के सोते रहेंगे.

 

वह वाकई बहुत बड़ा आदमी था

भावुकता से भरा लगभग मनुष्य जैसा  

मरने से पहले आना-पाई का हिसाब कर गया

पर मरते समय बड़ी चूक हुई उससे

वर्किंग-डे में मरता तो कोई झंझट न होता

वातानुकूलित केनोपी में देह धर, दिया जला

दान की देह उठाने वालों का 

निरर्थक इंतजार तो न करना होता.

 

 

सोमवार, 29 जून 2020

यह जानना हो तो

हंसना क्या होता है
यह जानना हो तो
किसी मसखरे से पूछो
बाकी लोग तो बस
यूँही हँस लिया करते हैं .
मुस्कान की थाह लेनी है
तो उस रिसेप्शनिस्ट से जानें
जिसके जबडों में
मुस्कराते रहने की जद्दोजेहद में
गठिया हो जाता है .
नग्नता का मर्म जानना है
तो उस कैबरे डांसर से पता करें
जिसे ठीक से तन ढकने की मोहलत
घर के बंद दरवाजों के पीछे
कभी कभार ही मिलती है .
मौन की भाषा को जानना है
तो झांक लो
उन लाचार आँखों में
जिन्होंने अभी तक हर हाल में
सच बोलने की जिद नहीं छोड़ी है .
कविता का मर्म जानना हो
तो उसे कागजों से निकाल
रूह तक ले जाओ
कविता की मासूम भाषा में
उम्मीद अभी तक जिन्दा है .
जिंदगी का मर्म जानना है
तो मौत की दहलीज़ तक ठहल आओ
इसे ऐसे सपने की तरह जियो
जो कच्ची नींद में टूट भी जाये
पर मन मायूस न हो .
नए शब्द नए भावार्थ गढते हुए
सब खुद –ब –खुद पता चलता है
किसी से कुछ मत पूछो
बहती नदी की गति को
तस्दीक की जरूरत नहींJ

गुरुवार, 18 जून 2020

आषाढ़ की तपती दोपहरी में लिखी कविता

दर्द याद रहता है 
ख़ुशी गुम हो जाती है
दंश विस्मृत नहीं होता
स्पर्श में से बचा रह जाता है
उतना हिस्सा
जो रह जाता है उँगलियों पर चिपक कर।
भूख अमाशय में रहती है
जिह्वा पर उड़ती है स्वाद की तितली
खाली पेट तमाम कोशिशों के बावजूद
मुनादी वाले नगाड़े सा नहीं बजता
तृप्ति एक फर्जी व्यंजना है
कविता के कूड़ेदान में पड़ी जूठन.
सच की बात करते करते
झूठमूठ चेहरे पर ओढ़नी पड़ती है उदासी
अपनापन खोजता आदमी अक्सर
निकल पड़ता है अंतरांध यात्रा पर
यात्रायें जो कभी नहीं थमतीं
जिनमें गति सदा संदिग्ध रही.
आषाढ़ के महीने में याद रहती है
ज्येष्ठ की भरपूर दोपहरी
टोंटी वाले घड़े से रिसता है
हमारे समय का सादा पानी
अलसाये हुए धूपिया वक्त में
पसीने में लथपथ कोई याद नहीं आती.
लोक कथाओं वाला प्यासा कौआ
अब क्यों नहीं आ बैठता घर की मुंडेर पर
उसकी चोंच में अब कोई पत्थर नहीं दिखता
हर हाल में ठंडे जल में
चोंच डुबा देने की उसकी चतुराई क्या हुई
उपस्थिति जताने वह बार बार क्यों नहीं आता.
तपते हुए जानलेवा दिनों में बचे
तो हम भी लम्बी ठण्ड भरी रातों में
बच्चों को सुनायेंगे
हंसते हँसाते जिंदा बच निकलने के
कुछ अविश्वसनीय चुटकुले
कुछ नितांत कपोल कल्पित कथाएं.

एक कविता उस सनबर्ड के लिए जिसे मैंने हमिंग बर्ड समझा

मैं उसे हमिंग बर्ड समझता
महज पांच ग्राम की चिड़िया
जो जब तब मंडराती
सफ़ेद बैगनी सदाबहार के फूलों के इर्द गिर्द
कितनी चंट है यह नन्हीं सी जान जानती
यहाँ मकरंद बारामासी मिलेगा.

थोड़ा-सा वजन उड़ती जाये फरर्र
बिना किसी कोशिश उड़ान भरे
एक छोर से दूसरे छोर तक
इतनी भागदौड़ किसके लिए
कितनी तृष्णा, कितने आयाम
जो सदा रह जाये अतृप्त.

हमिंग बर्ड बड़ी भोली होती है
बताया एक बहेलिये ने
पिंजरा बड़ा हो तो उसे समझ लेती उपवन
टांग दो कृत्रिम फूलों के बीच शहद भरे ऐम्पोल
वह सरलता से उसे मान लेती पुष्प रस
रसास्वादन करती रहती मगन.

वह सीधी-सादी है पर बड़ी चटोरी है
उसकी दुनिया मधु से इतर नहीं
मैं जब गहरे असमंजस से भर उठा
तब अनायास पता लगा
यह हमिंग बर्ड नहीं देशज सनबर्ड है
जिसे उड़ना ही नहीं तीखी आवाज़ में गाना भी आता है.

हमिंग बर्ड सन बर्ड जैसी सिर्फ दिखती है
पर दोनों की है अलग-अलग दुनिया
पृथक पृथक आसमान
अपनी –अपनी चहचाहट
उड़ान का निजी व्याकरण
उनके आवेग भी नितांत मौलिक हैं.

शुक्रवार, 12 जून 2020

साइकिल पर टंगी ढोलक



अलसभोर जा रहा साइकिल पर बांधे
सलीके से मढ़ी , हरी पीली ढोलकें
इसकी थाप पर सदियाँ गाती आईं
अपने समय के मंगलगान
जटिल समय में सवाल यह, कौन बजाये इसे
स्वछंद विचरते यम के दूतों के समक्ष.

शहरों में मुर्दे कतारों में हैं  
परिजन जिंदा बने रहने की ख्वाईश लिए
कनखियों से देखते ,उकताते कहते
अब मर तो गयी देह
अब कितना वक्त और लगेगा
इसके इहलोक से परलोक गमन में.

सड़क पर डंडा फटकारता सिपाही पूछ रहा
ए रे , तू कहाँ चला ढोलक लिए सवेरे सवेरे
जवाब आता, बच्चे भूखे बिलखते घर पर
सोचता , इनमें से एकाध बिक जाये तो
मेरे बच्चे भी थोड़ी देर मगन हो लें
भरे हुए पेट के साथ गाते बजाते.

वह कहता, अजी सिपाहीजी निकल जाने दो
क्या पता किसी गली-कूंचे  में
ढोलक के बिना अरसे से स्थगित हो
किसी जगह कोई क्वांरी उत्सवधर्मिता
बाट जोहती हो कदाचित जिद्दी स्वप्नजीवी
कायदे से मढ़ी हुई ढोलक की.

वक्त चाहे जितना भविष्य विरोधी हो
फिर भी कतिपय थाप
थिरकने को आतुर जनाना पाँव
कामनाओं की स्वर लहरी मौजूद  रहती है
अपने अपने किस्म के
समयानुकूल निर्द्वन्द निर्वात में.

साइकिल पर टंगी हरी पीली ढोलकें  
बड़ी जादुई हैं यकीनन
ये हैं थाप की संगीतमय उपस्थिति है
कुछ दिनों के लिए
रुखी सूखी रोटी का जुगाड़ है
बचीखुची जैसी –तैसी आस है.






मोची राम

साइन लैंग्वेज और कटफोड़वा की खट-खट

महामारी के भीषण दिनों में उन लोगों ने बातून नौनिहालों को जबरन सिखवाया सिर्फ इशारों ही इशारों में अपनी जरूरत भर की बात कह लेना किसी मूक बघिर...