रविवार, 28 जून 2015

यदि जानना है तो .........


हंसना  क्या होता  है
यह जानना हो तो  
किसी  मसखरे से पूछो
बाकी लोग तो बस
यूँही हँस लिया करते हैं .

मुस्कान की थाह लेनी है
तो उस रिसेप्शनिस्ट से जानें
जिसके जबडों में  
मुस्कराते रहने की जद्दोजेहद में
गठिया हो जाता है .

नग्नता का मर्म जानना है
तो उस कामगार महिला से जानो 
जो दिन भर काम पर लगे होने के बाद भी 
तन को ढंग से ढांपने लायक  
कपड़े नहीं जुटा पाती  है .

मौन की भाषा को जानना  है
तो झांक लो  
उन लाचार आँखों में
जिन्होंने अभी तक हर हाल में
सच बोलने की जिद नहीं छोड़ी है .

कविता का मर्म जानना हो
तो उसे कागजों से निकाल
रूह तक ले जाओ
कविता की मासूम भाषा में
उम्मीद अभी तक जिन्दा लफ्ज़ है .

जिंदगी का मर्म जानना है
तो मौत की दहलीज़ तक टहल आओ
इसे ऐसे सपने की तरह जियो
जो कच्ची नींद में टूट भी जाये
तो  मन कतई  मायूस न हो .

नए शब्द नए भावार्थ गढते हुए
सब खुद –ब –खुद पता चलता है
बहती नदी की गति को  
किसी तस्दीक की जरूरत नहीं





गुरुवार, 21 मई 2015

तुम्हारे बिना अयोध्या


राम !
तुम्हारी अयोध्या मैं कभी नहीं गया
वहाँ जाकर करता भी क्या
तुमने तो ले ली
सरयू में जल समाधिl

अयोध्या तुम्हारे श्वासों में थी
बसी हुई थी तुम्हारे रग-रग में
लहू बन कर l
तुम्हारी अयोध्या जमीन का
कोई टुकड़ा भर नहीं थी
न ईंट गारे की बनी
इमारत थी वहl
अयोध्या तो तुम्हारी काया थी
अंतर्मन में धड़कता दिल हो जैसे 

तुम भी तो ऊब गए थे
इस धरती के प्रवास से
बिना सीता के जीवन
हो गया था तुम्हारा निस्सार
तुम चले गए
सरयू से गुजरते हुए
जीवन के उस पारl
तुम गए
अयोध्या भी चली गई
तुम्हारे साथ 

अब अयोध्या में है क्या
तुम्हारे नाम पर बजते
कुछ घंटे घडियालl
राम नाम का खोफनाक उच्चारण
मंदिरों के शिखर में फहराती
कुछ रक्त रंजित ध्वजाएंl
खून मांगती लपलपाती जीभें
आग उगलती खूंखार आवाजेंl
हर गली में मौत की पदचाप
भावी आशंका को भांप
रोते हुए आवारा कुत्ते l

तुम्हारे बिना अयोध्या
तुम्हारी अयोध्या नहीं है
वह तो तुम्हारी हमनाम
एक खतरनाक जगह है
जहाँ से रुक -रुक कर
सुनाई देते हैं
सामूहिक रुदन के
डरावने स्वरl

राम !
मुझे माफ करना
तुम्हारे से अलग कोई अयोध्या
कहीं है इस धरती पर तो

मुझे उसका पता मालूम नहीं l

बुधवार, 20 मई 2015

भला आदमी


वह एक भला आदमी था
चुपचाप चला गया
अपनी देह से बाहर
बिना चप्पल पहने
हालाँकि  कुछ पल पहले ही
उसने अपने से कहा था
यार बड़ी भूख लगी है .

वह एक भला आदमी था
जिसे कभी न ढंग से जीना आया
और न कायदे से मरना
ऐसे चला गया जैसे
कोई झप्पर से बाहर आये
मौसम का मिजाज भांपने  .

वह एक भला आदमी था
जिन्दा रहने की ललक कहें  या मजबूरी
उसे लगातार पता लगता रहा कि
जीने के लिए बार बार मरना होता है
फिर भी जीने लायक  पुख्ता जगह
शायद ही कभी मिल पाती है .

वह एक भला आदमी था
उसके तकिये के नीचे से मिले  हैं
कुछ हस्तलिखित पन्ने
जिनकी इबारत कविता जैसी दिखती है
लोग सशंकित हो उठे हैं
वह जितना दिखता था
उतना भला तो नहीं था .

वह एक भला आदमी था
अपनी निजता संभाल नहीं पाया
ठीकठाक तरीके से
उसके बारे में उठ रहे हैं सवाल 
वह यूं क्यों चला गया दबे पाँव
इस तरह भी कोई जाता है भला !
+++++.     
 






मंगलवार, 12 मई 2015

तब समझ लेना




रोटी का पहला कौर तोड़ते हुए
जब खेत खलिहान में लहलहाती
दूध से भरी गेहूं की बालियाँ याद न आयें l

गर्म दूध को पीने से पहले
फूंक मार कर उसे ठंडाते हुए
गाय के थन में अपना जीवन टटोलते
बछड़े का अक्स सामने  न उभरे l

पानी पीने के लिए
गिलास को मुहँ से लगाते ही
कोसों दूर से मटकी भर जल लाती  
बहुरंगी ओढ़नियों से छन कर आता     
पसीने से लथपथ संगीत  सुनाई न दे l

रात के घुप्प अँधेरे में
सुदूर गांव से आती
सिसकियाँ और मनुहार 
सुनाई देनी कतई बंद हो जाएँ l

गर्मागर्म जलेबी को खाते हुए
गांव वाली जंगल जलेबी का 
मीठा कसैला स्वाद जिह्वा पर
खुदबखुद न तैर जाये   l

तब समझ लेना
तुम चले आये हो
अपने घर बार से दूर
इतनी दूर
जहाँ से वापस लौट आने की

अमूमन कोई गुंजाईश नहीं रहती l

सोमवार, 9 मार्च 2015

जब हम .......


जब हम ब्रेड के स्लाईस पर
मक्खन की परत लपेट कर
उसे धीरे धीरे कुतरते हुए 
पिंजरे में फंसे चूहे से दिख रहे होते हैं 
उस वक्त ब्रह्माण्ड के किसी कोने में 
कोई रानी अपनी भूखी प्रजा का 
रोटी के बजाय
केक खाने का परामर्श देती है .
जब हम पुराने अख़बारों के हाशियों पर
क्रांति का रोडमैप और
औरत की नंगी तस्वीर बनाते हैं
रद्दी खरीदने वाला
कागज की फिजूलखर्ची
और हमारे मसखरेपन की खिल्ली उड़ाता
बगल की गली से गुजरता है .
जब हम दिनभर की बकझक के बाद
थके हुए जबडों के साथ
अपनी अँधेरी गुफाओं में
प्रवेश करते हुए सहमते हैं
तब वहीं कहीं छिप कर बैठा गीदड़
हमारे खुद-ब-खुद मर जाने का सपना
कच्ची नींद में देखता है .
जब जीवनदायनी मकसद की नदी
भरी बरसात में रीतने लगती है
और हम जा छुपते हैं
सूखे भूसे जैसी कविताओं के ढेर में बनी
दीमकों की बाम्बी में
तब चकमक पत्थर में ठहरी चिंगारी को
आग़ में तब्दील होने की वजह मिलती है .
जब छाया युद्ध लड़ने में निष्णात कायर
यशस्वी योद्धा का बाना धारण कर
इतिहास के गलीच पन्नों में से
अपने लिए प्रभामंडल
और राजमुकुट ढूंढ लाते हैं
तब भूख से बेचैन गिद्धों को
महाभोज की भनक मिलती हैं .
++++++

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2015

मेरठ : एक समय ऐसा भी गुजरा


एक समय ऐसा भी गुजरा
जब मेरे शहर आया था श्रवणकुमार
कांधे पर बेंगी को संतुलित करता 
उसके पलडों में धरे
दृष्टिहीन और अशक्त माँ बाप को
तीर्थाटन के लिए ले जाता हुआ .
एक समय ऐसा भी गुजरा
जब रूपसी मंदोदरी जाया करती
अपनी सहेलियों के साथ चुहुल करती
गाती गुनगुनाती
निर्मल जलाशयों में स्नान करने जाती
निर्विघ्न निर्द्वन्द्व .
एक समय ऐसा भी गुजरा
जब हस्तिनापुर से कुरुक्षेत्र की ओर
कूच करती सेनाओं की पदचाप से
दहल उठा था सारा नगर
और लोग खोजते रह गए थे
धर्म और युद्ध के संधिस्थल .

एक समय ऐसा भी गुजरा
जब रणबांकुरे निकले थे सड़कों पर
तलवारें लहराते बारूद दागते
एकजुट एकमुश्त
आज़ादी के तरानों से
सोयी पड़ी इंसानियत को जगाते .
एक समय ऐसा भी गुजरा
जब शहर भर के मसखरे जा घुसे
इतिहास के पीले पन्नों में
और यहाँ की फिजाओं को
उन्होंने रंग डाला
बदनामी के पुनर्पाठ से .
एक समय ऐसा भी गुजरा
जब इतिहास पुरुष बना दिए गए
जातिगत गौरव के सुदर्शन चेहरे
श्रवणकुमार ने बेंगी को धरती पर पटक
माँ बाप को कर दिया
अपने नेह और वक्त से बाहर .
एक समय ऐसा भी गुजरा
जो ठीक से बीता नहीं
ठहरा ही रह गया
मेरे शहर की गंदगी से बजबजाती
संकरी गलियों में
किसी अश्लील किस्से की तरह .
++++











शनिवार, 15 नवंबर 2014

सच से भी ज्यादा

  
मुझे किसी ने बताया कि
जब कभी किसी ने किसी से प्यार करके
उसे जताने की कोशिश की
तभी उसने पहली बार ऐसा झूठ बोला
जो किसी सच से अधिक खूबसूरत था .

मुझे किसी ने बताया कि
झूठ के जरिये लिखी जाती रही हैं
सदा कालजयी प्रेम कथाएं
सच के नीले लिटमस पेपर पर तो
केवल अम्लता ही दर्ज होती है .

मुझे किसी ने बताया कि
झूठ प्रिज्म जैसा  होता  है
इसमें से उपजता है इन्द्रधनुष
सच का प्रभामंडल पारदर्शी होता है  
उसमें से कोई अक्स नहीं उभरता  .

मुझे किसी ने बताया कि
झूठ समय की शिला पर घिसते घिसते
सच जैसा आकार पा जाता  है
सच इतना सख्तजान  होता है
जहाँ है जैसा है पड़ा रहता है .

मुझे किसी ने बताया कि
झूठ न होता तो
दुनिया में एक भी कविता न होती
सच कभी किसी के लिए  
अभिनव रचने  की जिद नहीं  बनता  .

मुझे किसी ने बताया कि
झूठ के पास उम्मीद है
एक दिन सच में तब्दील हो जाने की
लेकिन सच का अहंकार
उसे टस से मस नहीं  होने देता  .

मुझे किसी ने बताया कि
जिंदगी को बिंदास जियो
झूठ और सच से इतर भी
एक भरीपूरी दुनिया है .
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शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

हमारे तुम्हारे बीच


हमारे तुम्हारे बीच
जब कोई सहमति नहीं थी
तब हमारे दरम्यान
बहती थी गीली हवा
देह को  बड़ी एहतियात से छूती .
तब हम अपनी निशब्दता में
किस कदर बतियाया करते
अधर स्थिर रहते
और चुम्बन की गर्माहट
सीधे दिल में उतर आती .
तब हमारे पास था कितना कुछ
अपनी ख़ामोशी में
लगातार सुनने सुनाने को
मन के भीतर बजती थी जलतरंग
निजता में निरंतर संलिप्त  .
तब हम चहलकदमी करते हुए
पहुँच जाते  क्षितिज तक
और तुम एड़ियों पर उचक कर
अपनी अंजुरी में भर लेती थीं
इन्द्रधनुष के सारे रंग .
तब हमारे पास थी फुर्सत
उन्मुक्त  कवितायें
मस्त हवाओं के साथ
कामनाओं के जंगल में
नाचने का उतावलापन  .
अब जब हमने बना लिया
अपनी देहों के बीच कामनाओं  का पुल
देखते ही देखते बहने लगी
एक चिड़चिड़ी नदी हमारे पैरों तले
सब्र और पुल का इम्तेहान लेती .

रविवार, 20 जुलाई 2014

रात के दस बजे


रात के सिर्फ दस बजे हैं
और शहर में बकायदा रात हो चुकी है
जिसके बारे में धारणा यह है कि रात होती ही इसलिए है
ताकि जैसे तैसे पेट को भर लिए जाने के बाद
चारपाई पर औंधे मुहँ गिर कर सोया जा सके
अगली सुबह उठने वाले सवालों से बेपरवाह
किसी भी तरह की उम्मीद को
जूठे बर्तनों  की तरह  कोने के हवाले करते  हुए .

रात के सिर्फ दस बजे हैं
जिंदगी के  कुछ अपरिहार्य  सबूतों के सिवा
अधिकांश  साक्ष्य गायब हो चुके हैं .
चंद सिरफिरे लोगों के मस्तिष्क की हांड़ी में
अँधेरे के खिलाफ बगावत के पुलाव पक रहे है
ये लोग फर्ज़ी सपनों के खिलाफ
लामबंद होने की कोशिश में हैं .
और इनकी नींद पर
सवालिया निशान लटका है .

रात के सिर्फ दस बजे हैं
राज्य के गुप्तचर गली गली घूम रहे हैं
जागते हुओं की हरारतों को सूंघते
 प्रत्यक्षतः सोये  हुए  शहर की धड़कन में
विस्फोट से पहले की टिक - टिक को सुनते .

रात के सिर्फ दस बजे हैं
शहर के घंटाघर पर लगी घड़ी
सदियों से दस बज कर दस मिनट ही बता रही है
यह  समय यहाँ  से होकर कब गुजरा था ,
दिन में बीता था या रात में
किसी को  न तो  पता है
और न जानने की दिलचस्पी है.
इस घड़ी के शीशे के बारे में
कम- से- कम मैं कुछ नहीं जानता .

रात के सिर्फ दस बजे हैं
अपने बसेरे से अंगडाई भर कर उड़ा चमगादड़
घड़ी की सुईं पर जा फंसा है
और इतिहास के पन्नों में अटका हुआ शहर
एक मासूम परिंदे की नादानी से
अनायास जाग उठा है .

रात के सिर्फ दस बजे हैं
लोगों को नीम अँधेरे में सुनाई दे रही है
एक चमगादड़ की फड़फड़ाहट .


तकिया


मैंने अपने तकिये पर
बड़े आहिस्ता से सिर टिकाया
दीवार पर टंगी घड़ी से उठती 
जिद्दी टिक - टिक को टोका
फिर लम्बी गहरी सांस ली
जिंदगी का एक दिन और
कम हो जाने का जश्न मनाया .
मैंने अपने तकिये पर
सिर टिकाये टिकाये अनुरोध किया
भईया भूलना मत
नींद और सपनों की फ़िक्र किये बिना
मुझे अल्लसुबह ही जगा देना
कल मुझे भरपूर जिंदगी जीते हुए
अनेक जरूरी काम निबटाने हैं .
मैंने अपने तकिये पर
हमेशा बहुत भरोसा किया है
और उसने मुझे कभी निराश नहीं किया
वह मेरे हर राज का राजदार है
उस पर अंकित है
मेरी आत्मकथा की हर इबारत
गम और जूनून की तफ़सील के साथ .
मैंने अपने तकिये पर
लिख रखा है अपना शोकगीत
इस यकीन के साथ कि मेरे बाद
जिन्दा बची नस्लें इसी पढ़ेंगी
और शोकाकुल होने की
वजह न पाकर खिलखिला पड़ेंगी .
मैंने अपने तकिये पर
अगले सात जन्मों की यात्रा का
मानचित्र टांक रखा है .

स्मृति का अस्तबल

स्मृति के अस्तबल में हिनहिना रहे हैं
बीमार  अशक्त और उदास घोड़े
अतीत की सुनहरी पन्नी में लिपटे
इन घोड़ों को यकीन नहीं हो रहा
कि वे वाकई बूढ़े हो चले  हैं |

रेसकोर्स में सरपट भागते भागते
वे भूल चुके थे स्वेच्छा से थमना
ठिठकना और ठिठक कर मुड़ना
पीछे घूम कर अपने फौलादी खुरों के साथ
निरंतर घिसते  हुए  समय को देखना.

घोड़े अपने सपनों में अभी भी दौड़  रहे हैं
बीत गए वक्त को धता बताते
असलियत के मुख को  धूलधसरित करते
अपनी जीत और जीवन का जश्न मनाते
यह  उनका  सच को नकारने का अपना तरीका है .

अस्तबल में खूंटे से बंधे बूढ़े घोड़े
अभी तक जब तब हिनहिना लेते हैं
ताकि शायद  उनकी कोई सुध ले
उन्हें लौटा दे  बीता हुआ वक्त
उमंग उत्साह और रफ़्तार |

 स्मृति के अस्तबल में
बीमार अशक्त और उदास घोड़े ही नहीं
अनेक अगड़म सगड़म चीजों के साथ
कुछ ऐसे दु:स्वप्न भी रखे  हैं
जिन्हें इत्तेफाक से
घोड़ों की तरह हिनहिना  नहीं आता |

और सबसे हैरतअंगेज़ बात यह कि
ये घोड़े आईने के नहीं बने हैं
फिर भी इनमें कभी कभी  मुझे
अपना अक्स दिख जाता है .

मोची राम

साइन लैंग्वेज और कटफोड़वा की खट-खट

महामारी के भीषण दिनों में उन लोगों ने बातून नौनिहालों को जबरन सिखवाया सिर्फ इशारों ही इशारों में अपनी जरूरत भर की बात कह लेना किसी मूक बघिर...