रविवार, 25 अप्रैल 2021

आज अलसभोर

 







अलसभोर घर की छत पर खिंची

कपड़े सुखाने वाली प्लास्टिक की डोर पर

एकाकी चिड़िया चहचहा रही

वह वाकई चहचहा रही या

पुकारती अपनी बांधवी को , कौन जाने

दिन की शुरुआत का यह अप्रत्याशित तरीका है.

 

आज का बिना खुला अखबार

दरवाजे पर पड़ा बेवजह फड़फड़ाता है

उसके अंदरूनी पेजों  से

रिस रही है रह रह कर

गिद्धों के महाभोज की खबर

मुखपृष्ठ पर स्वादिष्ट स्वास्थ्यवर्धक

चाॅकलेट के आमद की महत्वपूर्ण सूचना है.

 

उसके हाशिये पर यकीनन छपी होंगी

उचित इलाज न मिलने के चलते मरे आदमी

बिलखते बच्चों और विलाप करती औरतों की तस्वीरें

गैस और प्राणरक्षक दवा के लिए

दर दर भटकते भाग्यविहीन लोगों की तकलीफों का  

सिंगल कॉलम व्यंग्यात्मक  विवरण भी होगा.

 

अखबार उठाते -खोलते मन डरता है

सुनाई देती है इसमें से

मंत्रोच्चार के साथ कूच करती हुतामाओं की

कूटनीतिक पदचाप

इस क्रूर और जटिल समय में

जीना भी हुआ लगभग हास्यास्पद.

 

बरामदे में रखी सरकंडे की कुर्सी पर बैठ

रोज सुबह सवेरे ख्याल आता है

बिना कुछ लिखे पढ़े

महज़ अटपटे अनुमानों, भदेस चुटकुलों और

अनमोल वचनों  के सहारे

जितना वक्त निरापद गुजर जाये

चैन की सांस  लेते, वही बेहतर.

 

 

 

शनिवार, 24 अप्रैल 2021

मरता हुआ आदमी




कोविड वार्ड में मरणासन्न आदमी
किसी चमत्कार का इंतजार नहीं करता
वह नहीं देखता नीम बेहोशी में
भविष्य का  कोई सपना
अतीत की दुनिया  में पाता है वह
दर्द से परे आनन्द से लबरेज अदद निरोगी परकाया.

कोविड वार्ड में मरणासन्न आदमी
हताशा से परे अन्वेषित कर लेता है
किसी ड्राईक्लीन की दुकान पर बरसों पहले गुम हुई
अपनी पसंदीदा ढेरों जेब वाली
हल्के हरे रंग की पतलून जैसी उम्मीद
हालांकि अब इस तरह की पोशाक
मसखरे भी नहीं पहनते आजकल.

कोविड वार्ड में मरणासन्न आदमो
किसी गैस या इंजेक्शन के आने की खबर पा
अविश्वास से पलक नहीं झपकाता
अविचल छत में लगे पंखे को
बड़े इत्मिनान से घूरता है
उसकी देह वेंटिलेटर से हटे
मरने के लिए वोटिंग में पड़ा
कोई और बन्दा आगे बढे.

कोविड वार्ड में मरणासन्न आदमी
जिंदा मुर्दा के आंकड़े से बाहर है
अब उसे कहीं आने-जाने की
कोई जल्दबाज़ी नहीं
समीपस्थ शमशान में सुलगती गीली लकड़ियों का
धुंआ ही धुआं भरा है.

कोविड वार्ड में मरणासन्न आदमी
धीरे धीरे अपनी देह से बाहर जा रहा है
उसकी मृत्यु का घोषणापत्र कम्प्यूटर में है
रिक्तियों के बीच उसकी शिनाख्त की पूर्ति हो तो
वह अंततः बाकायदा मरे
ढंग से मरने में भी लाखों अड़ंगे है

मंगलवार, 20 अप्रैल 2021

बेटे के महानगर में

 


 

 बेटे के महानगर में

कोई धरती, कोई आसमान नहीं

सिर्फ बॉलकनी है, जहाँ से दिखती हैं

यहाँ-वहां सरकती बौनों की कतार

दर्पण से विमुख, आपको हक है

मानते रहो खुद को विशालकाय गुलीवर.

 

बेटे के महानगर में

बहुत कुछ स्वचालित है

मौसम के मिज़ाज से लेकर

प्रेमपगा नगमा तक सुनाने वाला एलेक्सा है

तरह तरह की बातें

समय रहते याद दिलाने वाले उपकरण  हैं

कहीं कोई भूलचूक नहीं, सभी कुछ अचूक.

 

बेटे के महानगर में

सुकून भरे जिंदादिल घर-बार नहीं

बच्चों की किलकारियों से भरे आंगन  नहीं

एक दूसरे को चुपके-चुपके निहारती

लालसा भरी अलमस्त सरगोशियाँ नहीं

हाउसिंग लोन की ईएमआई का गुणा-भाग है.

 

बेटे के महानगर में

राजधानी के बगलगीर होने का

पराई हल्दी की गाँठ पा

पंसारी बन बैठने का बहुरुपियापन है

वीकेंड पर छीजती जिन्दगी रिचार्ज करने को

मसालेदार पानी-पूरी गटकने या

ठण्डी-ठार बियर पीने की बेमिसाल ऐय्याशी है.

 

बेटे के महानगर में

फोन या लैपटॉप में ऊँगलियां  फिराते ही

हुक्म बजा लाने वाले जिन्न मौजूद हैं  

वे कभी किसी बात पर सॉरी नहीं उच्चारते 

थैंक्यू कहे जाने की उम्मीद नहीं करते

अपने काम से काम रखते हैं.

 

बेटे के महानगर का

कोई मोहनजोदड़ो या हड़प्पा नहीं

सिर्फ सख्त खुरदरी बंजर जमीन है

जहाँ चीटियों तक ने अरसा हुआ आत्महत्या कर ली 

तितलियाँ ने मकरंद की आस स्थगित की

खुशबु और स्वाद बोतलबंद हुए.

 

बेटे के  महानगर में

उजाला खिडकियों में लगे कांच के पीछे रहता है

अँधेरा स्वेच्छाचारी है

उसके होने या न होने से कोई खास फर्क नहीं पड़ता

अलादीन का चिराग नदारद  हैं

उआज्ञाकारी जिन्न ही जिन्न हैं चारों ओर.

 

बेटे के महानगर में

कार्यकुशल रोबोट ही रोबोट हैं

शिनाख्त हरदम गले में झूलती  है

विविध पासवर्ड समय-असमय गुम हो लेते  हैं

उसका नाम वर्तमान की तरह ऑब्सलीट हुआ  

जिसे बताता वह बेवजह शरमाता है.

 

बेटे के महानगर में

मेरा बेटा वहां नहीं रहता

डाटा से लबरेज़ मैमोरी कार्ड रहता है

चाहे –अनचाहे

उसे खंगालने हमें  बार-बार

उसके पास प्राय: आना जाना होता है.

 

 


रविवार, 4 अप्रैल 2021

राजा का सच


 कविता के लोकतंत्र में

राजा खुलेआम निकलता है
मौलिक नँगई का राजदण्ड लिए
नंगे को नंगा कहने वाला बच्चा
पोर्नोग्राफी पर निगाह गड़ाये है
ज़रा -सी फुरसत मिले
तो दोबारा सच बोले.

शुक्रवार, 26 मार्च 2021

उसे जानना है

 


उसने लड़कों की तरह

अपनी पेंट की दोनों जेबों में

हथेलियों को छुपाया.


इससे पहले अपने लहराते बालों को

करीने से इस तरह सरकाया 

वह कुछ और बिखर- उलझ  गये.

 

इसके बाद उसने जल्दी जल्दी

गहरी सांस अपने भीतर भरी

बहुत हौले से उसने मन पर लगी

स्मृति की एक चिप्पी उघाड़ी.


हवाओं से सवाल किया  

क्या खुद से मोहब्बत करने का

एक तरीका यह भी होता है.

 

कभी कोई मासूम-सा लड़का मिला

जो बदले  में कोई प्रतिप्रश्न न करे

उससे एक न एक दिन

अनायास यह बात जरूर जाननी है.


यह तो उसे पता है 

हर प्रेमपगी जिज्ञासा अतार्किक होती है

लगभग आत्मरति जैसी 

कोई अकारक क्रिया.

 

बुधवार, 10 मार्च 2021

अनंतिम बयान

अनंतिम बयान  

 

मेरे अहद की जवान लडकियाँ

अब नहीं देखती अंतरंग ख्वाब

वे अपनी कच्ची नींद में

अलसभोर सीखती हैं

परफेक्ट फंदा लगाने का इल्म

लिखती है सुसाइड नोट जैसा कुछ

मृत्युपूर्व का अनंतिम बयान।

 

लड़कियों के लिए जिन्दगी जटिल हुई जाती है

उनके पास अब जिन्दा बचे रहने की अपेक्षा

चैन से जान गंवा देने की वजह अधिक मौजूद हैं

मौका मिलते ही कोई न कोई सफेदपोश

कहीं न कहीं दिख ही जाता है

पैने नाखून और सख्त जबड़े वाले भेड़िये में

गुपचुप परकाया प्रवेश करता।

 

सभ्रांतजन रात-दिन चिंता के घटाटोप में उतराते

लडकियों के लिए तय करते हैं ड्रेस कोड

उनकी देह के उन हिस्सों की करते हैं शिनाख्त

जिनका बेवजह उघड़े रह जाना

अनियंत्रित रेडियोधर्मिता के रिसाव से भी अधिक

शांतिपूर्ण जीवन बिता रही प्रजा

और स्वछंद सम्राट के लिए 

जानलेवा मसला है।

 

इक्कीसवीं शताब्दी के

तीसरे दशक की तमाम लड़कियां

ठीक से जवान या अधेड़ हुआ बिना

जल्द से जल्द बुढा जाने की फ़िराक में हैं

कंक्रीट के अरण्य में आक्रांत लड़कियाँ

जवान दिखने से बेतहाशा कतराती हैं।

 


गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

चार छोटी कवितायें

 


एक :

मैंने उम्र भर खुद से पूछे इतने सवाल
कि अगले कई जन्म
मैं सिर्फ जवाबों के चप्पुओं से
खे ले जाऊँगा
अपने मुस्तकबिल की कागज़ी नाव.
दो :
देह पर जब न बचा कुछ भी
उघाड़ने लायक
तब उन्होंने कहा ज़रा लजाते हुए
आओ चलो खेलें हम-तुम
छुपम-छुपाई; छुआ-छुआई का
रूहानी खेल।
तीन:
स्मृतियाँ बड़ी खूंखार होती हैं
आदमखोर और वनैली भी
वक्त के विस्मयबोधी चिन्ह के नीचे टंगी
रक्ताभ बूँद से अधिक क्रूर
कायनात में कुछ भी नहीं.
चार :
उँगलियाँ बेहया होती हैं
रीढ़ कांपती है देर तक
स्पर्श भर से
आँखें रंग बदलती हैं पलछिन
इन्र्द्रधनुष देह में
अनायास खिंचा जाता है.

रविवार, 22 नवंबर 2020

वक्त की रेत

 

मेरी उधड़ी हुई जेब में है

उदासी ही उदासी

कालातीत दुर्लभ।


मेरी बंद मुट्ठी में भरी है

सिर्फ़ रेत ही रेत

रेतघड़ी वाले वक्त से

उसका कोई लेना देना नहीं।

 

मेरे भीतर की खोह में है

वनैली मुस्कान का बसेरा है 

इच्छाओं के रक्तरंजित सफ़े

पलक झपकते पलटते हैं।


समय पर ठहरी देह  

हौले-हौले

बेआवाज़ व्यतीत हुई जाती है।

 

बीतता वक्त

 


प्यार को लेकर सदा संशय रहा

प्रार्थना के लिए न मिले उपयुक्त शब्द

उधार लिया आनन्द कब रीता पता न चला

साइकिल चलाना सीखते सीखते

हैडल से हाथ हटा देखने लगा

पता नहीं कब अजब अश्लील सपने.

 

बचपन उहापोह में बीता

कैशोर्य आशंकाओं में व्यतीत हुआ

जवानी रीती मायूसी  में

कहीं कुछ उल्लेखनीय  न घटित हुआ

अपना नाम ऐसे उच्चारा 

किसी दुर्दांत अपराधी का नाम लिया.

 

जीवन की सांध्य बेला  में

भावुकता का आग्रह है कि

बीते वक्त को तिलांजलि दे

बंधुजनों से कहा जाये

जाओ लौट जाओ अपने अकेलेपन में

चलो, हम ख़ुद से देर तक बतियायें.

 

मोची राम

साइन लैंग्वेज और कटफोड़वा की खट-खट

महामारी के भीषण दिनों में उन लोगों ने बातून नौनिहालों को जबरन सिखवाया सिर्फ इशारों ही इशारों में अपनी जरूरत भर की बात कह लेना किसी मूक बघिर...