मंगलवार, 5 सितंबर 2017

मुझे पता है


मुझे पता है कि आसमान का रंग नीला है
नीलेपन का यह कौन सा शेड है
नहीं मालूम
किसी बात के कुछ-कुछ पता होने से
कुछ नहीं होता लेकिन
आसमान फिर भी वही रहता है
बेनामी परिंदों और सपनों की उन्मुक्त सैरगाह.

मुझे नहीं पता कि जो परिंदा
झाड़ियों के झुरमुट में चहकता है
उसके  इस तरह से संगीत में उबडूब करने की
असल वजह क्या है
रागात्मकता का कोई नाम नहीं
फिर भी झाड़ी की हरीतिमा में
कुछ तो है
जो सन्तूर के  सौ तारों पर बजता है.

वह अलस्सुबह घर से निकलती है
तेज डग भरते हडबडाई सी
होंठों ही होंठों में कुछ बुदबुदाती
वह कोई प्रार्थना करती है या
वक्त की ब्रेल लिपि को
अधरों से बांचती है ,नहीं पता
उसकी अनाम छवि  फिर भी
मेरे अंतस की पोशीदा गहराई में
गुद गयी है टैटू बन कर.

बहुत सी बातें हैं
जिनको मैं थोड़ा बहुत जानता हूँ
इतना कि वह एकदम न जानने जैसा ही है
अनुमानों की खूँटी पर
मैंने टांग ली हैं अनेक दंतकथायें
जिनके सच होने या न होने के बीच
सिर्फ एक औगढ़ अपनापन है.

तर्क से अंगुल भर नीचे
वितर्क के पाताल के बीचों बीच
तमाम अटकलों को दरकिनार करती
निशब्द बहती जीवन की नदी है
जो अपनी ख़ामोशी में भी
एक के बाद एक मुकम्मल कविता
स्मृति के हाशिये पर लिखे जाती है.




मंगलवार, 29 अगस्त 2017

भावुकता और कारोबार .


वह किसी भाई से
किसी को खलास करने की
सुपारी लेकर आया है
बीमार बहन की मेडिकल रिपोर्ट देख
बार बार भींच रहा है मुट्ठियाँ
उसे इलाज कर रहे डॉक्टर से कोई गिला नहीं
अलबत्ता अपने मुकद्दर से बेहद नाराज  है.

वह शुभचिंतकों से सुन  आया है
चिमटे वाले बाबा के चमत्कार की गौरव गाथाएं
उसे डॉक्टर की कारगुजारी पर भरोसा है
और बाबा की अलौकिकता पर भी है
आंशिक यकीन
वह दवा और दुआ में से
किसी एक को चुनने में कतराता  है.

वह देख रहा है
अपनी बहन को धीरे धीरे मरता
अपने टारगेट की हँसती खिलखिलाती जिंदगी की
रत्ती भर भी फ़िक्र नहीं
उसे अपनी पतलून में खोंसी गये
इंग्लिश घोड़े की लिबलिबी पर
लेशमात्र भी संदेह नहीं है.

उसकी जेब में रबर छल्ले  में लिपटे
नोटों के गुल्ले हैं
जिन पर बापूजी दायें कोने पर अंकित हैं
और तार से बनी उनकी गोलाकार ऐनक वाम कोने पर  
यदि इस पर हिटलर और
उसकी तितली कट मूंछ रही होती
तब भी ये सुपारी होने के बावजूद
फरफराते हुए करेंसी नोट ही होते.

बहन उसकी भावुकता है
सुपारी उसके  कारोबार का कूटशब्द
दवा और दुआ के बीच
मौत एक अदद जिंदा लफ्ज़ है
उसे अच्छे से पता है
हर किसी को किसी न किसी दिन
वक्त बेवक्त फरार  होना ही है.





शुक्रवार, 25 अगस्त 2017

बच्चे का खेल


बच्चे क्लाशिनोकोव से खेलते  हैं
निकलते हैं मुंह से
गड़ गड़ की आवाज़
खेल ही खेल में
वे धरती पर लोटपोट हो जाते हैं
जिंदगी के पहले पहर में कर रहे हैं.
मृत्यु का पूर्वाभ्यास .

खेलते हुए बच्चे के भीतर
रगों के दौड़ते लहू को
जल्द से जल्द उलीचने की  आतुरता है
लड़ते हुए मर जाना
उनके लिए
रिंगा रिंगा रोज़ेस और
छुपम छुपाई से अधिक रोमांचक  है .

बच्चे जिसे  समझते हैं खेल
वह खेल होकर भी दरअसल
खेल जैसा खेल है ही नहीं
अमन और वमन के संधिस्थल पर
अपरिहार्य युद्ध की सम्भवनाओं से भरी
एक खूंखार हिमाकत है.

बच्चे सिर्फ बारूद  से खेलना जानते हैं
हथगोले हमारे अहद की फ़ुटबाल हैं
कटी हुई गर्दनें हैं शांति का रूपक
भुने हुए सफेद कबूतर
पसंददीदा पौष्टिक आहार
एटम बम को लिटिल बॉय कहते हुए
गदगद हुए जाते हैं .

बच्चे अब बेबात खिलखिलाते नहीं  
गुर्राते हैं हिंसक षड़यंत्र रचते
खेलते हैं घात प्रतिघात से भरे खेल
झपटते हैं एक दूसरे की ओर
नैसर्गिक उमंग के साथ
बच्चे सीख गये हैं 
मारने और मरने का दिलचस्प खेल.




गुरुवार, 24 अगस्त 2017

फर्जी समय की मझधार में


इतने कठिन समय में 
जब बिटिया बुखार से तपती हो
इलाज के लिए सिर्फ
पानी में भीगी पट्टी
ऊटपटांग दुआएं हों
कविता लिखने के लिए हों
ठंडे आदिम शब्द
तब जिंदगी
कितनी सनसनीखेज हो जाती है
मौत और चमत्कार में से
कुछ भी घट सकता है।
जब निजता के नाम पर
बचे रह जाएं
बिन चुकाए बनिये के बिल
चंद बिंदी टिकुली
चटखा हुआ आईना
नसवार की खाली डिब्बी
जर्जर किताब में चिपकी
फूलों की बेरंग पंखुरियाँ
तब उम्मीद और नाउम्मीदी में
बित्ते भर का भी फर्क नहीं रहता।
जब वर्तमान
अतीत की ओट में जा छुपे
भवितव्य भोंडा मज़ाक लगे
जब कल की बात करते हुए पता लगे
यह तो व्यतीत ही नहीं हुआ
निष्कवच हुआ वक्त अनायास
शिरस्त्राण की बात करे
तब समझ लेना
हम फर्जी समय की मझधार में हैं।
जब खांटी सच
देशज गोयबल्स के झूठ के आगे
दो कौड़ी का रह जाये
कुछ भी कहने से पहले
खूंखार कानों से मुंह छुपाना पड़े
तब निर्भीकता के सारे पर्यायवाचो
नए सिरे से खंगालने पड़ते हैं।
जब बाजार आपके सामने खड़ा हो
आपकी खुद्दारी का मखौल बनाता
कवि भाँड हो जाएं
सरोकारी जलसों के एजेंडे
सरकारी मुसाहिब तय करने लगे
जब जिंदा बने रहने की कोई वजह न बचे
तब कोने में धकिया दी गयी
भीगी बिल्ली जैसी
कम से कम एक झपट तो दिखाओ।

बुधवार, 23 अगस्त 2017

शेर और बकरी के बीच

यह समय कुछ ऐसा है
मैं सिर्फ दो तरह की कविता लिख सकता हूँ
जैसे सिक्का हवा में उछले
शेर आयेगा या फिर बकरी
तीसरी चौथी पांचवी या छठी
कोई सम्भावना नहीं.

शेर आया तो उपसंहार 
बकरी आई तो चूल्हा जला
बड़े दिनों के बाद
स्वाद को जिह्वा पर जगह मिली
मौत  और चटख भूख के बीच
सिर्फ अनंत खालीपन है.

आरम्भ से पहले अंत तय है
रंगों की पिटारी  में दो ही रंग हैं
सफेद या स्याह
पाप और पुण्य के मध्य
जीवन बेवजह थरथराता है
सब एक दूसरे की अनुकृति या प्रतिकृति हैं.

हाशिये के दोनों ओर
घुटने पर झुके लोग हैं
करना तो चाह रहे हैं प्रार्थना
पर केवल मिमिया भर रहे हैं
इस दोरंगी दुनिया में
शेर का बकरी के बीच 
रक्तरंजित उदासी  है.

उम्र के साथ –साथ


उम्र चेहरे तक आ गयी
कंठ में  भी शायद
लेकिन जिह्वा पर अम्ल  बरकरार है
शेष है अभी भी हथेलियों पर स्म्रतियों की तपन
वक्त के साथ सपने भस्माभूत नहीं होते
काफी कुछ बीत जाने पर भी
कुछ है यकीनन कि कभी नहीं बीतता.

देह बीत जाती है
रीत जाता है भीतर का पानी
इतने रूखेपन में भी
जरा –सा गीलापन ढूंढ कर
बची रह जाती है
चिकनी हरी काई और
वनस्पति के बैंगनी गुलाबी अवशेष.

उम्मीद आज  जीवंत सर्वनाम है
कामनाएं कल की पुरकशिश संज्ञा
कविताओं में अभी तक
शब्दों की आड़ में दिल थरथराता है
तितलियों के पीछे भागता बचपना
वक्त के संधिस्थल पर
मचाता है अजब धमाचौकड़ी.

समय की अंगुली पकड़
चलते चलते हम निकल आये
कितनी दूर
पतझड़ के मौसम में झड़ी पत्तियां
बहार की आमद पर करती हैं
बदलती रुत के साथ कानाबाती.

मंगलवार, 22 अगस्त 2017

मुआनजोदड़ो .


चार हजार साल पहले
या पांच या छ: हज़ार सहस्र वर्ष पूर्व
महान सभ्यता की दहलीज पर टहलते थे
चालीस हज़ार लोग
जहाँ अब मुआनजोदड़ो है -मुर्दों का टीला
मुर्दे भंगुर इतिहास के पुख्ता गवाह होते हैं.
मुआनजोदड़ो के अजायबघर में मातृदेवी है
उसके अनकरीब दिए हैं
जो कभी किसी ने जलाए थे बड़े जतन से
दोनों हथेलियों की ओट में
तेज हवाओं के झोंको से बचाते हुए
रोशनियाँ बुझ कर भी बची रह जाती हैं.
वहाँ काला पड़ गया गेंहू है
भूख और तृप्ति भी होगी
कहीं किसी गोपन स्थानों पर
या फिर खुल्लम खुल्ला होता होगा
रोटी का खेल भी
सभ्यता थी तो यह भी हुआ ही होगा.
वहाँ मिले तांबे और काँसे के बर्तन,
मुहरें, चौपड़ की गोटियाँ,
माप-तोल के पत्थर,
मिट्टी की बैलगाड़ी,
दो पाटन की चक्की, कंघी,
मिट्टी के कंगन और पत्थर के औजार
जीवन था तो यह तो होगा ही.
मुआनजोदड़ो में नहीं मिला
किसी तितली के रंगीन परों का सुराग
पंख तौलते पक्षी की उड़ान का साक्ष्य
फूलों में बसी सुगंध का कोई सुबूत
न ताबूत में रखी
किसी तूतनखामन की कालजयी देह
वहाँ गुमशुदा आज के भग्नावशेष मिले.
वहां सपने बुनने वाला न कोई करघा मिला
न कुम्हार का चाक
न वक्त की रफ़्तार पर ठहरा हुआ कोई राग
न किसी कलाकार के रंगों की पिटारी
मिला ताम्बे का वो आईना
जिस पर कोई अक्स कभी ठहरा ही नहीं
मुआनजोदड़ो में रीते हुए जलाशय मिले
उसकी ओर उतरती सीढियां मिली
छप छपाछप को बहुत ढूँढा लेकिन नहीं मिली
अलबत्ता कहते हैं
वहाँ समय की सघन गुफाओं में से
जवान मादाओं के खिलखिलाने की आवाज़ आती है.
वहां रखे इतिहास के पन्ने
जब तब उलटते हैं
तब हिलती हैं चालीस हजार गर्दनें
हजारों साल बाद भी कोई नहीं जानता
इनकी देह और दैहिक कामनाएं कहाँ गयी
मुआनजोदड़ो में बहती हैं धूलभरी गर्म हवाएं
अबूझ स्वरलिपि कोई अनवरत गाता हैं .

मुझे पता है

मुझे पता है कि आसमान का रंग नीला है नीलेपन का यह कौन सा शेड है नहीं मालूम किसी बात के कुछ-कुछ पता होने से कुछ नहीं होता लेकिन ...