रविवार, 6 अगस्त 2017

निर्मल गुप्त की कविताएँ : गुलाबी छतरी वाली लड़की

निर्मल गुप्त की कविताएँ : गुलाबी छतरी वाली लड़की: बंद खिड़की से छन कर चला आया अनचीन्ही खुशबु का झोंका जाती है शायद किसी पीर की शाही सवारी  खिड़की खोली तो दिखी गुलाबी छतरी वाली बरसात और...

बुधवार, 2 अगस्त 2017

कुर्सी बुनते हुए




कुर्सी बुनते बुनते
थकी हुई उँगलियाँ भूल जाती हैं
उम्र को गिनना 
तब प्लास्टिक के तानेबाने में
वक्त बिछाने लगता है चौकोर खानों की बिसात
तजुर्बे से लबरेज मन
गढ़ता है ख्वाबों का सिलसिला.

कुर्सी बड़ी निर्मम होती हैं
वे भेद नहीं करती
अपने पराये में
सबसे पहले झपटती हैं
हुनरमंद हाथों पर
ताजमहल की फ़िजाओं से निकल
तैरते हैं पूरी कायनात में
क्रूरता के लहुलुहान किस्से.

कुर्सी कभी कदीमी नहीं होतीं
उनको सजाना संवारना पड़ता है बार बार
कुर्सीसाज़ का कौशल
मौजूद रहता है
बिनाई कमजोर होने के बावजूद
चलती हुई सांसों और भूख के इर्दगिर्द.

कुर्सी शायद वही बुनते हैं
जिनको कभी नहीं आया
उस पर आसीन होने का सलीका
करीगर के थके हुए मायूस हाथ तो
अकसर पसर जाते रहे हैं
कुर्सी वाले के आगे.

आदमी और आदमी के बीच
कुर्सी किसी मसखरे की तरह ठहाके लगाती है
बुनकर तैयार होते ही
वह अपने बुनने वाले को
सबसे पहले दिखाती है
बाहर का रास्ता।

गुलाबी छतरी वाली लड़की


बंद खिड़की से छन कर
चला आया अनचीन्ही खुशबु का झोंका
जाती है शायद किसी पीर की शाही सवारी 
खिड़की खोली तो दिखी गुलाबी छतरी वाली
बरसात और धूप से खुद को बचाती
बूंदे बादलों में हों तो हों
धूप छिपी बैठी मेघों की ओट में.
रोजाना पहले नमूदार होती है गंध
फिर दिल धड़कता है
प्यार से नम हो जाती हैं आँख
इसके बाद उम्र का ख्याल आता है
छाते पर चस्पा फडकते दिलों के सिलसिले
लडकपन की दहलीज तक जा निकलते हैं.
एक दिन ऐसा हो जाये
तेज हवा चले
बरसने लगे झमाझम बारिश
छाता उलट पलट होता उड़ जाए
वह दौड़े पड़े बेसाख्ता
जैसे भागती हैं हैरान मम्मियां
शैतान बच्चे के पीछे.
गुलाबी छतरी उड़ती चली जाए
तैरने लगे बहते पानी में
क़ागज की नाव की तरह
मन में ठहरा हुआ पानी
महकने लगे गुलाब जल बन कर.
फिर मैं अपने निरापद बरामदे में
आराम कुर्सी पर बैठा ऐसा भीगूँ
स्मृतियाँ हो जाएँ तरबतर
और अधिक भीगने के लिए
देह और कामनाओं का क्षेत्रफल
पड़ जाए थोड़ा कमतर.
गुलाबी छतरी के तले
पहुंचे हुए पीर का आस्ताना है
जहाँ मन्नतें रोज
अगरबत्ती की तरह गंधाती हैं
यहाँ वहाँ बंधे उम्मीदों के धागे 
रचते हैं रोज नया तिलिस्म.

सोमवार, 17 अप्रैल 2017

नदी और उसका अतीत


कल तक जहाँ नदी थी
वहाँ झींगुरों का अभ्यारण्य है
उनसे कहो
वे अपने मुकद्दर पर न इतराएँ
उन्नत किस्म के कीटनाशक
उन्हें ज्यादा देर तक वहाँ नहीं गाने देंगे.

कल तक जिसके जल में
मछलियाँ तिरती थीं रात दिन
इन्द्रधनुषी आभा लिए
उनके जीवाश्म अब
इतिहास की गीली मिटटी में
गहरे तक धंस गये हैं.

नदी की जगह उग आये हैं
इस्पात और कंक्रीट के
सभ्य और सुसंस्कृत फूल
जहाँ कमजोर मादाओं और मर्दों के समुच्चय
अपने अपने तरीके से
विकास की नीव रखने की जल्दबाजी में है.

नदी सूख गयी इक दिन
जल ने भर लिया
भाप होने का स्वांग
अब सिर्फ रुई जैसे बादल हैं
गरजते हैं  ,चमकते हैं  
बरसने के लिए बरसते नहीं है.

नदी के पास नहीं है
अब कलकल कर बहने की
निरंतर प्रावाहित होने की
कोई पुख्ता वजह
उसके पास गीली स्मृतियों के सिवा
अब कोई और अतीत है भी नहीं.

आनायास कुछ नहीं होता


कभी कुछ अनायास नहीं होता
न बीज धरती में स्थ होता है
न पंछी एक डाल से दूसरी डाल की ओर
उडान भरते हैं
न किसी लड़की के गाल
प्यार ,अपमान,तिरस्कार या गुस्से से
लाल भभूका हो तमतमाते हैं.

कभी कुछ हरदम मनचाहा नहीं होता
न सांस तयशुदा तरीके से चलती है
न शिराओं में उत्तेजना का रक्त बहता है
न केवल चाह लेने भर से
देह में सिहरन सी उठती है
न कोई आहट आकार ग्रहण करती है.

कभी कुछ सही समय पर याद नहीं आता
होठों पर मुस्कान पहले आ जाती है
वजह अनुमान की ओट में रह जाता  है
उन्माद दिल में धडकने लगता है
मुस्कराहट  की गहरी परत के पीछे का अतीत
अपनी भनक तक नहीं लगने देता.

कभी कुछ योजनाबद्ध तरीके से नहीं होता
समय कभी कदमताल नहीं करता
बीतने का बावजूद ढेर सा वर्तमान
बचा रह जाता है वक्त की परिधि के बाहर
कामनाओं  के लिपेपुते चेहरो पर 
उम्र की शिनाख्त अनचाहे ही सही
बार बार हस्ताक्षर बनकर उभरती  हैं.

अनायास फिर भी कितना कुछ बीत जाता है
किसी के आने जाने की पदचाप तक सुनाई नहीं देती.


गुरुवार, 23 मार्च 2017

पिता को याद करते हुए.....


मेरे पिता सेवानिवृत हुए तो
दफ्तर की मेज पर रखे
विदाई के सामान वहीं छोड़ आये
अपनी अधिकारिक अहमन्यता  
मोटे अक्षरों में छपी मानस की प्रति
और नक्काशीदार फोल्डिंग छड़ी भी.

दे आये छावनी पेड़ के नीचे  
शताब्दियों से बैठी
जिस तिस को दुआएं देती माई को
गलत हिज्जों में खुदे अपने नाम वाले
चांदी की परत वाले सेना मैडल भी
गुपचुप ,सबसे आँखें बचाकर.

वह जल्द से जल्द पकड़ना चाहते थे
घर की ओर जाने वाली रेलगाड़ी
भूल जाना चाहते थे
द्वितीय विश्व युद्ध की रक्ताभ यादें
सैनिकों के यांत्रिक सलाम
इस्पात ठुंके जूतों की खट-खट.

वह इस तरह घर वापस आये
जैसे बच्चे स्कूल से लौट आते हैं
लम्बी छुट्टियों की खबर लेकर
जैसे औरतें लौट आती हैं
युद्ध के लिए अलविदा होते
ओझल होते अपने आदमी को छोड़ कर.

वह वापस आये तो इस तरह आये
जैसे कभी चक्रवर्ती सम्राट आया था
कलिंग से अशोक बन कर
सांस तक लेते रहे संभल संभल कर
बिना उत्तर की प्रत्याशा के पूछते रहे
युद्द खत्म होने के बाद बच्चे कहाँ चले जाते हैं
आख़िरकार..



  



मंगलवार, 21 मार्च 2017

निशब्दता की मुनादी


थक गया हूँ शायद
सरकंडे की कुर्सी पर बैठा अकेला
अब तो कोई यह भी नहीं कहता
परे सरको हमें भी दो  
टिकने लायक जगह
रिक्तता ऐसी जैसे निशब्द बियाबान.

लिखने के लिए स्निग्ध कागज है
बेहतरीन कलम है
बिना स्याही में डुबाये
फरफर हवा की तरह चलने वाली
हवा है ही नहीं जो उड़ा ले जाए पन्ने
पर अक्षर हैं कि शब्द में बदलते ही नहीं.

बंद खिडकियों के पल्ले निस्तब्ध हैं
गमले में खिले निर्गंध फूलों तक आ पहुंची
तितलियाँ हैरान हैं
रंग हैं पर उड़ान का कौतुहल नदारद है
पौधों की परछाईंयों में
सुकून का अतापता नहीं.

रोशनदान में ठुंके हैं
दफ्ती के अवरोधक
रौशनी की लकीरें
खड़ी हैं घर के बाहर
उदासी का पुनर्पाठ करती
पता नहीं कबसे हांफती हुईं सी.

यह दरअसल थकन का नहीं
हवा पानी गंध और तितलियों के लिए
जिंदा रहते हुए भी
वक्त से पहले मर जाने की मुनादी है
चरमरा रही है कुर्सी
यकीनन बिखर जायेगी तिनका तिनका होकर.