सोमवार, 17 अप्रैल 2017

नदी और उसका अतीत


कल तक जहाँ नदी थी
वहाँ झींगुरों का अभ्यारण्य है
उनसे कहो
वे अपने मुकद्दर पर न इतराएँ
उन्नत किस्म के कीटनाशक
उन्हें ज्यादा देर तक वहाँ नहीं गाने देंगे.

कल तक जिसके जल में
मछलियाँ तिरती थीं रात दिन
इन्द्रधनुषी आभा लिए
उनके जीवाश्म अब
इतिहास की गीली मिटटी में
गहरे तक धंस गये हैं.

नदी की जगह उग आये हैं
इस्पात और कंक्रीट के
सभ्य और सुसंस्कृत फूल
जहाँ कमजोर मादाओं और मर्दों के समुच्चय
अपने अपने तरीके से
विकास की नीव रखने की जल्दबाजी में है.

नदी सूख गयी इक दिन
जल ने भर लिया
भाप होने का स्वांग
अब सिर्फ रुई जैसे बादल हैं
गरजते हैं  ,चमकते हैं  
बरसने के लिए बरसते नहीं है.

नदी के पास नहीं है
अब कलकल कर बहने की
निरंतर प्रावाहित होने की
कोई पुख्ता वजह
उसके पास गीली स्मृतियों के सिवा
अब कोई और अतीत है भी नहीं.

आनायास कुछ नहीं होता


कभी कुछ अनायास नहीं होता
न बीज धरती में स्थ होता है
न पंछी एक डाल से दूसरी डाल की ओर
उडान भरते हैं
न किसी लड़की के गाल
प्यार ,अपमान,तिरस्कार या गुस्से से
लाल भभूका हो तमतमाते हैं.

कभी कुछ हरदम मनचाहा नहीं होता
न सांस तयशुदा तरीके से चलती है
न शिराओं में उत्तेजना का रक्त बहता है
न केवल चाह लेने भर से
देह में सिहरन सी उठती है
न कोई आहट आकार ग्रहण करती है.

कभी कुछ सही समय पर याद नहीं आता
होठों पर मुस्कान पहले आ जाती है
वजह अनुमान की ओट में रह जाता  है
उन्माद दिल में धडकने लगता है
मुस्कराहट  की गहरी परत के पीछे का अतीत
अपनी भनक तक नहीं लगने देता.

कभी कुछ योजनाबद्ध तरीके से नहीं होता
समय कभी कदमताल नहीं करता
बीतने का बावजूद ढेर सा वर्तमान
बचा रह जाता है वक्त की परिधि के बाहर
कामनाओं  के लिपेपुते चेहरो पर 
उम्र की शिनाख्त अनचाहे ही सही
बार बार हस्ताक्षर बनकर उभरती  हैं.

अनायास फिर भी कितना कुछ बीत जाता है
किसी के आने जाने की पदचाप तक सुनाई नहीं देती.


गुरुवार, 23 मार्च 2017

पिता को याद करते हुए.....


मेरे पिता सेवानिवृत हुए तो
दफ्तर की मेज पर रखे
विदाई के सामान वहीं छोड़ आये
अपनी अधिकारिक अहमन्यता  
मोटे अक्षरों में छपी मानस की प्रति
और नक्काशीदार फोल्डिंग छड़ी भी.

दे आये छावनी पेड़ के नीचे  
शताब्दियों से बैठी
जिस तिस को दुआएं देती माई को
गलत हिज्जों में खुदे अपने नाम वाले
चांदी की परत वाले सेना मैडल भी
गुपचुप ,सबसे आँखें बचाकर.

वह जल्द से जल्द पकड़ना चाहते थे
घर की ओर जाने वाली रेलगाड़ी
भूल जाना चाहते थे
द्वितीय विश्व युद्ध की रक्ताभ यादें
सैनिकों के यांत्रिक सलाम
इस्पात ठुंके जूतों की खट-खट.

वह इस तरह घर वापस आये
जैसे बच्चे स्कूल से लौट आते हैं
लम्बी छुट्टियों की खबर लेकर
जैसे औरतें लौट आती हैं
युद्ध के लिए अलविदा होते
ओझल होते अपने आदमी को छोड़ कर.

वह वापस आये तो इस तरह आये
जैसे कभी चक्रवर्ती सम्राट आया था
कलिंग से अशोक बन कर
सांस तक लेते रहे संभल संभल कर
बिना उत्तर की प्रत्याशा के पूछते रहे
युद्द खत्म होने के बाद बच्चे कहाँ चले जाते हैं
आख़िरकार..



  



मंगलवार, 21 मार्च 2017

निशब्दता की मुनादी


थक गया हूँ शायद
सरकंडे की कुर्सी पर बैठा अकेला
अब तो कोई यह भी नहीं कहता
परे सरको हमें भी दो  
टिकने लायक जगह
रिक्तता ऐसी जैसे निशब्द बियाबान.

लिखने के लिए स्निग्ध कागज है
बेहतरीन कलम है
बिना स्याही में डुबाये
फरफर हवा की तरह चलने वाली
हवा है ही नहीं जो उड़ा ले जाए पन्ने
पर अक्षर हैं कि शब्द में बदलते ही नहीं.

बंद खिडकियों के पल्ले निस्तब्ध हैं
गमले में खिले निर्गंध फूलों तक आ पहुंची
तितलियाँ हैरान हैं
रंग हैं पर उड़ान का कौतुहल नदारद है
पौधों की परछाईंयों में
सुकून का अतापता नहीं.

रोशनदान में ठुंके हैं
दफ्ती के अवरोधक
रौशनी की लकीरें
खड़ी हैं घर के बाहर
उदासी का पुनर्पाठ करती
पता नहीं कबसे हांफती हुईं सी.

यह दरअसल थकन का नहीं
हवा पानी गंध और तितलियों के लिए
जिंदा रहते हुए भी
वक्त से पहले मर जाने की मुनादी है
चरमरा रही है कुर्सी
यकीनन बिखर जायेगी तिनका तिनका होकर.



शनिवार, 3 सितंबर 2016

साठ पार का आदमी


साठ पार के आदमी के आदमी को
घुटने मोड़ कर चारपाई पर बैठे रहना चाहिए
उठते बैठते हर बार
जोर से कराहना चाहिए
फूल तितली खुशबु और प्यार की बात
मन ही मन बुद्बुदाना निषेध है. .

उसे अतीत की चादर को कस कर जिस्म से
हरदम लपेटे रहना चाहिए
उसकी देह से पसीने और उदासी की गंध
हर समय आनी चाहिए
गमन की भविष्यवाणी करनी चाहिए
रोज मौसम विभाग की तरह.

उसे अपने अंतिम क्षणों का रिहर्सल
नियमित रूप से करना चाहिए
लोगों को हरदम यकीन दिलाना चाहिए
कि बस कुछेक दिन की बात और है
उसे करनी चाहिए
 
जीने से अधिक
सिर्फ मरने की फ़िक्र.

उसे हर उबासी के साथ दोहराना चाहिए
प्रभु बहुत हुआ अब तो उठा ही ले
फिर सहमते हुए आसमान की ओर देखना चाहिए
कहीं आसमान के कान तो नहीं उग आये
प्रार्थनाओं को करते हुए
इस कदर जल्दबाज़ी करना ठीक नहीं.

साठ की दहलीज लांघते हुए
जोड़ घटा का अंकगणित भूल जाना चाहिए
जिस्म को छोड़ देना चाहिए अकेला
हर बात पर बेबसी की नुमाइश करते हुए
इस तरह हंसना चाहिए
कि वजह का सुराग तक किसी को न मिले.

साठ पार के आदमी को
कायदे से तो किसी कौए की तरह
उतर जाना चाहिए निर्जन बियाबान में
जहाँ आवाजें खो जाती हों
द्रुम लताओं की गहराइयों में
पत्तियां हवा के झोंकें में भी सरसराती न हो.
साठ पार गया आदमी
कोई अलार्म घड़ी नहीं रखता
 
यदि होती भी है तो
वह उसके जाग जाने के बाद बजती है
कलगी वाला मुर्गा बांग देने के मामले में
उससे रोज हार जाता है.
उसके हर कथोपकथन में होती हैं
निजी जीवन से जुड़ी
 
झूठ से लबरेज शौर्य गाथाएं
जिनका पुनर्पाठ करते
वह कभी नहीं थकता
कंठस्थ कर लेता है.
साठोत्तर का आदमी
दरअसल बड़ा शातिर होता है
उम्र भर एकत्रित की गयी चालाकियों का
बखूबी इस्तेमाल करता है
हर जरूरी गैर जरूरी बात पर
बेवजह बेआवाज़ सुबकता है.
वह बड़ी शिद्दत से
वक्त के सरोंते से
काट पाता है एक एक दिन को
कठा सुपारी की तरह
अपना पूरा नाम और
असल उम्र बताने में हकलाता है.
साठ पार का आदमी वक्त रहते
निश्ब्द्ता के आरपार चला जाना चाहता है.


गुरुवार, 14 अप्रैल 2016

कबाड़खाने में


किताबों के ढेर में से
अपने लिए एक अदद किताब ढूंढना
वैसा ही है जैसे
कलकल कर बहती नदी में से
चुल्लू भर निर्मल जल
भर लेने की हठ करना.

जहाँ तहां कागज के पुर्जों पर लिखी 
कविताओं में से
एकाध आधी अधूरी पंक्ति
तलाश लेना भी वैसा ही है
जैसे पा जाना
अपनी आत्ममुग्धता के लिए  
कोई भूला बिसरा टोटका.

मन के सघन वर्षावन में
रोज उगते हैं अनगिन
नीले पीले बैंगनी फूल
मादकता का नया मुहावरा गढ़ते
कंटीले अहसास के साथ
स्मृतियों को लहूलुहान करते.

वक्त की हथेली से झड़ रही है उम्र  
बेआवाज़ बेसाख्ता 
कामनाएं मौजूद हैं देह में
पूरी ढिठाई  के साथ
समय सिद्ध नुस्खों की पाण्डुलिपि के
जर्जर पन्नों  को  पलटती.

वक्त  के कबाड़खाने में
सीलन है ,अँधेरा है
ठण्डक है ,आद्रता है  
शरीर में झुरझुरी पैदा करती.
ऐसे में हो जाती हैं अक्सर
पढ़ी लिखी बातें बेकार.

शनिवार, 6 फ़रवरी 2016

माँ को याद करते हुए ..................


उस रात जब अँधेरा बहुत घना था
मौसम ज़रा गुनगुना  
माँ ने अपने सर्द हाथों में थाम
मेरे हाथ को कहा  
अरे तू तो तप रहा है भट्टी सा
उसके यह लफ्ज़ मेरे कान तक पहुंचे
और बिखर गये आँखों से
पिघलते आइसक्यूब की तरह पानी बन कर.

उस रात पहली बार उसने कहा
सरका दो खिडकियों पर लगे मोटे परदे
मैं देखना चाहती हूँ
बगीचे में खिले वासंती फूलों की आभा
आसमान में तिरते खूबसूरत पंछी
और परस्पर उड़ान की होड़ में लगी
बहुरंगी पतंगों का तिलिस्म.

उस रात उसके कहते ही
खिडकियों के पट चौपट खुल गये
रोशनदान के लाल पीले नीले कांच से छनकर
फुदकने लगा धूप का सुनहला छौना
उसकी चारपाई पर बिछी चादर की सिलवटों पर
पूरा कमरा भर गया मौसमी फलों की सुवास से.

उस रात उसने कहा
जा जल्दी ले आ थोड़े से लौकाट मेरे लिए
बड़ी भूख लगी है मुझे
तेरे पिता होते  ले आते
लाहौर वाले क़ादिर के बाग़  से
रुमाल में बाँध रस से चुह्चुहाते फल.

उस रात माँ देखती रही सघन अँधेरे में
रोशन उम्मीदों के सपने खुली आँखों   
बाट जोहती मेरे पिता की
प्रेमपगे उलहानों के  साथ  
पूछती रही मुझसे निरंतर
क्या रेडियो पर आनी बंद हुई युद्ध की खबरें
क्या आज भी डाकिया नहीं लाया
उनकी कोई खोज खबर.


उस रात वह अचानक चली गयी
मेरे हाथों में सौंप
अपनी यादों और इंतजार की अकूत विरासत
अँधेरे और रोशनी के आरपार
मैं उसके ठंडे हाथों को
अपनी रूह में सम्भाले रोज पूछता हूँ.  
क़ादिर के बाग़ का पता.