मंगलवार, 13 फ़रवरी 2018

सपने और सपने में फ़र्क



मेरी नींद के भीतर
तमाम चिड़ियों को चोटिल करने के बाद
एक थका हुआ बच्चा
गुलेल को सीने पर टिका
चैन की नींद सोता हौले से मुस्कराता है
उसके सपने में नुकीले पत्थर ही पत्थर हैं

बच्चे ने इतनी कम उम्र में
सीख लिया है नृशंसता का व्याकरण
मैं परिंदों के कंधे पर
मजबूत परों के उग आने के
मासूम  से सपने देखता
बच्चे के हमउम्र बन जाने की बाट जोहता हूँ.

मेरे सपने नींद के मोहताज़ हैं
बच्चे को मुस्कराने के लिए
किसी वजह की जरूरत नहीं
वह जागते सोते
सपनों को अपनी जिंदगी से
जल्द से ख़ारिज करते जाने की उत्कंठा से भरा है.

मेरे भीतर एक अजब खालीपन है
घायल चिड़ियों की निशब्द बेबसी है
बच्चे के पास जीने लायक दिनों को जमावड़ा है
उसके लिए आखेट का आर्तनाद ही
दरअसल उसका चहचहाना है

मेरी नींद के भीतर
नाज़ुक यादों का अनंत सिलसिला है
बच्चे की नाक के ठीक नीचे
हिटलर वाली तितली पंख फडफडा रही है
वह दबे पाँव  मेरे वजूद का
चप्पा चप्पा घेर लेने को आतुर है.

बच्चा देखते ही देखते
बचपन  से छिटक कर
कितना बड़ा हो गया है.





शनिवार, 10 फ़रवरी 2018

अतीत और इतिहास ...................................


हमारे पास कोई इतिहास नहीं
कुछ कपोल कल्पित दंतकथाएँ हैं
लिया दिया सा छिछोरा वर्तमान है
लेकिन हाँ कुछ खूबसूरत ख्वाब जरूर हैं
जिनके साकार होने के लिए 
कोई शर्त नत्थी नहीं ।

वैसे होने के नाम पर
इतिहास की काली जिल्द में बंधी
कुछ कागजी कतरनें हैं
मनगढ़ंत गल्प के सिलसिले हैं
मसख़रों द्वारा गाये गए शोकगीत हैं 
चक्रवर्ती सम्राटों के हरम से आती
नाजायज़ संतति  की सुबकियाँ हैं।

हम हैं और यदि यह बात भरम नहीं तो
यह मान लेने में कोई हर्ज नहीं
अतीत भी कहीं न कहीं
वक्त के किसी गुमनाम कोने में
पैरों को पेट में छुपाए
इधर या उधर पड़ा ही होगा
पर अतीत और इतिहास में बड़ा फर्क होता है।

इतिहास केवल बीता हुआ वह कालखंड नहीं
जिस पर दर्ज हो जिस तिस की देह पर लगे घाव
भूख से बिलखते लोगों की कराह
इस उसके खिलाफ की गयी
कानाफूसी जैसी साजिशें
गर्दन कटने से ठीक पहले
जल्लाद को दी गयी बददुआयेँ।

जिंदा क़ौमों का इतिहास
कभी कोई नहीं लिखता
न किसी ने आज तक यह जुर्रत की
उनके आज की बही के शानदार पन्ने
अतीत से लेकर भविष्यकाल तक
हमेशा बेसाख्ता फड़फड़ाते हैं।


शुक्रवार, 29 दिसंबर 2017

वसंती हवा शब्द सफ़ेद पाखी और पीली तितलियाँ


शब्दों के सफ़ेद पाखियों की कतारें
जाने कहाँ से चली आती हैं 
मन के अरण्य में
जहाँ कोई आतुरता नहीं
किसी का इंतज़ार नहीं।
एकाकीपन के घनीभूत क्षणों में
ये सफ़ेद पाखी स्वत: तब्दील हो जाते हैं
पीली तितलियों में
जो पता नहीं किस गंध का अनुमान करती
तिरने लगती हैं वातावरण में।
शब्दों का यह इन्द्रजाल
केवल देखा जा सकता है
या अनुभव किया जा सकता है
बिना किसी अर्थवत्ता के
इन अराजक शब्दों को
कोई अर्थवान बनाए भी तो कैसे?
पाखियों को पकड़ पाने की कला
बहेलिए जानते तो हैं
लेकिन पाखियों को
परतंत्र बनाने की जुगत में
वे उन्हें मार ही डालते हैं वस्तुत:
कभी किसी ने परतंत्र पाखी को
उन्मुक्त स्वर में गाते देखा है भला?
अलबत्ता तितलियों को तो
नादान बच्चे भी पकड़ लिया करते हैं
पर तितलियाँ तो
तितलियाँ ही होती हैं अन्तत:।
उन्हें किसी ने स्पर्श भर किया
और उनके रंग हुए तिरोहित
पंख क्षत विक्षत।
एक बार पकड़ी गई तितली
फिर कभी उड़ पाई है क्या?
एक न एक दिन
शब्दों के ये सफ़ेद पाखी
अवश्य गाएँगे एक ऐसा गीत
जिससे आलोकित हो उठेगा
मन के अरण्य में बिखरा
घटाटोप अंधकार
अपनी सम्पूर्ण हरीतिमा के साथ।
शब्दों के पाखियों को
मन के बियाबान के अनंत में
यों ही उड़ान भरने दो
पीली तितलियों का यह खेल
बस देखते रहो
जब तक देख सकते हो
निशब्द निस्तब्ध।

बुधवार, 13 दिसंबर 2017

चश्मा ,चाभी ,पेन और मेरा वजूद


मैंने अपने चश्मे को डोरी से बांध
लटका लिया है गले में
जैसे आदमखोर कबीले के सरदार
आखेट किये नरमुंड लटकाते होंगे
चश्मा जिसे मैं प्यार से ऐनक कहता हूँ
मेरे बचे रहने की रही सही फर्जी उम्मीद भर है
जरूरी चीजों को करीब बनाये रखने का
यही एकमात्र आदिम तरीका है
चश्मा तो बंध गया
अब बंद कमरे की इकलौती चाभी
जेब में किसी हठीली चिड़िया सी फुदकती है
दरवाजे पर जड़े जंग खाए ताले की ओर
कदम बढ़ाता हूँ तो वह दुबक जाती है
जेब के किसी अबूझे अंधकूप में
तब ताला मेरी हताशा को मुंह चिढाता है
चाभी मेरी हडबडी से निकल
ठन्न से आ गिरती है धरती पर.
पहले यही हाल पेन का था
वह तो जादूगर था ,बड़ा छलिया
वह तब कभी न मिला जब उसकी जरूरत पड़ी
वह कान की मुंडेर पर बैठा रहता
मैं लिखने लायक शब्द स्मृति में धकेल
जब झुंझलाहट में सिर झुकाता तो मिल जाता.
चश्मा चाभी और पेन को सम्भालने में
वक्त मंथर गति से गुजरता जाता है
कूटशब्दों से अंटी बायोमेट्रिक शिनाख्त के आगे
मेरा वजूद दो कौड़ी का है
स्मृति में लगी खूंटियों पर
टंगे हैं हाईटेक डरावने बिजूका
उनके समीप जाने से जी घबराता है.

मंगलवार, 14 नवंबर 2017

खोया -पाया


मुझे आज अलस्सुबह
पुराने दस्तावजों के बीच
एक जर्द कागज मिला
दर्ज थी उस पर
सब्ज रंग की आधी अधूरी इबारत
वह प्रेमपगी कविता नहीं थी, शायद
या हो ,क्या पता
मेरा वजूद चन्दन सा महकने लगा।
एक के बाद एक
तरह तरह की चीज मिलती गयीं
खोये पाए का सिलसिला चला
धूल में अंटी बांसुरी मिली
उसके नीचे दबी थी स्वरलिपि
फूंक से गर्द को बुहारा
स्मृति के वर्षावन में बज उठी अचीन्ही सिम्फनी.
गुलेल मिली तो उसे उठा
छुपा लिया अपनी पीठ के पीछे
मरी हुई चिड़िया के रक्त सने पंख मिले
उसे उठा डायरी में दबा लिया
आदिम क्रूरताएँ कागजी कब्रगाहों में पनाह पाती हैं.
कुलमिला कर आज जो कुछ मिला
वह तो कभी खोया ही न था.
आंगन में लगे गुलमोहर के लाल फूल
देर तक खोजे तो न मिले
वह रूठ कर अलविदा हुआ
ले गया सारे रंग अपने साथ
सूखी हुई पत्तियां मिलीं
उन्हें बटोर कर हथेली पर रखा
एक दिन ये उड़ेंगे
सूखे हुए ठूंठ के इर्द गिर्द
बहुरंगी तितलियां बनकर.
अलस्सुबह खुद को खूब तलाशा
मैं तो नहीं हुआ बरामद
मिले मेंरे होने के अपुष्ट सुबूत
यत्र तत्र बिखरे हुए
मुड़ी तुड़ी जंग खायी चाभियों के गुच्छे की तरह
ताले को लेकर कोई उत्सुकता नहीं
वह हो तो क्या ,न हो तो भी.
छाया:हरि जोशी 

सोमवार, 23 अक्तूबर 2017

अतीत और इतिहास


हमारे पास कोई इतिहास नहीं
कुछ कपोल कल्पित दंतकथाएँ हैं
लिया दिया सा छिछोरा वर्तमान है
लेकिन हाँ ,कुछ खूबसूरत ख्वाब जरूर हैं
जिनके साकार होने के लिए  
कोई शर्त नत्थी नहीं ।

वैसे होने के नाम पर इतिहास 
काली जिल्द में बंधा 
कागजी कतरन का पुलिंदा  है
मनगढ़ंत गल्प का बेतरतीब  सिलसिला  है
मसख़रों द्वारा गाये गए शोकगीत हैं  
चक्रवर्ती सम्राटों के हरम से आती
नाजायज़ संतति  की सुबकियाँ हैं।

हम हैं और यदि यह बात भरम नहीं तो
यह मान लेने में कोई हर्ज नहीं
अतीत भी कहीं न कहीं
वक्त के किसी गुमनाम कोने में
पैरों को पेट में छुपाए
इधर या उधर पड़ा  होगा ही 
पर अतीत और इतिहास में बड़ा फर्क होता है।

इतिहास केवल बीता हुआ वह कालखंड नहीं
जिस पर दर्ज हो जिस तिस की देह पर लगे घाव
भूख से बिलखते लोगों की कराह
इस उसके खिलाफ की गयी
कानाफूसी जैसी साजिशें
गर्दन कटने से ठीक पहले
जल्लाद को दी गयी बददुआयेँ।

जिंदा क़ौमों का इतिहास
कभी कोई नहीं लिखता
न किसी ने आज तक यह जुर्रत की
उनके आज की बही के शानदार पन्ने
अतीत से लेकर भविष्यकाल तक
हमेशा बेसाख्ता फड़फड़ाते हैं।

शुक्रवार, 20 अक्तूबर 2017

कलिंग कहाँ कहाँ है ?



बहुत दिन बीते कलिंग की कोई सुधबुध नहीं लेता
चक्रवर्ती सम्राट को बिसराए हुए अरसा हुआ
प्रजा लोकल गोयब्ल्स के इर्द गिर्द जुटती है
उसे इतिहास की तह में उतरने से अधिक
शब्द दर शब्द फरेब के व्याकरण में
अपना त्रिदर्शी भविष्यकाल
इस किनारे से साफ साफ दिखने लगा है।

बहुत दिन बीते
किसी राजसी रसोईए को नहीं मिला
सामिष पकाने के बजाए
खालिस घी मे बघार कर दाल भात पकाने का हुक्मनामा
राजसी गुप्तचर करछी लिए
चूल्हे पर चढ़ी हंडियों में तपन के सुराग ढूंढते हैं।

कलिंग में अब
आमने सामने लड़ाई की बात नहीं होती
वहाँ की रक्तरंजित धरती में
बिना किसी खाद पानी और साफ हवा के
उपजते हैं सुगंधित बहुरंगी  फूल
वहाँ के लोग अब न धायलों की कराह को याद करते हैं
न मायूस विजेता के पश्चताप को
वे लगातार पूछते रहते हैं
परस्पर साग भाजी के चढ़ते उतरते भाव।

कलिंग में जब युद्ध हुआ तो हुआ होगा
मरने वाले मर गए होंगे
घायलों ने भी थोड़ी देर तड़पने के बाद
दम तोड़ दिया होगा ,आखिरकार
एक राजा विजयी हुआ होगा
एक अपनी तमाम बहादुरी के बावजूद हार गया होगा।

शिलालेखों पर दर्ज हुई इबारत
यदि इतिहास है तो
इसे जल्द से जल्द भूल जाने में भलाई है
अन्यथा महान बनने के लिए
लाखों लाख गर्दनों की बार बार जरूरत पड़ेगी।
कलिंग वहाँ नहीं है
जहां उसका होना बताया जाता है
वह हर उस जगह है
जहां मुंडविहीन देह के शीर्ष पर
सद्भावना और वैश्विक शांति की पताका
बड़े गर्व से लहराने का सनातन रिवाज है।

सपने और सपने में फ़र्क

मेरी नींद के भीतर तमाम चिड़ियों को चोटिल करने के बाद एक थका हुआ बच्चा गुलेल को सीने पर टिका चैन की नींद सोता हौले से मुस्कराता...