सोमवार, 31 अगस्त 2015

उसे पता है .....


आख़िरकार उसे मिल गया
ईंटों के चट्टे के बगल में
एक ठंडी छाया का रहमदिल टुकड़ा 
अब वह इत्मीनान से बैठ
कपड़े में बंधी रोटियां निकलेगी
खोलेगी भूख का जादुई बक्सा..
वह अरसे से भूखी है
मगन होकर हर कौर को चबायेगी
साथ ही साथ डालती जायेगी
रोटी के सख्त किनारे
कौओं की ओर .
उसे अच्छी तरह मालूम है
कि खाली पेट किस कदर दुखता है.
रोटी खाने के बाद
वह जायेगी हैंडपम्प के पास
ठंडे पानी की तलाश में
अंजुरी भर भर पानी पिएगी
और लौटेगी वहां से दोनों हथेलियों में
बड़े जतन से पानी लिए
वह डाल देगी उसे
ईंटों के चट्टे के पास लगे
तेज धूप से मुरझाये
पौधे की जड़ में .
और फिर पोंछेगी  पत्तियों को
अपने गीले हाथों से हौले हौले.
पेट भर जाने के बाद भी
उसे याद है सभी की भूख प्यास
भरपेट अघाये हुए लोगों की तरह उसे
किसी को भूल जाना नहीं आता .
.....................

मेरे लिए .... .


मेरे लिए कविता लिख पाना
धीरे धीरे बहुत मुश्किल होता जा रहा है
ठीक उसी तरह जैसे किसी प्यार से भरी दरिया में
आकंठ उतर जाना
सच तो यह भी है
जिंदगी को बड़ी एहतियात से जींने की घड़ी आ गई है.

मेरे लिए ठीक से साँस ले पाना
दूभर होता जा रहा है
ठीक उसी तरह जैसे
निपट सुनसान में भी अकेले बैठ कर
कोई पुराना गीत गुनगुनाना
बढ़ती उम्र के तकादे को टालते जाने का वक्त बीत गया.

मेरे लिए किसी से बहस में उलझने का
समय चुपके से बीत गया पता न चला
अब हर बात को सुनते हुए
उसे ऊँचा सुनाई देने की दलील के साथ
अनसुना करते चले जाने का विकल्प बचा है
चेहरे पर बेचारगी लपेट कर जीते चले जाने की अजब मजबूरी है.

मेरे लिए हर नये दिन को पूरी ताकत से जीने का
मकसद ही मानो खत्म हुआ
अब कैलेंडर पर तारीखों और साल को देखते हुए
मन कांप कांप जाता है
मानो दिल कहता हो बहुत हुआ अब सामान बांधो
यह किस सफर की तैयारी है कुछ पता नहीं.

मेरे लिए जिंदगी में खुलते जा रहे है रास्ते
तमाम निराशाओं के बावजूद
सांस का हरेक कतरा मेरे लिए
उत्सव मनाने जैसा है
जिंदगी और मौत के बीच का संकरा गलियारा
घटाटोप अँधेरे से भरा है लेकिन रोशनी की उम्मीद अभी जिन्दा है.



सोमवार, 24 अगस्त 2015

पाँव घसीटती हुई ट्रेन


मेरे शहर तक पहुँचते पहुँचते
राजधानी से आने वाली पैसेंजर ट्रेन
अकसर हांफने लगती है
वह बड़े बेमन से आती है
लगभग पाँव घसीटते हुए
माँ हमेशा बताया करती थी
धरती पर पैर घसीट कर चलना
दरिद्रता की निशानी होती है.

माँ की नसीहत के बावजूद
घर लौटता हुआ मैं सदा चलता रहा
जैसे चलती है ट्रेन
रोंगटे खड़े कर देने वाली रगड़ को   
अपने भीतर महसूस करता हुआ
निरंतर यात्रा  की ऊब को
सलीके से सहेजता .

घर से बाहर तक
दरिद्रता की ट्रेन रेंगती रही
मेरी शिराओं और उम्मीदों में
माँ सपना देखती रही
तमाम आशंकाओं के बावजूद 
मेरी निरापद घर वापसी
रगड़ की कर्कशता से मुक्ति का.

ट्रेन हमेशा सर्र से जाती
और बोझिल पांवों के साथ लौटती रही
उसकी गति के साथ
सरकती घिसटती रही जिंदगी
मैंने चाहा कि एक दिन ट्रेन से पूछूं 
तुम आने और जाने के बीच
इतना बदल क्यों जाती हो .

ट्रेन में रोज आते जाते
खचाखच भरे डिब्बे के किसी कोने में
जैसे तैसे टिकी देह सफर के दरम्यान
अपने होने को आहिस्ता से पॉज कर देती
मैं उलटी सीधी साँसें लेता
अपने से कहता ,यार बहुत हुआ
अब बंद करो पाँव घसीट कर चलना.

दबे पाँव चलता हुआ
चला आया हूँ मैं बहुत दूर
अब न माँ है ,न उसकी नसीहतें
मेरे पांवों में नहीं बचा है
रगड़ से होने वाला पहले जैसा रोमांच
अलबत्ता ट्रेन अब भी लौटती है
उसी तरह पाँव घसीटती हुई.
++++





  





शुक्रवार, 21 अगस्त 2015

बाहर आते ही .....

वह अभी अभी बाहर आया है
घरवालों से मिले उलहानों को
सलीके से तह बना कर
रुमाल के साथ जेब के हवाले करता
कायदे से तो वह रोना चाहता है
पर वह ढूंढता है
तेज हवा का ऐसा झोंका
जो उड़ा ले जाये उसकी सारी नादानियाँ .

वह अभी अभी बाहर आया है
एक अदद नीम हकीम को तलाशता
जो उसके सपनों को
स्मृति से मिटाने वाला रबर देदे
वह सपनों से इस कदर डर चुका है
कि नींद को आते देख
भाग खड़ा होता है.

वह अभी अभी बाहर आया है
काली जिल्द वाली पुरानी डायरी
अपनी कांख में दबाए
जिसमें उसने सहेज  रखें हैं
संभावित  प्रेमिकाओं को लिखे जाने वाले
प्रेम पत्रों के आधे अधूरे ड्राफ्ट
जिन्हें उसने या तो कविता समझा हुआ है .
या हर मर्ज के इलाज की संजीवनी बूटी .

वह अभी अभी बाहर आया है
घर से भाग कर भागते भागते  
बहुत दूर निकल जाने की चाह लिए
लेकिन एक कदम दौड़े बिना
चुहचुहा रहा है पसीना उसके माथे पर
वह दौड़ना तो चाहता है लेकिन  
उसके पैरों को खरामा खरामा
चलने की आदत है .

वह अभी अभी बाहर आया है
मुहँ को साफ़ करने की जरूरत को  
शिद्दत से महसूस करता 
उसकी जेब में रुमाल जैसा रुमाल है
फर्जी उम्मीदों के इत्र में डूबा 
उलहानों को अपने में समेटे
वह अपने बेनूर चेहरे को लिए
कहीं चले जाने से कतरा रहा है.

वह अभी अभी बाहर आया है
सोच रहा है कि डायरी में दर्ज कर ले
कहीं कुछ कर गुजरने से पहले
कविताओं जैसी कुछ अस्फुट पंक्तियाँ
जो सदियों से लिखी  जाती रही हैं 
ताकि सनद बनी रहे
और वक्त जरूरत काम आये .

वह अभी अभी बाहर आया है
उसके मन और पैर ने
अभी से मचलना शुरू कर दिया है
घर वापस जाने के लिए .

 .
,,,,,,,







शनिवार, 8 अगस्त 2015

सोना जागना


दिन भर के सफर के बाद
रात में सोने की
पुरजोर कोशिश करता आदमी
बड़ा मासूम लगता है
वह सोने से पहले 
सुबह वक्त पर उठने के लिए
खूब  तैयारी करता है
वह अपने सपनों से कहता है
तुम मत आ टपकना  
मेरी आँखों में रत्ती भर जगह नहीं..

सुबह वाली ट्रेन बड़ी बेमुरव्वत होती है
वह कभी किसी का लिहाज नहीं करती
थकी हुई आत्माओं को अपने भीतर भर कर
तयशुदा समय पर सर्र से निकल जाती है
अपनी ओर लपकते हांफते हुए
बुजुर्ग तक का भी ख्याल नहीं करती
जिसके दिल की धडकनें
पैरों से तेज दौड़ रही होती हैं .

रात में सोने से पहले बेनागा
ऐसी प्रार्थना करता है आदमी
जो किसी ईश्वर को संबोधित नहीं होती
उसमें लोहे की पटरियां 
और गार्ड की हिलती हुई
हरी झंडी होती है केवल 
और होती है ट्रेन की
रवानगी वाली  कूक अनिवार्यत: .

प्लेटफार्म पर जमा बेसाख्ता भीड़ को
चीरता हुआ बदहवास आदमी
ट्रेन के पीछे दौड़ता 
कम्पार्टमेंट के दरवाजे पर लगे
हैंडिल  को अंतत: थामने का  आशावाद लिए
रात और  नींद को कोसता हुआ 
जब  ट्रेन में चढ़ता है
तो  सिर टिकाने की
जगह तलाशता है
ताकि रात की कच्ची नींद की
ज्यादा तो नहीं तो  थोड़ी ही
भरपाई कर पाए .

तमाम जद्दोजेहद के बाद
ट्रेन के किसी तंग कोने में टिक
गहरी साँसों के साथ
खर्राटे भरता आदमी
बड़ा खुदगर्ज लगता है
उसकी मासूमियत  हर  रात
चकनाचूर हो जाती  है 
नींद को पाने में  नाकामयाब होते  हुए .

..........................................

खोया -पाया

मुझे आज अलस्सुबह पुराने दस्तावजों के बीच एक जर्द कागज मिला दर्ज थी उस पर सब्ज रंग की आधी अधूरी इबारत वह प्रेमपगी कविता नहीं थी, शायद या ...