मंगलवार, 29 अगस्त 2017

भावुकता और कारोबार .


वह किसी भाई से
किसी को खलास करने की
सुपारी लेकर आया है
बीमार बहन की मेडिकल रिपोर्ट देख
बार बार भींच रहा है मुट्ठियाँ
उसे इलाज कर रहे डॉक्टर से कोई गिला नहीं
अलबत्ता अपने मुकद्दर से बेहद नाराज  है.

वह शुभचिंतकों से सुन  आया है
चिमटे वाले बाबा के चमत्कार की गौरव गाथाएं
उसे डॉक्टर की कारगुजारी पर भरोसा है
और बाबा की अलौकिकता पर भी है
आंशिक यकीन
वह दवा और दुआ में से
किसी एक को चुनने में कतराता  है.

वह देख रहा है
अपनी बहन को धीरे धीरे मरता
अपने टारगेट की हँसती खिलखिलाती जिंदगी की
रत्ती भर भी फ़िक्र नहीं
उसे अपनी पतलून में खोंसी गये
इंग्लिश घोड़े की लिबलिबी पर
लेशमात्र भी संदेह नहीं है.

उसकी जेब में रबर छल्ले  में लिपटे
नोटों के गुल्ले हैं
जिन पर बापूजी दायें कोने पर अंकित हैं
और तार से बनी उनकी गोलाकार ऐनक वाम कोने पर  
यदि इस पर हिटलर और
उसकी तितली कट मूंछ रही होती
तब भी ये सुपारी होने के बावजूद
फरफराते हुए करेंसी नोट ही होते.

बहन उसकी भावुकता है
सुपारी उसके  कारोबार का कूटशब्द
दवा और दुआ के बीच
मौत एक अदद जिंदा लफ्ज़ है
उसे अच्छे से पता है
हर किसी को किसी न किसी दिन
वक्त बेवक्त फरार  होना ही है.





बुधवार, 23 अगस्त 2017

शेर और बकरी के बीच

यह समय कुछ ऐसा है
मैं सिर्फ दो तरह की कविता लिख सकता हूँ
जैसे सिक्का हवा में उछले
शेर आयेगा या फिर बकरी
तीसरी चौथी पांचवी या छठी
कोई सम्भावना नहीं.

शेर आया तो उपसंहार 
बकरी आई तो चूल्हा जला
बड़े दिनों के बाद
स्वाद को जिह्वा पर जगह मिली
मौत  और चटख भूख के बीच
सिर्फ अनंत खालीपन है.

आरम्भ से पहले अंत तय है
रंगों की पिटारी  में दो ही रंग हैं
सफेद या स्याह
पाप और पुण्य के मध्य
जीवन बेवजह थरथराता है
सब एक दूसरे की अनुकृति या प्रतिकृति हैं.

हाशिये के दोनों ओर
घुटने पर झुके लोग हैं
करना तो चाह रहे हैं प्रार्थना
पर केवल मिमिया भर रहे हैं
इस दोरंगी दुनिया में
शेर का बकरी के बीच 
रक्तरंजित उदासी  है.

उम्र के साथ –साथ


उम्र चेहरे तक आ गयी
कंठ में  भी शायद
लेकिन जिह्वा पर अम्ल  बरकरार है
शेष है अभी भी हथेलियों पर स्मृतियों  की तपन
वक्त के साथ सपने भस्माभूत नहीं होते
काफी कुछ बीत जाने पर भी
कुछ है यकीनन कि कभी नहीं बीतता.

देह बीत जाती है
रीत जाता है भीतर का पानी
इतने रूखेपन में भी
जरा –सा गीलापन ढूंढ कर
बची रह जाती है
चिकनी हरी काई और
निर्गंध बैंगनी  गुलाबी अवशेष.

उम्मीद आज  जीवंत सर्वनाम है
कामनाएं कल की पुरकशिश संज्ञा
कविताओं में अभी तक
शब्दों की आड़ में दिल थरथराता है
तितलियों के पीछे भागता बचपना
वक्त के संधिस्थल पर
मचाता है अजब धमाचौकड़ी.

समय की अंगुली पकड़
चलते चलते हम निकल आये
कितनी दूर
पतझड़ के मौसम में झड़ी पत्तियां
बहार की आमद पर करती हैं
बदलती रुत के साथ कानाबाती.

मंगलवार, 22 अगस्त 2017

आओ जुबान चलायें



मेरी देह पर हर उस जगह रिसते हुए घाव हैं
जहाँ मेरी थूक से लिथड़ी हुई जुबान को पहुंचना नहीं आता
जीभ पर तैरते हैं हजारों हज़ार या मिलियन ट्रिलियन विषाणु
घाव को चाटने में बहुत जोखिम है ,भाई
आओ दर्द से मुंह मोड़कर
पूरी बेशर्मी के साथ जुबान चलायें
इतिहास तटस्थ रहने वालों का जब गुनाह लिखेगा
यकीन करो ,तब उसके फुटनोट्स में
बड़बोलों की जयकार जरूर दर्ज रहेगी,
बोलना बड़ी बात है
हर जरूरी सवाल को घसीट कर
कविता के अंधकूप में उतर जाना
उससे भी अधिक आवश्यक है
जैसे आदमखोर घसीट ले जाते हैं
तड़पते हुए शिकार का गला दबाकर
किसी झाड़ी या दीवार या फिर
मंच के पीछे बने ग्रीन रूम में.
घाव चाटने से दुरुस्त नहीं होते
उनकी बड़े जतन से तुरपाई करनी पड़ती है
किसी रफूगर की चतुराई से
पूरना पड़ता है
रेशा रेशा कर हर किस्म की क्षुद्रता को
खून की सामन्ती शिनाख्त होने तक
किसी टीस का कोई मतलब नहीं होता.
जिनकी जुबान लम्बी है ,लचीली है
सधी हुई है ,पलट जाने में निष्णात है
कृत्रिम आग में तपाकर पैनाई हुई है
यह कविता उनके लिए नहीं है ,भाई
जाओ जाओ ,अपना काम करो
छोटे बच्चे ताली और
बड़े लोग मजे से बगले बजाएं.

रविवार, 6 अगस्त 2017

निर्मल गुप्त की कविताएँ : गुलाबी छतरी वाली लड़की

निर्मल गुप्त की कविताएँ : गुलाबी छतरी वाली लड़की: बंद खिड़की से छन कर चला आया अनचीन्ही खुशबु का झोंका जाती है शायद किसी पीर की शाही सवारी  खिड़की खोली तो दिखी गुलाबी छतरी वाली बरसात और...

बुधवार, 2 अगस्त 2017

कुर्सी बुनते हुए




कुर्सी बुनते बुनते
थकी हुई उँगलियाँ भूल जाती हैं
उम्र को गिनना 
तब प्लास्टिक के तानेबाने में
वक्त बिछाने लगता है चौकोर खानों की बिसात
तजुर्बे से लबरेज मन
गढ़ता है ख्वाबों का सिलसिला.

कुर्सी बड़ी निर्मम होती हैं
वे भेद नहीं करती
अपने पराये में
सबसे पहले झपटती हैं
हुनरमंद हाथों पर
ताजमहल की फ़िजाओं से निकल
तैरते हैं पूरी कायनात में
क्रूरता के लहुलुहान किस्से.

कुर्सी कभी कदीमी नहीं होतीं
उनको सजाना संवारना पड़ता है बार बार
कुर्सीसाज़ का कौशल
मौजूद रहता है
बिनाई कमजोर होने के बावजूद
चलती हुई सांसों और भूख के इर्दगिर्द.

कुर्सी शायद वही बुनते हैं
जिनको कभी नहीं आया
उस पर आसीन होने का सलीका
करीगर के थके हुए मायूस हाथ तो
अकसर पसर जाते रहे हैं
कुर्सी वाले के आगे.

आदमी और आदमी के बीच
कुर्सी किसी मसखरे की तरह ठहाके लगाती है
बुनकर तैयार होते ही
वह अपने बुनने वाले को
सबसे पहले दिखाती है
बाहर का रास्ता।

गुलाबी छतरी वाली लड़की


बंद खिड़की से छन कर
चला आया अनचीन्ही खुशबु का झोंका
जाती है शायद किसी पीर की शाही हवा  
खिड़की खोली तो दिखी गुलाबी छतरी वाली
बरसात और धूप से खुद को बचाती
बूंदे बादलों में हों तो हों
धूप छिपी बैठी मेघों की ओट में.


रोजाना पहले नमूदार होती है गंध
फिर दिल धड़कता है
प्यार से नम हो जाती हैं आँख
इसके बाद उम्र का ख्याल आता है
छाते पर चस्पा फडकते दिलों के सिलसिले
लडकपन की दहलीज तक जा निकलते हैं.

एक दिन ऐसा हो जाये
तेज हवा चले
बरसने लगे झमाझम बारिश
छाता उलट पलट होता उड़ जाए
वह दौड़ पड़े बेसाख्ता
जैसे भागती हैं हैरान मम्मियां
शैतान बच्चे के पीछे.

गुलाबी छतरी उड़ती चली जाए
तैरने लगे बहते पानी में
क़ागज की नाव की तरह
मन में ठहरा हुआ पानी
महकने लगे गुलाब जल बन कर.

फिर मैं अपने निरापद बरामदे में
आराम कुर्सी पर बैठा ऐसा भीगूँ
स्मृतियाँ हो जाएँ तरबतर
और अधिक भीगने के लिए
देह और कामनाओं का क्षेत्रफल
पड़ जाए थोड़ा कमतर.

गुलाबी छतरी के तले
पहुंचे हुए पीर का आस्ताना है
जहाँ मन्नतें रोज
अगरबत्ती की तरह गंधाती हैं
यहाँ वहाँ बंधे उम्मीदों के धागे 
रचते हैं रोज नया तिलिस्म.

चश्मा ,चाभी ,पेन और मेरा वजूद

मैंने अपने चश्मे को डोरी से बांध लटका लिया है गले में जैसे आदमखोर कबीले के सरदार आखेट किये नरमुंड लटकाते होंगे चश्मा जिसे मैं प्यार से ऐनक...