शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2015

मेरठ : एक समय ऐसा भी गुजरा


एक समय ऐसा भी गुजरा
जब मेरे शहर आया था श्रवणकुमार
कांधे पर बेंगी को संतुलित करता 
उसके पलडों में धरे
दृष्टिहीन और अशक्त माँ बाप को
तीर्थाटन के लिए ले जाता हुआ .
एक समय ऐसा भी गुजरा
जब रूपसी मंदोदरी जाया करती
अपनी सहेलियों के साथ चुहुल करती
गाती गुनगुनाती
निर्मल जलाशयों में स्नान करने जाती
निर्विघ्न निर्द्वन्द्व .
एक समय ऐसा भी गुजरा
जब हस्तिनापुर से कुरुक्षेत्र की ओर
कूच करती सेनाओं की पदचाप से
दहल उठा था सारा नगर
और लोग खोजते रह गए थे
धर्म और युद्ध के संधिस्थल .

एक समय ऐसा भी गुजरा
जब रणबांकुरे निकले थे सड़कों पर
तलवारें लहराते बारूद दागते
एकजुट एकमुश्त
आज़ादी के तरानों से
सोयी पड़ी इंसानियत को जगाते .
एक समय ऐसा भी गुजरा
जब शहर भर के मसखरे जा घुसे
इतिहास के पीले पन्नों में
और यहाँ की फिजाओं को
उन्होंने रंग डाला
बदनामी के पुनर्पाठ से .
एक समय ऐसा भी गुजरा
जब इतिहास पुरुष बना दिए गए
जातिगत गौरव के सुदर्शन चेहरे
श्रवणकुमार ने बेंगी को धरती पर पटक
माँ बाप को कर दिया
अपने नेह और वक्त से बाहर .
एक समय ऐसा भी गुजरा
जो ठीक से बीता नहीं
ठहरा ही रह गया
मेरे शहर की गंदगी से बजबजाती
संकरी गलियों में
किसी अश्लील किस्से की तरह .
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