रविवार, 27 जनवरी 2013

मेरी कविता में



मैं अपनी कविता में
कभी किसी को  नहीं बुलाता
मेरी कविता में
कोई सायास नहीं आता .

इसमें जिसे आना होता है
वह आ ही जाता है
अनामंत्रित .
जैसे कोई मुसाफिर आ बैठे
किसी पेड़ के नीचे
उसके तने से टिककर
बेमकसद ,लगभग यूंही .
बैठा रहे देर तक
अपनी ख़ामोशी को कहता सुनाता .

मेरी कविता में
डरे हुए परिदों और
मायूस बहेलियों के लिए
कोई जगह ही नहीं है
पर अँधेरे में दिशा भूला
हर कोई  यहाँ आ कर
बना लेता है अपना बसेरा .  .

मेरी कविता में
किसी की कोई शिकायत
आद्र पुकार या चीत्कार
या मनुहार कभी दर्ज नहीं होती 
इसके जरिये वशीकरण का
कोई काला जादू भी नहीं चलता
यह किसी को कुछ नहीं देती  
न कुछ मांगती है .
लेन देन  इसे नहीं आता .

मेरी कविता में
कुटिल मसखरे अपनी ढपली
अपना राग लेकर नहीं आते
न छद्म  वीरता का परचम लहराते
योद्धाओं के लिए इसमें जगह है .
इसमें कोई मस्त मलंग जब चाहे
अपनी धुन में गाता गुनगुनाता
जब चाहे तब आ सकता है .

मेरी कविता में
इतिहास में रखे
नृशंस राजाओं के ताबूतों को
सजाने के लिए जगह नहीं
अनाम फकीरों की
गुमशुदा आवाजों को सुनने के लिए
इसके कान तरसते रहते हैं .  .

मेरी कविता में
ऐसा बहुत कुछ है
जो है परंपरागत समझ से बाहर  
पर ऐसे सच के आसपास .
जिसे स्वीकारने में 
समय  का सरपट भागते घोड़े
अक्सर ठिठक जाते  हैं .

कोई माने या न माने 
मेरी कविता और मेरी जिंदगी में
बित्ते भर का भी फर्क  नहीं है .







गुरुवार, 24 जनवरी 2013

पुस्तक मेले में किताबें

पुस्तक मेले में 
शेल्फ  पर रखी किताबें
टुकुर टुकुर झांकती रहीं 
इस आस में कि कोई तो आये
जो उन्हें अपने साथ ले जाये
अपने हाथों में थामे
पढ़े मनोयोग से
सजा ले  अपनी दिल की 
गहराई में .

किताबें खुली हवा में
साँस लेना चाहती थीं
अपने भीतर की खुशबू को
फैलाना चाहती हैं पूरी कायनात में .
अँधेरे गोदामों  में
उनका दम घुटता है .

बाज़ार में सजी किताबें 
बड़ी गुमसुम थीं 
उन्हें पता था
यह बाज़ार ही है उनका
सबसे बड़ा दुश्मन  
आज नहीं तो कल
यह उन्हें समूचा निगल जायेगा .

किताबें निहत्थी हैं
जिन्दा रहने की जद्दोजेहद में
नितांत एकाकी
इनको अपनी लड़ाई भी
ठीक से लड़नी नहीं आती
इनको कौन बचायेगा ?
समय ,सीलन और दीमक
किसी को नहीं बख्शते .

किताबें मानस संतति हैं
उन उर्जावान रचनाकारों की
जो कभी निकले तो थे
शब्दों की मशाल लिए
इतिहास की कालिमा मिटाने
पर  चले गए वापस
अपनी –अपनी महत्वाकांक्षाओं के
वर्षा  वनों मे धूनी रमाने
जहाँ की निस्तब्धता को बेध पाना 
बेचारी किताबों के लिए मुमकिन नहीं .

किताबें धीरे धीरे किताबघरों में
मर जाएँगी  एक एक करके .
इनकी असामयिक मौत पर
शोकाकुल होने की
फिलवक्त किसी को फुरसत नहीं .

ध्यान रहे यह सिर्फ
किताबों का मामला नहीं है
बाजार  के बाजीगर
सबसे पहले मिटायेंगे
धरती से किताबों के नामोनिशान
इसके बाद होंगे हम सभी
उनके निशाने पर .
अपनी जड़ों से उखड़े
कद्दावर दरख्तों को भी
किसी चापलूस की मेज
किसी दरबारी की कुर्सी
और किसी बेपेंदी के लोटे का
मजबूत आधार बनने में
समय ही कितना लगता है

शनिवार, 19 जनवरी 2013

रामखिलावन जीना सीख रहा है

तवा चूल्हे पर था
रामखिलावन की तर हथेलियों पर
रोटी ले रही थी आकार
तभी सीधे गाँव से खबर चली आई
बड़के चाचा नहीं रहे .
अब वह क्या करे
रोटी बनाये
कुछ खाए या
फिर शोक मनाये .

रामखिलावन अपने गांव से इतनी दूर
अपनों को रुलाकर
उनकी  भूख की खातिर ही तो आया है
वह यहाँ गुलछर्रे उड़ाने
रोने बिसूरने नहीं आया .
वह कमाएगा तभी तो
कुछ खायेगा
घर गांव के लिए
उसमें से कुछ बचा पायेगा .


रामखिलावन गांव छोड़ चला तो आया
पर  उससे गांव छूटा कहाँ
वह यहाँ सुदूर शहर में आ धमकता है
खूबसूरत यादें  लिए
कभी आँखों के लिए पानी
तो कभी घर लौट आने की
मनुहार लिए
गांव से कभी सिसकियाँ आती हैं
तो कभी हौंसला
और कभी कभी दुखदायी ख़बरें भी .

रामखिलावन हठयोगी है
वह बिना हथियार के भी
लड़ना सीख चुका  है .
अपना काम करना कभी नहीं भूलता
वह दुःख सुख की
परंपरागत परिभाषा से
बाहर निकल आया है
पर निष्ठुर नहीं हुआ है वह .

रामखिलावन के भीतर
अभी भी उसका गांव बसा है .
जिसकी याद में वह सुबकता भी है
मन ही मन रीझता भी है
शोकाकुल भी होता है
वहां की हर अनहोनी पर .
पर वह अपने काम के समय
सिर्फ  काम करता है .

बाकी बचे खुचे समय में  वह वही
गांव  वाला रामखिलावन होता है
जिसे  बड़के चाचा का यूं चले जाना
बहुत  हिला देता है
पर उसके हाथ इस खबर को पाकर भी
थमते  नहीं ,रोटी बनाते हैं
वह रोटियों का मर्म जानता है
उन्हें खाए बिना तो
ठीक से रो पाना भी मुश्किल  है .

रामखिलावन बहुत उदास है
पर  वह जुबानी मातमपुर्सी के लिए
दौड़ा दौड़ा गांव नहीं जायेगा .
वह अब शहर में रह कर
सलीके से जीना सीख रहा है .












गुरुवार, 17 जनवरी 2013

यही वक्त है ....

कुछ बच्चे खेल रहे हैं
छुपम छुपाई
इन बच्चों के मन में
नहीं है नवाब बनने की ख्वाईश
इनके सपने निहायत आत्मघाती  हैं .
उनकी जिद है कि
वे तो ऐसे ही खेलेंगे उम्र भर
बच्चे बड़े होने  की जल्दी में नहीं हैं .

अधिकांश बच्चे जा चुके हैं
खेल की दुनिया से बाहर
इनके मन में राजे रजवाड़े सामंत
 अहलकार ,भांड ,विदूषक बनने का
एक ऐसा  ख्वाब है
जो पलक झपकने या नींद खुलने पर
कभी टूटने वाला  नहीं
 बच्चे बड़े होने की जल्दी में हैं .

बच्चो ! इतना समझ लो
यदि यूं ही पढोगे लिखोगे
तब  कुछ न बन पाओगे
न नवाब न कुछ और .
यदि ऐसे ही खेलते रहोगे
छुपम छुपाई
तुम एक दिन अकेले पड़  जाओगे
जिंदगी की दौड़ में
 कोई तुम्हें ढूँढने न आएगा .

बच्चो ! खेल ही खेल में
कोई है आतताई जो
तुम्हारे बचपन पर  घात लगाये बैठा  है
खुद  मत छुपो ,इन्हें ढूंढो
ठीक से पढों
और इन लोगों की मक्कारी लिखो .

यह सलीके से खेलने
ढंग  से पढ़ने लिखने
लिजलिजे ख्वाबों को
कूड़ेदान में फेंक कर
अपने समय को
ठीक  से समझने का
सही वक्त है .












बुधवार, 16 जनवरी 2013

चाय की दुकान और सुबह



नुक्कड़ वाली चाय की दुकान में
सुबह मुहँ अँधेरे ही आ जाती है
जब एक बीमार बूढ़ा
वहां चला आता है
अपने पाँव घसीटता .
एक ठंडी रात में से गुजर कर
जिन्दा बच निकालना
उसके लिए नए दिन की
सबसे बड़ी खबर होती है
हालांकि  इस खबर को  आज तक
किसी अखबार ने  नहीं छापा .

बीमार बूढ़ा रोज बताता है चाय वाले को
भीषण मौसम से लड़ने की
कामयाब रणनीति
और अपने को पेश करता है
बतौर गवाह .
पर दुकानदार हमेशा उसकी
हर बात को नज़रंदाज़ कर देता है .
उसके लिए तो वह बूढ़ा
बस एक अलस्सुबह जगाने वाला
किसी घड़ी का अलार्म है .

बूढ़ा आया है
तो सुबह भी आती ही  होगी
अपनी पूरी आनबान शान के साथ
अरसे से सुबह ऐसे ही आती है
पर जिस दिन बूढ़ा न आया
तब क्या होगा ?
क्या उस दिन सुबह
अपने आगमन को स्थगित कर देगी ?

चाय वाले के लिए
यह धंधे का समय है
इस वक्त वह
सिर्फ अपने काम से काम रखता है
तमाम फ़िज़ूल के सवालों को
वह रात के लिए संभाल कर रख देता है .
जब रात आएगी तब देखा जायेगा .

बीमार बूढ़ा कह रहा है चाय वाले से
भाई आज दूध वाली  नहीं
नीम्बू की  चाय पिलाओ न !
चाय वाला अचकचा कर देखता है
उस बूढ़े को
वह समझ चुका है
कि ठन्डे दिन बीतने को हैं
इस साल भी इस  बूढ़े ने
ठण्ड को दे दी है निर्णायक मात .

अब यह खबर किसी अखबार में छपे बिना
सारी दुनिया को पता लग जायेगी
कि चाय की दुकान पर
अब सुबह जरा जल्दी आ जायेगी .

समय के होने का मतलब

समय कभी नहीं बीतता
वह निरंतर मौजूद रहता है
अपनी प्रखर अभिव्यक्ति के साथ
अतीत से भविष्य तक
जहाँ देखो वहां वह है
बदलते मौसमों
बदलते चेहरों और
उनकी बदलती भावभंगिमाओं को
मुँह चिढाता .
कोई चाहे या न चाहे
समय कभी असमय नहीं होता .

समय एक निरंकुश शासक भी है
बेहद संवेदनशील दोस्त भी
बात बात पर मुहँ बिसूर लेने वाला
हठी बच्चा भी
मन को बेचैन कर देने वाली
कहीं दूर से आती
किसी मलंग की वाणी भी .

समय अपनी उपस्थिति के लिए
किसी का मोहताज नहीं
न  किसी सत्ता का
न किसी दैवीय अनुकम्पा का
न किसी नक्षत्रीय व्यवस्था  का
न घड़ी की यंत्रवत सरकती सुइयों का या 
कलेंडर पर बदलती तारीखों का .

समय का अपना निजाम है
निजी  संविधान
अपनी न्यायप्रणाली
वैयक्तिक संवेदनशीलता
स्वैच्छिक   आकार
आराजक गतिशीलता
नितांत अपरिभाषित मौन
एकदम अपरिचित संगीत .

समय है इसीलिए सब कुछ है
गहरे अवसाद के भीतर धीरे धीरे बजती
आनंद की जलतरंग है
किसी घोंसले में आर्तनाद करते
भूखे  बच्चों के लिए
उनकी माँ की चोंच में
दबा चुग्गा है
और उसके पंखों में इतनी ऊर्जा
जो अपने बच्चों के पास आने जाने में
कभी चुकती नहीं .

समय  तटस्थ तो है
पर इतना निर्लज्ज  नहीं
कि आततायियों के साथ गलबहियां करे
किसी की भूख में चटखारे ले
किसी की उम्मीद के आखिरी दिए को
अपनी फूंक से बुझा कर अट्टहास करे .

समय किसी को नहीं बख्शता
वह  दबे पाँव चलता है.

सच भी यही है
समय हमेशा उनके साथ होता है
जो  उसके होने का मतलब
ठीक से समझते हैं .










मंगलवार, 15 जनवरी 2013

कोलाहल और मौन

पता नहीं क्यों
मौन में बड़ा कोलाहल होता है
और कोलाहल का कोई अर्थ नहीं होता
मौन भी अक्सर
मौन कहाँ रह पाता है
बन  जाता है एक खूंटी
जिस पर जो चाहे जब
टांग दे  अपनी भड़ास .

लेकिन कोलाहल और मौन के बीच
बहुत  कुछ बचा रहता
बहुत अर्थवान
वहां रहती हैं तनी हुई भृकुटियां
शब्दों का अतिक्रमण करता क्रोध
भिंची हुई मुट्ठियाँ
बदलाव  के सपने
इन्हें एक बार खोल कर देखो .

कोलाहल और मौन के मध्य
जीवन हमेशा मुस्तैद  रहता है
वहां से निकल कर अक्सर कायरता 
दुर्गम  भाषाई अरण्यों की
वाचाल निस्तब्धता में
मुहँ  छिपा लेती है.

कोलाहल हो  या मौन
इनसे कभी कोई कविता जन्म नहीं लेती .


सोमवार, 14 जनवरी 2013

वायदा माफ गवाह

बच्चे पानी में खेल रहे हैं
उलीच रहे हैं
अंजुरी भर भर एक दूसरे पर पानी
उनके इस खेल में
पानी से भरा तालाब भी
उनके साथ है .
वह भी खिलखिला रहा है
बच्चों के साथ .

 पानी में रहने वाली
मछली बेचैन है
उसे कभी  नहीं भायी 
बच्चों की यह खिलंदड़ी
उनके लिए होगा
पानी  एक खेल
मछली के लिए तो यही है 
 जीवन की एकमात्र संभावना .

तालाब तो सबके साथ है
बच्चों के खेल में भी
मछली की आशंका में भी
भीतर के पानी में
जब -तब उठने वाली तरंगों में भी .

तालाब की पक्षधारिता एकदम सपाट है
उसके पानी की तरह पारदर्शी ,निष्कलंक और बेलौस
उसे तो खेलते हुए बच्चे भी अच्छे लगते हैं
पानी में अपना घर बसाये मछलियाँ भी
सभी  उसके अपने  हैं
वह कभी किसी को मायूस नहीं करते .

तालाबों में तब तक खिलते रहेंगे 
अजस्र जीवनदायनी  ऊर्जा के प्रतीक पुष्प
जब तक वह  है जीवन की
हर संभावना और आशंका का
वायदा माफ गवाह .







रविवार, 13 जनवरी 2013

कविता वही है ....

कविता वही
जो सांसों के साथ एकाकार हो जाये
जो किसी मुर्दा भाषा  की मोहताज़ न हो
जिसके लिए शब्दों को खोजते हुए
शमशानी एकांत में न उतरना पड़े .

कविता वही
जो किसी खुशबू की तरह चली आये
बिन बुलाए हँसती खिलखिलाती
जो किसी शैतान बच्चे की तरह
आ जाये घर में बिना अनुमति 
बिना पुकारे या कॉलबैल बजाये .

कविता वही
जिससे संवाद कायम करते हुए
किसी दुभाषिये की जरूरत कभी न हो
जो किसी एक की  नहीं सभी की हो
अपने समय को मुहँ चिढ़ाती
बिंदास .

कविता वही
जिसको नकारने की धृष्टता कोई न करे
जिसका रंग, रूप ,मजहब, जाति
कोई न पूछे
जो सारी वर्जनाओं और मर्यादाओं का
अतिक्रमण करती
चली आये ,कभी भी कहीं भी  .

ए कविता ! तेरा ही मुझे इंतजार है
और पक्का यकीन भी
तुम एक न एक दिन
और शायद रोजाना आओगी
मेरे पास ,बिलकुल आसपास .