रविवार, 9 मार्च 2014

बिकाऊ


बिकाऊ 
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उसने मद्धम स्वर में कहा 
लगभग फुसफुसाते हुए 
मैं बिकाऊ नहीं हूँ मान्यवर 
सजेधजे बाजार की पारदर्शी खिड़कियों पर 
टकटकी लगाये लोगों ने 
उसे शक्की निगाह से घूम कर देखा 
और फिर मशगूल हो गए 
अपने हिस्से के सपनों के 
मोल तोल में .

उसने ऊँची आवाज में कहा
लगभग चीखते हुए 

फिर वही बात दोहराई हुए
मैं बिकाऊ नहीं हूँ मान्यवर
इस बार किसी ने
उसकी ओर मुड़कर भी नहीं देखा
समझदार खरीददारों के पास
ऐसे फालतू कामों के लिए
फुरसत नहीं हुआ करती .

इसके बाद वह हताश हो गया
वापस लौट आया बाजार से
हाथों में सीख का ठोंगा लिए कि
बाजार में सच्ची बातें
या उन्हें कहने का अंदाज़ नहीं
सिर्फ दुकानदार का काइयांपन ,
उसे परसने का सलीका
और हमारी आदमकद मूर्खताओं की
अनवरत तिजारत होती है .

शुक्रवार, 7 मार्च 2014

वसंत का इंतजार

वसंत का इंतजार 
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दीवार पर बेवजह टंगे कैलेंडर ने 
बता दिया समय रहते  
कि लो आ पहुंचा है वसंत 
इस बार भी 
तमाम विलोम परिस्थितियों के बावजूद 
 जैसे फांसी के तख्ते पर खड़ा आदमी 
ठहाका लगा कर हंस पड़े  
हाथ में रस्सी थामे जल्लाद के
मुहँ से बहती राल पर 
भिनकती मक्खियों को  देख कर .

वसंत को गुमशुदा हुए अरसा हुआ 
उसके आने की अफवाह बरस दर बरस चली आती है 
जर्द फूलों ,पंख फडफडाती बेरंग तितलियों
अविश्वास के  हरेपन से लिपटी वनस्पति   
और उदासी से लबरेज खुशबुओं के सहारे 
जैसे आ जाते हैं तमाम उत्सव 
अपने सदियों से तय समय पर 
निराशा के ढोल मजीरे पीटते .

वसंत की उस वासन्तिक आभा का 
इस सदी को बेसब्री से इन्तजार है  
जो बिना किसी तामझाम के 
उतर आती थी मन की 
अतल गहराइयों में चुपचाप 
जैसे जंगल में मोर के नाचते ही 
वहां के सन्नाटे में बज उठे 
कोई ऐसी  सिम्फनी  
जिसे सुन संगीत के प्रामाणिक ग्रंथों के पन्ने 
उसे दर्ज करने के लिए बेचैन हो जाएँ .

वसंत अब जब भी आएगा 
तब उसके आने की पूर्व सूचना 
किसी को नहीं होने वाली 
वह आएगा इतिहास प्रसिद्ध
रंगों की शिनाख्त को धता बताता 
पारंपरिक उपादानों  को मुहँ चिढ़ाता 
जैसे कभी मिथकीय युद्ध से लौटा था एक सम्राट 
अपने अहंकार को तिरोहित कर 
जिंदगी के नए मुहावरे के साथ . 

आओ प्रतीक्षा करें उस वसंत की 
जिसके आने के बाद बदल जायेंगे 
 समस्त शब्दकोशों में मौजूद 
सम्पूर्ण दुनिया के मायने ..

गुरुवार, 6 मार्च 2014

मोची राम

मेरी खिड़की के उस पार 
काली मटमैली सड़क के किनारे 
एक बूढ़े पीपल के तने के करीब 
फटेहाल छाते के नीचे 
जूते गांठने वाले मोचीराम की दुकान है .

सदियां बीत गईं 
दुकान और मोचीराम जस के तस है 
एक पल को भी नहीं हटे 
हर हाल में डटे रहे 
शाम ढले जब मोचीराम जाता है 
औजारों का झोला और छाता लपेट कर 
वह दुकान वहीँ मौजूद रहती है 
स्मृतियों के प्रस्तर पर जमी जिद्दी फफूंद की तरह .

मेरी खिड़की पर ठुँकी हुई है पतली जाली के 
हर बारीक सुराख़ में 
मौजूद है मोचीराम का अक्स
एकदम जीवंत दृश्यावली की तरह 
हरदम सक्रिय हरदम मुस्तैद 
अपने हाथ की उँगलियों से 
अपने वर्तमान को हौले हौले ठोंकता सिलता 
धूसर हौंसले को लगातार चमकाता हुआ .

मोचीराम कितने बरस का है 
किसी को ठीक ठाक तरीके से नहीं मालूम 
वह तब भी था जब पंडित नेहरु की मोटर कार 
सामने वाली सड़क से होकर गुजरी थी .
वह तब भी था जब सारा शहर 
सन सैंतालीस के दंगों में धूं –धूं कर जला था .
वह भी था जब जान बचाकर जाने कहाँ से चले आए थे 
हजारों औरत मर्द बच्चे चीखते चिल्लाते 
और डरे हुए हजारों लोग गुम हो गए थे 
रक्ताभ आंधी के थपेडों में . 

वह अट्ठारह सौ सत्तावन के 
गदर के दौरान भी था 
जब बूढ़े पीपल पर जा लटकी थी 
जुझारू लड़ाकों की मृत देह 
अबाबील के घोंसलों की तरह . 
शायद इससे पहले भी था मोचीराम 
इसके बाद भी है वह मौजूद रहेगा 
हर छोटी बड़ी वारदात का साक्षी बना 
अपनी पनीली आँखों को आस्तीन से पोंछता हुआ .

मोचीराम अजर है अमर है 
समय को बड़ी शिद्दत के साथ 
अपने से दूर ढकेलता हुआ 
अपनी छतरी को बड़ी जतन से सहेजता 
अपने मामूली से औजारों से 
जिंदगी की भीषण जंग लड़ता हुआ 
उसकी लड़ाई कभी खत्म नहीं होने वाली .

मोचीराम को देखते देखते 
मेरी ऑंखें बूढ़ी हो चलीं 
सब कुछ धुंधला धुंधला सा दिखता है 
पर इतना भर तो दिखता ही है 
कि वह खिड़की के आरपार अभी तक डेरा जमाए है 
वर्तमान के जूतों पर 
अपनी ऐतिहासिक समझ की पैबंद लगाता 
उसे दुरुस्त करने की पुरजोर कोशिश करता .