शुक्रवार, 3 जुलाई 2015

वक्त का अजायबघर


तुम जब चाहो घर लौट आना
आने में जरा भी न झिझकना
यहाँ की पेचीदा गलियाँ
अभी भी पुरसुकून हैं
घुमावदार हैं मगर
बेहद आसान हैं
इनमें से होकर तुम
मजे से गुजर जाओगे
कोई तुमसे यहाँ
लापता होने का सबब न पूछेगा
जो भी मिलेगा भूला बिसरा यार
वह जल्दबाजी में कहीं से आता
और किसी ओर जाता मिलेगा .
तुम जब चाहो घर लौट आना
वहां अब रोकने टोकने वाला कोई नहीं
बेधड़क चले आना
घर की छत पर उग आये पीपल को देख
उसे वीरान समझ
बाहर मत ठिठक जाना
वह अब भी जिंदगी से भरपूर है
वहाँ कुछ कबूतरों के जोड़े
उनके बच्चे
चंद गिलहरियां और नेवले रहते हैं
उन्होंने तुम्हारे लायक  जगह
अभी भी बचा रखी है .
तुम जब चाहो घर लौट आना
वहां तुम्हारी माँ की राख
लाल कपड़े में बंधी अभी भी रखी है
जब तुम्हारे आने का इंतजार करती वह मरी
कह गई पड़ोसियों से
सुनो ,मेरी मुट्ठी भर याद
यहीं हिफाजत से रख देना
छुटका आएगा तो उसे सीने से लगा
उसका जल प्रवाह करने से पहले
थोड़ी देर मुझ्से बतिया तो पायेगा .
तुम जब चाहो घर लौट आना
जब तुम्हें सुविधा हो तब आना
यहाँ के लोगों ने किसी के आने की
बाट जोहना बंद कर दिया है
सब अपने अपने के हिस्से  की गुरबत
इत्मीनान से जीते हैं
जीते जीते थक जाते हैं जब
अपनी बदहाली की पोटली
बच्चों को थमा कर
उनके शतायु होने की कामना के साथ
चुपचाप मर जाते हैं .
तुम जब चाहो घर लौट आना
लेकिन आना पैदल ही
यहाँ कोई सवारी अभी भी नहीं पहुँचती
दूसरों के कंधे पर
सवार होने का सुख
परलोकगमन करने पर मिलता है
जीने की चाहत रखने वालों को तो
हर हाल में पैरों के बल चलना ही होता है
यहाँ न जीना कोई खास बात है
न मरना रोमांचकारी
हर कालखंड ऐसे ही सरकता है .
तुम जब चाहो घर लौट आना
यह वक्त का अजायबघर है
जहाँ वर्तमान और इतिहास
एक साथ जिन्दा हैं
भविष्य का हाल
नीम तले बैठने  वाले ज्योतिषी के हरियल के सिवा
शायद ही कोई जानता है .
तुम जब चाहो घर लौट आना
पर आना तभी
जब तुम्हारे मुहँ पर बंद हो जाएँ
दुनियावी चक्रव्यूह से बच निकलने के सारे रास्ते .

मुझे पता है

मुझे पता है कि आसमान का रंग नीला है नीलेपन का यह कौन सा शेड है नहीं मालूम किसी बात के कुछ-कुछ पता होने से कुछ नहीं होता लेकिन ...