शनिवार, 26 सितंबर 2015

अस्पताल जाते मरीज़

लोग अस्पताल जा रहे हैं
देखने में लग रहे लगभग भले-चंगे
उनका अनुमान है कि
वे शायद सख्त बीमार हैं
इन्हें सफेद कोट वाले डाक्टर के
गले में लटके स्टेथोस्कोप से बड़ी उम्मीद है.

लोग अस्पताल जा रहे हैं
उनके पास आज करने जैसा कोई काम नहीं
वे अपने सारे ख्वाब रख  आये हैं
दहलीज़ पर रखे 
गेहूं के भीगे हुए दानों के साथ  
सूखकर कड़क होने  के लिए.
 .
लोग अस्पताल जा रहे हैं
रास्ते में मिलते हर पीर फ़कीर के आगे
बड़ी शिद्दत से सिर नवाते
वे मांग रहे हैं मन्नत
आज डाक्टर का हाथ किसी तरह
उनकी नब्ज तक पहुँच जाए .

लोग अस्पताल जा रहे हैं
उनकी जेबें खाली हैं
उनके पीछे पीछे आ रहे हैं जेबकतरे
कमजोर है जिनकी नज़दीकी  बिनाई
वे मरीजों की खाली जेबों में  
ढूंढ रहे हैं सुख सम्पदा.   

लोग अस्पताल जा रहे हैं
उनका संजीवनी बूटी पर भी
आज भी आधा अधूरा यकीन है
अस्पताल के बाहर खड़े दलाल
बुन रहे हैं झांसे के पारदर्शी जाल
इन्हें भरोसा है मरीजों की मासूमियत पर.

लोग अस्पताल जा रहे हैं
डाक्टर के कमरे की मेज पर
रेंग रही है भूरी छिपकली
एक कीड़े को निगलने के बाद
उसे दूसरे को पकड़ने की जल्दी नहीं
डाक्टर आज सम्भवतः छुट्टी  पर है.

लोग अस्पताल जा रहे हैं
बाहर ठेले पर तले जा रहे हैं
त्रिकोण के आकार के ब्रेड पकौड़े
यदि इलाज की उम्मीद बंधी तो
मरीज और उसका तीमारदार
उसे मिल बाँट कर खायेंगे .

लोग अस्पताल जा रहे हैं
उनमें से कुछ सोचते हैं कि  
वे  तो ठीक ही है
ये डाक्टर और मशीनें क्यों आमादा है
उनकी  देह को बीमार बता 
कीमती दवायें  पर्चे पर दर्ज करने के लिए.


शुक्रवार, 25 सितंबर 2015

मेरी कविता में


मैं अपनी कविता में
कभी किसी को नहीं बुलाता।
मेरी कविता में
कोई सायास नहीं आ सकता।
इसमें जिसे आना होता है
वह आ ही जाता है
अनामंत्रित।
जैसे कोई मुसाफिर आ बैठे
किसी पेड़ के नीचे
उसके तने से टिककर
बेमकसद, लगभग यों ही।
बैठा रहे देर तक
अपनी ख़ामोशी को कहता सुनाता।

मेरी कविता में
डरे हुए परिदों और
मायूस बहेलियों के लिए
कोई जगह ही नहीं है।
पर अँधेरे में दिशा भूला
हर परिंदा यहाँ आ कर
जब चाहे अपना बसेरा बना ले।

मेरी कविता में
किसी की कोई शिकायत
आद्र पुकार या चीत्कार
या मनुहार कभी नहीं सुनी जाती।
इसके जरिये वशीकरण का
कोई काला जादू भी नहीं चलता।
यह किसी को कुछ नहीं देती
न कुछ माँगती है।
लेन देन का कारोबार इसे नहीं आता।

मेरी कविता में
कुटिल मसखरे अपनी ढपली
अपना राग लेकर नहीं आते।
न वीरता का परचम लहराते
योद्धाओं के लिए इसमें जगह है।
इसमें कोई मस्त मलंग जब चाहे
अपनी धुन में गाता गुनगुनाता
जब चाहे तब आ सकता है।

मेरी कविता में
इतिहास में रखे
नृशंस राजाओं के ताबूतों को
सजाने के लिए जगह नहीं।
अनाम फकीरों की
गुमशुदा आवाजों को सुनने के लिए
इसके कान तरसते हैं।

मेरी कविता में
ऐसा बहुत कुछ है
जो है परंपरागत समझ से बाहर
पर उपलब्ध सच के आसपास।
सच को सच मानने में
बड़ी दिक्कत है।

यकीन करें
मेरी कविता और मेरी जिंदगी में
बित्ते भर का भी नहीं है। 

गुरुवार, 24 सितंबर 2015

तिलचट्टे

जब इस धरती पर कुछ भी न बचेगा 
तिलचट्टे फिर भी रहेंगे
उनकी अमरता पर कोई विमर्श  नहीं
जबकि आदमी उसे पाने को  
सदियों से जूझ रहा है.

तिलचट्टे बदबू फैलाते
अँधेरे और सीलन में निरंतर पनपते हैं
वे खतरे और रौशनी का सुराग पाकर
भागते हैं आठ पैरों के सहारे  
फिर भी वे मार डाले जाते हैं
तिलचट्टे अमरता को  नहीं जानते .

तिलचट्टे तभी तक हैं बचे हुए
जब तक वजूद है 
घनीभूत कालिमा और कायर आद्रता का
आदमी के पास नहीं है
उनको जड़मूल नष्ट करने की तकनीक
विज्ञानं सम्मत नासमझी  में उनकी जान बसती है.

आदमी जानता है तिलचट्टे की सारी खूबियाँ
फिर भी कतराता है उस जैसा बनने से 
बना सकता है वह चाहे तो  
उसकी हुबहू अनुकृति
पर अजरता के लिए उसे
तिलचट्टा बनना मंजूर नहीं है .

धरती पर जब कुछ न बचेगा
तो ये बचे हुए तिलचट्टे करेंगे
समस्त जल वाष्पित हो जाने के बावजूद
समुद्र मंथन जैसा कुछ
अमृत और विष तलाशेंगे शायद  
तिलचट्टे आदमी बनने की कोशिश करेंगे .

बुधवार, 23 सितंबर 2015

नींद और राजकुंवर


मैं सोते हुए खर्राटे लेता हूँ
इस बात का मेरे सिवा
सबको अरसे से पता है
कोसों दूर राजमहल में इससे
ध्वनिरोधी शयनकक्ष में सोते राजकुंवर की
नींद में खलल पड़ता है.
मेरी नींद संदेह के घेरे में है
राज गुप्तचरों को पता लगा है कि
उसमें घोड़ों की जमकर खरीद फरोख्त होती है
तमाम घुड़सवारों का एकजुट हो जाना
सात पहरों में रहते राजकुंवर के लिए
खतरे की घनघनाती हुई घंटी है.
मैं मुहं अँधेरे कभी नहीं उठता
 दिन चढ़े तक सोता हूँ
इत्मिनान की चादर ताने
मच्छरों के दंश और उजाले से
खुद को बखूबी बचाता
राजसिंहासन के लिए यह डरावनी खबर है.
राजघराने के लिए
राजकुंवर का कच्ची नींद में जाग जाना
बहुत बड़ी मुसीबत है
और मेरा रोज नींद में उतरना
बगावत की पदचाप
महल की सुरक्षा में सुराख़ हो गये हैं.
जब मैं चैन से सोता हूँ
राजकुंवर पैर पटक पटक कर रोता है
उसकी जिद है कि उसे हर हाल में
मेरे वाले खर्राटे ही चाहिए
राजपाट पाने से पहले उसे
प्रजा की गहरी नींद चाहिए.

कुर्सी और आदमी


गहरे भूरे रंग की जिल्द वाली
नई नकोर कुर्सी पर पसर
मुतमईन है वह
अब उसकी आँखें खोज रही हैं
कुर्सी को रखने के लिए
उचित उपयुक्त और निरापद जगह.

कुर्सी का मिल जाना 
एक खूंखार सपने की शुरुवात है
वह कुर्सी के पीठ पर टंगे तौलिये से
पोंछता  जा रहा है हाथ
रंगे हाथों पकड़े जाने का अब कोई खौफ नहीं.

कुर्सी में लगे है पहियें
घूमने की तकनीक से है लैस
वह उसके हत्थे को कस कर थामे है
उसे पता है कि कुर्सियां
अमूमन स्वामिभक्त नहीं होती. 

कुर्सी पर मौका ताड़कर पसर जाना तो 
फिर भी है काफी आसान
लेकिन बड़ा जटिल है
उसे अपने लायक बनाना
बड़ा मुश्किल है कुर्सी को
घोड़े की तरह सधा लेना.

कुर्सी पर बैठते ही आदमी
घिर जाता है उसके छिन जाने से जुड़ी
तमाम तरह की आशंकाओं से
इस पर एक बार बैठ जाने के बाद
वह वैसा नहीं रह पाता
जैसा कभी वह था नया नकोर. 

मंगलवार, 22 सितंबर 2015

जिन्दा बचे लोग


जो अभी तक जिन्दा बचे हैं  
उनके पास हैं मर जाने के तमाम कारण
लेकिन नहीं है जीवित बने रहने लायक
एक भी सार्थक सपना
और तो और इनके पास नहीं है
अपने जिन्दा होने का एक भी प्रामाणिक सुबूत.

जो अभी तक जिन्दा बचे हैं
उनको मारने के लिए दी गई सुपारी
निगल ली है भाड़े के हत्यारों ने
अपने निखट्टूपन से उकता कर
इनके बने  रहने की शायद
यही एकमात्र तार्किक वजह है.

जो अभी तक जिन्दा बचे हैं
अपनी जान की खैर मनाते
उन लोगों की कायरता की रोज खिल्ली उड़ाते हैं
जो मर डाले गए देखते ही देखते
और मुकाबले के लिए मुट्ठियाँ भी न बाँध पाए
बस ताकते रहे टुकुर टुकुर आसमान की ओर.

जो अभी तक जिन्दा बचे हैं
उनको मार डालने के तरीकों की
हो रही है सघन पड़ताल
धर्मग्रंथों के पीले पन्नों में
और ये ढूंढ रहे हैं अपना मुकद्दर
तर्कशास्त्र की पेचीदा गलियों के मानचित्रों में..

जो अभी तक जिन्दा बचे हैं
टकटकी लगाये बैठे है
द्रव्य की अविनाशिता के सिद्धांत पर
चमत्कारों के विज्ञान सम्मत होने का
सघन आशावाद लिए
हत्यारों के लिए इनकी जिंदगी तमाशा भर है.

रविवार, 20 सितंबर 2015

यात्रा में .....


रेलगाड़ी धडधडाती हुई लगातार दौड़ रही है
वह एक ही जगह सदियों से खड़ा है
उसे सांझ ढले घर पहुँचने की कोई जल्दी नहीं
न उसे यह बात ठीक से पता कि
रेलगाड़ी वाकई कहीं जा भी रही है
गति यात्रा का पुख्ता सुबूत नहीं होती.

रेलगाड़ी धडधडाती हुई लगातार दौड़ रही है
बगल वाली पटरी पर एक और रेलगाड़ी  
उसके बगल वाली पर भी शायद एक 
जितनी पटरियां उतनी रेलगाडियां  
होड़ से बाहर खड़ा तमाशबीन  
बड़ी एहतियात के साथ मुस्कुराता है.

रेलगाड़ी धडधडाती हुई लगातार दौड़ रही है
रेलवे फाटक पर तैनात गेटमैन
ईंट जोड़ कर बनाये चूल्हे पर
जल्दी जल्दी सेंक रहा है  रोटियां
पटरी किनारे के फाटक पर   
भूख और रेलगाड़ी कभी भी आ धमकती है  .

रेलगाड़ी धडधडाती हुई लगातार दौड़ रही है
प्लेटफार्म पर अजब हलचल है
पर नहीं है सफर खत्म होने का कोई चिन्ह 
पूछताछ खिड़कियों पर बिना कुछ जाने बूझे
लोग कर रहे हैं अपने से गुपचुप बातें
बातें और यात्राएँ कभी नहीं थमती है.

रेलगाड़ी धडधडाती हुई लगातार दौड़ रही है
खिड़की के पार गांव घर याद धुआं  
सब भाग रहे हैं विपरीत दिशा में
वह देख रहा है कनखियों से
जलती बुझती रोशनियों का खेल  
हर यात्रा का अपना तिलस्म होता है.

शुक्रवार, 18 सितंबर 2015

लड़का और सवाल

घर की ओर जाने वाली रेलगाड़ी का
इंतज़ार करती औरत से
लड़का लगातार पूछे जा  रहा है
हमारे वाली रेल कब आएगी
लड़का सवाल बहुत पूछता है
औरत के पास जवाबी चुप्पी है.

धरना देने के लिए सुबह
वे ले जाए गए थे  राजधानी  
आदमी नेता के साथ उलझा था
भीड़ जुटाने के मोलतोल में
लड़का हैरान था यह सोचकर
हम वहां जाकर क्या करेंगे ,क्या कर लेंगे.

लड़का करना चाहता है ढेर सारी पढ़ाई
न उसके पास किताब है न कॉपी
न पैन न पेंसिल न फीस न तिकड़म
न स्कूल जाने लायक फुरसत
बस हैं कंचों जैसे  गोलमटोल सवाल 
लड़का उन्हीं से रात दिन खेलता है .

आदमी औरत से रोज कहता है
मोढा पूछताछ बहुत करता है
औरत कहना चाहती है
ये मरा तो जन्म से ऐसा ही  है
जुबान लड़ाने के जुर्म में पिटने के डर से
औरत अपनी ख़ामोशी में हौले से मुस्कुराती है .

लौटने की वजह


मैं उन जगहों पर बार बार लौटना चाहता हूँ
जहाँ छोड़ आया था मैं अपनी कोई न कोई चीज
भूलवश नहीं जानते  बूझते  
जगहों को याद रखने का
यह मेरा इजाद किया तरीका है.

मैं पानागढ़ में अपना बचपन
और कलकत्ते  के परेड ग्राउंड में लगी
क्लाइव की आदमकद मूर्ति के जूते में
छुपा आया था अपनी गुलेल यह सोच कर
यहाँ आऊंगा तो उसकी नाक पर निशाना लगाऊंगा .

मैं छोड़ आया था
भीमताल की झील के बीचों बीच बने टापू पर  
पीताम्बर के ढाबे की कढ़ी चावल का स्वाद
मुझे पता था इसी बहाने उस खूबसूरत घाटी में
आवाजाही की एक जायज़ वजह बनी रहेगी.

मैं शाहजहांपुर को अलविदा कहता हुआ
प्यार का नरम अहसास वहां की उस गली में धर आया था
जहाँ कभी भुवनेश्वर घूमा था
अपनी कहानियों को अंग्रेजी में अनूदित करता
नीम बेखुदी के आलम में.

मैं सहारनपुर से भी ऐसे ही नहीं आया मुहँ मोड़कर
लकड़ी पर नक्काशी करते कारीगरों के हुनरमंद हाथों
और बेहट की अनगढ़ घंटियों की दिव्य आवाज़ के लिए
अपना दिल रख आया था इस उम्मीद के साथ
दिल के  साथ सहारनपुर भी धड़केगा देह में.

मैं दिल्ली से वापस आया तो वहाँ से आ गया समूचा
लगा इसे मेरे जैसों की जरूरत नहीं
वहाँ आने वालों की लंबी कतार लगी  है
यह बेमुरव्वत शहर है जो किसी को याद नहीं रखता
मटकापीर के पेड़ पर टंगे घड़े प्यासों के लिए नहीं है.

मैं दिल्ली के सिवा हर जगह लौट जाना चाहता हूँ
पर पता नहीं बाकी बची इन जगहों में
अब तक मेरे लायक कुछ शेष भी रहा  होगा या नहीं
वक्त के बेरहम कदमों के तले
यादों के सूखे पत्ते  बेहूदा तरीके से चरमराते हैं.

खोया -पाया

मुझे आज अलस्सुबह पुराने दस्तावजों के बीच एक जर्द कागज मिला दर्ज थी उस पर सब्ज रंग की आधी अधूरी इबारत वह प्रेमपगी कविता नहीं थी, शायद या ...