मंगलवार, 15 जनवरी 2013

कोलाहल और मौन

पता नहीं क्यों
मौन में बड़ा कोलाहल होता है
और कोलाहल का कोई अर्थ नहीं होता
मौन भी अक्सर
मौन कहाँ रह पाता है
बन  जाता है एक खूंटी
जिस पर जो चाहे जब
टांग दे  अपनी भड़ास .

लेकिन कोलाहल और मौन के बीच
बहुत  कुछ बचा रहता
बहुत अर्थवान
वहां रहती हैं तनी हुई भृकुटियां
शब्दों का अतिक्रमण करता क्रोध
भिंची हुई मुट्ठियाँ
बदलाव  के सपने
इन्हें एक बार खोल कर देखो .

कोलाहल और मौन के मध्य
जीवन हमेशा मुस्तैद  रहता है
वहां से निकल कर अक्सर कायरता 
दुर्गम  भाषाई अरण्यों की
वाचाल निस्तब्धता में
मुहँ  छिपा लेती है.

कोलाहल हो  या मौन
इनसे कभी कोई कविता जन्म नहीं लेती .


खोया -पाया

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