रविवार, 9 मार्च 2014

बिकाऊ


बिकाऊ 
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उसने मद्धम स्वर में कहा 
लगभग फुसफुसाते हुए 
मैं बिकाऊ नहीं हूँ मान्यवर 
सजेधजे बाजार की पारदर्शी खिड़कियों पर 
टकटकी लगाये लोगों ने 
उसे शक्की निगाह से घूम कर देखा 
और फिर मशगूल हो गए 
अपने हिस्से के सपनों के 
मोल तोल में .

उसने ऊँची आवाज में कहा
लगभग चीखते हुए 

फिर वही बात दोहराई हुए
मैं बिकाऊ नहीं हूँ मान्यवर
इस बार किसी ने
उसकी ओर मुड़कर भी नहीं देखा
समझदार खरीददारों के पास
ऐसे फालतू कामों के लिए
फुरसत नहीं हुआ करती .

इसके बाद वह हताश हो गया
वापस लौट आया बाजार से
हाथों में सीख का ठोंगा लिए कि
बाजार में सच्ची बातें
या उन्हें कहने का अंदाज़ नहीं
सिर्फ दुकानदार का काइयांपन ,
उसे परसने का सलीका
और हमारी आदमकद मूर्खताओं की
अनवरत तिजारत होती है .

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