रविवार, 20 जुलाई 2014

स्मृति का अस्तबल

स्मृति के अस्तबल में हिनहिना रहे हैं
बीमार  अशक्त और उदास घोड़े
अतीत की सुनहरी पन्नी में लिपटे
इन घोड़ों को यकीन नहीं हो रहा
कि वे वाकई बूढ़े हो चले  हैं |

रेसकोर्स में सरपट भागते भागते
वे भूल चुके थे स्वेच्छा से थमना
ठिठकना और ठिठक कर मुड़ना
पीछे घूम कर अपने फौलादी खुरों के साथ
निरंतर घिसते  हुए  समय को देखना.

घोड़े अपने सपनों में अभी भी दौड़  रहे हैं
बीत गए वक्त को धता बताते
असलियत के मुख को  धूलधसरित करते
अपनी जीत और जीवन का जश्न मनाते
यह  उनका  सच को नकारने का अपना तरीका है .

अस्तबल में खूंटे से बंधे बूढ़े घोड़े
अभी तक जब तब हिनहिना लेते हैं
ताकि शायद  उनकी कोई सुध ले
उन्हें लौटा दे  बीता हुआ वक्त
उमंग उत्साह और रफ़्तार |

 स्मृति के अस्तबल में
बीमार अशक्त और उदास घोड़े ही नहीं
अनेक अगड़म सगड़म चीजों के साथ
कुछ ऐसे दु:स्वप्न भी रखे  हैं
जिन्हें इत्तेफाक से
घोड़ों की तरह हिनहिना  नहीं आता |

और सबसे हैरतअंगेज़ बात यह कि
ये घोड़े आईने के नहीं बने हैं
फिर भी इनमें कभी कभी  मुझे
अपना अक्स दिख जाता है .