मंगलवार, 12 मई 2015

तब समझ लेना




रोटी का पहला कौर तोड़ते हुए
जब खेत खलिहान में लहलहाती
दूध से भरी गेहूं की बालियाँ याद न आयें l

गर्म दूध को पीने से पहले
फूंक मार कर उसे ठंडाते हुए
गाय के थन में अपना जीवन टटोलते
बछड़े का अक्स सामने  न उभरे l

पानी पीने के लिए
गिलास को मुहँ से लगाते ही
कोसों दूर से मटकी भर जल लाती  
बहुरंगी ओढ़नियों से छन कर आता     
पसीने से लथपथ संगीत  सुनाई न दे l

रात के घुप्प अँधेरे में
सुदूर गांव से आती
सिसकियाँ और मनुहार 
सुनाई देनी कतई बंद हो जाएँ l

गर्मागर्म जलेबी को खाते हुए
गांव वाली जंगल जलेबी का 
मीठा कसैला स्वाद जिह्वा पर
खुदबखुद न तैर जाये   l

तब समझ लेना
तुम चले आये हो
अपने घर बार से दूर
इतनी दूर
जहाँ से वापस लौट आने की

अमूमन कोई गुंजाईश नहीं रहती l

मुझे पता है

मुझे पता है कि आसमान का रंग नीला है नीलेपन का यह कौन सा शेड है नहीं मालूम किसी बात के कुछ-कुछ पता होने से कुछ नहीं होता लेकिन ...