शनिवार, 8 अगस्त 2015

सोना जागना


दिन भर के सफर के बाद
रात में सोने की
पुरजोर कोशिश करता आदमी
बड़ा मासूम लगता है
वह सोने से पहले 
सुबह वक्त पर उठने के लिए
खूब  तैयारी करता है
वह अपने सपनों से कहता है
तुम मत आ टपकना  
मेरी आँखों में रत्ती भर जगह नहीं..

सुबह वाली ट्रेन बड़ी बेमुरव्वत होती है
वह कभी किसी का लिहाज नहीं करती
थकी हुई आत्माओं को अपने भीतर भर कर
तयशुदा समय पर सर्र से निकल जाती है
अपनी ओर लपकते हांफते हुए
बुजुर्ग तक का भी ख्याल नहीं करती
जिसके दिल की धडकनें
पैरों से तेज दौड़ रही होती हैं .

रात में सोने से पहले बेनागा
ऐसी प्रार्थना करता है आदमी
जो किसी ईश्वर को संबोधित नहीं होती
उसमें लोहे की पटरियां 
और गार्ड की हिलती हुई
हरी झंडी होती है केवल 
और होती है ट्रेन की
रवानगी वाली  कूक अनिवार्यत: .

प्लेटफार्म पर जमा बेसाख्ता भीड़ को
चीरता हुआ बदहवास आदमी
ट्रेन के पीछे दौड़ता 
कम्पार्टमेंट के दरवाजे पर लगे
हैंडिल  को अंतत: थामने का  आशावाद लिए
रात और  नींद को कोसता हुआ 
जब  ट्रेन में चढ़ता है
तो  सिर टिकाने की
जगह तलाशता है
ताकि रात की कच्ची नींद की
ज्यादा तो नहीं तो  थोड़ी ही
भरपाई कर पाए .

तमाम जद्दोजेहद के बाद
ट्रेन के किसी तंग कोने में टिक
गहरी साँसों के साथ
खर्राटे भरता आदमी
बड़ा खुदगर्ज लगता है
उसकी मासूमियत  हर  रात
चकनाचूर हो जाती  है 
नींद को पाने में  नाकामयाब होते  हुए .

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