सोमवार, 31 अगस्त 2015

मेरे लिए .... .


मेरे लिए कविता लिख पाना
धीरे धीरे बहुत मुश्किल होता जा रहा है
ठीक उसी तरह जैसे किसी प्यार से भरी दरिया में
आकंठ उतर जाना
सच तो यह भी है
जिंदगी को बड़ी एहतियात से जींने की घड़ी आ गई है.

मेरे लिए ठीक से साँस ले पाना
दूभर होता जा रहा है
ठीक उसी तरह जैसे
निपट सुनसान में भी अकेले बैठ कर
कोई पुराना गीत गुनगुनाना
बढ़ती उम्र के तकादे को टालते जाने का वक्त बीत गया.

मेरे लिए किसी से बहस में उलझने का
समय चुपके से बीत गया पता न चला
अब हर बात को सुनते हुए
उसे ऊँचा सुनाई देने की दलील के साथ
अनसुना करते चले जाने का विकल्प बचा है
चेहरे पर बेचारगी लपेट कर जीते चले जाने की अजब मजबूरी है.

मेरे लिए हर नये दिन को पूरी ताकत से जीने का
मकसद ही मानो खत्म हुआ
अब कैलेंडर पर तारीखों और साल को देखते हुए
मन कांप कांप जाता है
मानो दिल कहता हो बहुत हुआ अब सामान बांधो
यह किस सफर की तैयारी है कुछ पता नहीं.

मेरे लिए जिंदगी में खुलते जा रहे है रास्ते
तमाम निराशाओं के बावजूद
सांस का हरेक कतरा मेरे लिए
उत्सव मनाने जैसा है
जिंदगी और मौत के बीच का संकरा गलियारा
घटाटोप अँधेरे से भरा है लेकिन रोशनी की उम्मीद अभी जिन्दा है.



खोया -पाया

मुझे आज अलस्सुबह पुराने दस्तावजों के बीच एक जर्द कागज मिला दर्ज थी उस पर सब्ज रंग की आधी अधूरी इबारत वह प्रेमपगी कविता नहीं थी, शायद या ...