शुक्रवार, 8 मार्च 2013

मेरे सपने


मेरी आँखों के ककून में
सपने कभी नहीं टिकते
उनके पंख निकल आते हैं
तो तितली बन उड़ जाते हैं
सच तो यह है
मेरी आँखों को सपने सहेजने का
सलीका कभी नहीं आया .

केदार जी को याद करते हुए----

मैं केदारनाथ सिंह को जानता था समूचा नहीं ,उतना ही जैसे किसी बोसीदा मकान के आंगन में लाल फूलों से लदे गुलमोहर के पेड़ को जैसे ल...