मंगलवार, 12 फ़रवरी 2013

तीन तिलंगे और लेखक



घुटन भरे अपने कमरे में
देश दुनिया से बेपरवाह
लेखक रंग रहा है
कागज दर कागज .

छापे खाने में पसीने में तरबतर
श्रमिक दे रहे हैं
लेखक के लिखे को
एक सुंदर आकार .

प्रकाशक किताबों के ढेर को थामे
खड़ा है नतमस्तक
कमीशनखोर की देहरी पर
खीसें निपोरता .

दीमकों को आ रही है
ताज़ा कागजों की गमक
उनकी भूख का इंतज़ार
अब खत्म होने को है .

कुछ ही देर में मुक्कमल हो जायेंगे 
महाभोज के सारे इंतजाम
जिसमें ये तीन तिलंगे जीमेंगे
अपने अपने हिस्से का माल .

लेखक अपनी धुन में ऐंठा है
ख्वाबों की हरी डाल पर बैठा है
हरदम मिटठू मिटठू करता है
जीते जी रोज ही मरता है .

खोया -पाया

मुझे आज अलस्सुबह पुराने दस्तावजों के बीच एक जर्द कागज मिला दर्ज थी उस पर सब्ज रंग की आधी अधूरी इबारत वह प्रेमपगी कविता नहीं थी, शायद या ...