गुरुवार, 7 फ़रवरी 2013

संवादों का पुल



मैं लिखा करता था
अपने पिता को ख़त
जब मैं होता था
उद्विग्न ,व्यथित या फिर
बहुत उदास
जब मुझे दिखाई देती थीं
अपनी राह में बिछी
नागफनी ही नागफनी
यहाँ से वहां तक .

मेरा बेटा मुझे कभी ख़त नहीं लिखता
फ़ोन ही करता है केवल
उसकी आवाज
महानगर के कंक्रीट के जंगल से
निकल कर
गाँव -कस्बों ;खेत -खलिहानों
बाजारों को लांघती
धवनि तरंगों में ढल कर
पहुँचती है जब मेरे कानों तक
तब उसमे नहीं होती
कैशोर्य की कोई उमंग
उसमे से झरती है
निराशा की राख ही राख .
इसी राख में जरूर होंगे
आस के अंगारे भी
मेरे कान महसूस करना चाहते हैं
उस तपिश को
पर अक्सर रहते हैं
नाकामयाब ही .

मेरे पिता मेरे लिखे ख़त का
तुंरत भेजते थे जवाब
उसमे होती थीं ढेर सारी आशीषें,
शुभकामनाएँ ,
अस्फुट सूचनाएँ ,
बदलते मौसम का विवरण
और उससे खुद को
बचाय रखने की कुछ ताकीदें .


मैं पिता का ख़त पढता
और मुतमईन हो जाता
कुछ पल के लिए
यह सोच कर कि
यदि कभी आपदा के मेघ बरसे
तो मेरे पिता उपस्थित हो जाएंगे
               छाता लेकर
बचपन से मैने जाना
जब कभी मेघ बरसे
मेरे पिता गए
छाता लेकर
उन्होने मुझे कभी भीगने
नहीं दिया .

पिता के लिखे सारे ख़त
मैने रखे हैं आज भी
बहुत सहेज कर अपने पास .
मुझे पता है
ये ख़त जादुई हैं
जरूरत पड़ने  पर
कभी ढाल ,कभी तलवार
तो कभी छाता बन सकते हैं .

लेकिन मैं अपने
हताश ,निराश ,बैचैन
महानगरीय अन्तरिक्ष में
भविष्यहीनता को झेलते
एकाकी संघर्षरत  बेटे को
फ़ोन के जरिये
अपने स्नेह का स्पर्श ,
ध्वनि-तरगों में लिपटा
पिता सरीखा विश्वस्त आश्वासन
आपदा से बचाने वाला छाता
देना भी चाहूँ तो कैसे दूं ?

कागज़ पर अंकित शब्द
बन जाते हैं इतिहास
उसमे प्रवाहित होता है
उर्जा का अजस्र स्रोत
लेकिन ध्वनित तरंगें
तो खो जाती हैं पलक झपकते
और रह जाता है
पिता पुत्र के बीच संवादों का
एक कमजोर पुल.
जिसका दरकना तय है
मौसम की पहली बारिश  में.

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