शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2015

नौचंदी का मेला

जब तक मैं थामे रहा
मेले की तमाम गहमागहमी के बीच
किसी उंगली को मजबूती के साथ
बचपन और नौचंदी का मेला बना रहा
मेरे लिए कौतुहल का सबब
और देखने दिखाने लायक.

मां अंबे की आरती और
बाले मियां की मजार से उठी
कव्वालों की सदायें
जब तक गूंजती रही कोरस में
मेरे लिए रहा यह मेला
वाकई एकदम मेले जैसा.

मेले की दुकानों पर
जब तक हलुआ परांठा
बरेली का ममीरा
कच्ची मिटटी में पगा काजल मिलता रहा
मेरे लिए बर्फ की सिल पर रखे कसेरू
हमेशा सुस्वादिष्ट बने रहे.

मेले की भीड़ के बीच
पुलिसिया घोड़े चलते रहे  चुपचाप  
बल्लियाँ जोड़ कर बने वॉच टावर पर
ऊंघते  रहे   वर्दीधारी सिपाही
मेरे लिए उनकी ये बंदूके रहीं
लकड़ी के बेजान कुंदे .

मेले में  एकबार मची थी भगदड़
हुई थी तब यहाँ खूब मारकाट
इतिहास बांचता कोई विद्वान्
जब यह बात बताता   
मेरे लिए इसे अफवाह मान लेने की
मौजूद रहती थीं तमाम वजह.

नौचंदी का मेला हर बरस लगता है
इसकी हमनाम रेलगाड़ी रोज आती जाती है
रेलगाड़ी की खिड़की पर बैठा कवि
लगातार करता है खतरे की मुनादी
मेरे लिए नौचंदी का मेला फिर भी
जिंदा उम्मीद का तन्हा लफ्ज़ है.