शुक्रवार, 16 अक्तूबर 2015

दोस्त जो चला गया समय के आरपार


एक दोस्त और चला गया
बहुत जल्दी में था
चाहता तो ठहरता कुछ दिन और
कम से कम तब तक जब कोई कहता
कविता के सच पर
मुश्किल हो रहा है यकीन करना।

वह अपनी कविता में 
समय की आँखों में आँखे डाल 
पंजा लड़ाने की बात करता 
उसका कांपता हुआ बायाँ हाथ 
बता देता कि 
सब वही नहीं है जो वह लिखता है।

उसके लिए कविता में उतरना 
लगातार होता जा रहा था कठिन 
जैसे चार कदम चलता हुआ
वह् हांफ जाता 
कहता ,वक्त मिले तो 
पढ़ना वह भी जो उसने नहीं लिखा।

वह शब्दों के चप्पू से 
जिंदगी की जर्जर नाव 
खेने की पुरजोर कोशिश करता
खोजता भाषा का खोया तिलस्म 
उसे बिल्कुल नहीं पता था 
टूट चुका है कविता का जादू।

उसे जाना ही था इसी तरह 
जैसे सबको जाना है एक दिन
सराय में मुसाफिर का ठहराव तय होता है 
और आदमी की सांसों की गिनती
उसकी कविताओं में उसे ढूँढने की 
जिम्मेदारी अनायास आन पड़ी है।

वह समय से नहीं हारा
जीत भी नहीं पाया यकीनन                                        
बस साथ चलते चलते 
चला गया समय के आरपार अचानक
घड़ी के अंदर जो टिकटिक करता है 
समय केवल वही नहीं होता।

दोस्त, जाने से पहले इतना मौका तो देते 
हांफते कांपते हम साथ साथ चलते 
तमाम कविताओं का पुनर्पाठ करते 
सूखी हुई पत्तियों पर एहतियात से पाँव रखते 
किसी वीरान सड़क पर दूर तलक 
बीच बीच में खुद से बतियाते हुए।