शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

ईद : कुछ शब्द चित्र

ईद आई है बड़ी मन्नतों के बाद 
बारिश आ गई बिन बुलाए 
कभी कभी खुशियों के संग 
कौन कौन आ जाता है .
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मैंने कहा ईद मुबारक 
उसने अचकचा के देखा 
कभी कभी मौहब्बत भी 
मज़हब पूछती है 
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इतनी सारी मुबारकबाद
इन्हें कहाँ रखूं सहेज कर
कभी कभी दिल भी
कितना छोटा पड़ जाता है .
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माँ हर बरस देती थी 
हमें ईद पर ईदी 
कभी कभी माओं से 
कोई उनका धर्म नहीं पूछता .
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मैंने कहा चाँद निकल आया है 
माँ खामोश रही 
कभी कभी खुशखबरी भी 
कितना उदास कर जाती है
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अम्मी चली गई
हामिद का चिमटा रसोई में है
कभी कभी ईदगाह की
रसोई को हरदम याद आती है .*

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प्रेमचन्द की कहानी ईदगाह को याद करते हुए
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ईद आती है तो खुशियाँ 
सेवैय्यों के साथ आ जाती हैं
कभी कभी ईद भी 
दीवाली सी हो जाती है .
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एक घर में खुशियाँ हैं 
दूसरे में मुफलिसी 
कभी कभी खाली बर्तनों में ईद 
उदास धुन की तरह बजती है .


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मुझे पता है

मुझे पता है कि आसमान का रंग नीला है नीलेपन का यह कौन सा शेड है नहीं मालूम किसी बात के कुछ-कुछ पता होने से कुछ नहीं होता लेकिन ...