बुधवार, 7 अगस्त 2013

सुबह :कुछ शब्द चित्र

कल रात सोया नहीं 
सुबह फिर भी हसीन है .
कभी कभी अलस्सुबह  
उम्मीदें भी जाग जाती हैं .
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मैं मुहँ अँधेरे बना लेता हूँ 
बिना दूध चीनी वाली चाय 
कभी कभी कड़वाहट से आती है 
चाशनी भरी सुबह .
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मंदिर में होती आरती 
मस्जिद से उठती अज़ान 
कभी कभी सुबह 
बिना मुहँ धोए ही आ जाती है .
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ईद और हरियाली तीज 
दोनों साथ साथ होंगी 
कभी कभी मेहँदी 
हर हाथ पर फबती है .
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अभी अभी बारिश थमी है 
चल काम पर चल 
कभी कभी दुनियादारों को भी 
रेनी डे की याद आती है .
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मेरा मित्र रोज भेजता है एसएमएस से 
गुड मार्निंग में लिपटी सुबह 
कभी कभी जब संदेसा  नहीं आता 
मुझे सुबह के वजूद पर शक होता है .
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वह आ जाये घर 
तब बरस लेना जी भर के 
कभी कभी बारिश से 
हम कितनी मिन्नतें करते हैं
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