रविवार, 11 अगस्त 2013

अगडम सगडम दिन



आदमी के भीतर पियानो
वीकेंड की फुरसत में बजता है
कभी कभी तन्हाई में
पैर थिरक उठते  हैं .
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वीकेंड के आने की आहट से
मन मोर बन कर नाचता है
कभी कभी इंतजार करती ऑंखें
मोर के पर नोच लेती हैं .
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हाथ में चाय का प्याला
और प्लेट भरी फुरसत
कभी कभी रुमानियत
भाप बन कर आती है .
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मुहँ अँधेरे भीतर कॉलबैल बजी है
बाहर खड़ा कोई पूछता है किसी का पता
कभी कभी इस पूछताछ में
खुद अपना पता खो जाता है .
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कल तो छुट्टी है
आज रात जम कर सोना है
कभी कभी इतनी -सी बात
रात भर सोने नहीं देती .
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घड़ी का अलार्म बज उठा
तब याद आया आज तो छुट्टी है
कभी कभो घड़ियाँ भी
कितनी बेरहम होती हैं .
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खोया -पाया

मुझे आज अलस्सुबह पुराने दस्तावजों के बीच एक जर्द कागज मिला दर्ज थी उस पर सब्ज रंग की आधी अधूरी इबारत वह प्रेमपगी कविता नहीं थी, शायद या ...