गुरुवार, 8 अगस्त 2013

रात और बारिश :कुछ शब्द चित्र



रात घिर आई है
पर तुम नहीं आई
कभी कभी नींद
बड़ी बेतकल्लुफ हो जाती है .
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रात की स्याही का
अब हम क्या करें
कभी कभी बदलती तकनीक में  
कुछ चीजें  बेमानी हो जाती हैं .
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कल कामकाजी दिन है
थकी हुई देह सो चुकी हैं
कभी कभी मन
नींद के भीतर चलता है .
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सपने देखने के लिए
रात की चादर छोटी पड़ जाती है
कभी कभी समझ नहीं आता
कितने पाँव समेटें .
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नीड़ से बिछड़ा पक्षी
आधी रात चहकता है
कभी कभी जरा सी  चहक से
अन्धकार  जल्दी मिट जाता है .
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रात आई है
तो जायेगी भी जरूर
कभी कभी कुछ किस्से
निशाचर बन जाते हैं .
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रात के सीने में दफ़न हैं
अनेकानेक झूठे सच्चे राज
कभी कभी मुखबिर भी
असलियत छुपा जाते हैं .
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रात के किस्से
दिन में पढ़े जाते हैं
कभी कभी कुछ अफ़साने
स्याह इबारत  में  लिखे जाते हैं .
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कोई पूछ रहा है
यह अँधेरा कब मिटेगा
कभी कभी कुछ सवालों  में
जवाब नहीं सवेरे की आस होती है .
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रात के भीतर रहता है
एक हठी बांसुरीवादक
कभी कभी उसकी तान पर
थिरक उठता है सन्नाटा भी .
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बरस रही है बारिश
सारा ईंधन गीला है
कभी कभी नादान भूख
कोई दलील नहीं मानती .
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काले मेघों के पीछे से
कैसे आयेगा ईद का चाँद
कभी कभी फिर भी खुशियाँ
छाता लेकर भी आ जाती हैं .
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बारिश की बौछारों से
छाता हो गया परास्त
कभी कभी हिम्मत
जलरोधी  रेनकोट बन जाती है .
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आज बरस ले जी भरके
कल क्या होगा क्या पता
कभी कभी आज और कल में
सदियों का फासला  होता है .
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बारिश के पानी में भीग गया
घर का चप्पा चप्पा
कभी कभी छत का अहंकार
यूं भी बिखर जाता है .
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बारिश की थिरकती बूंदों में
आओ चलो करें धमाल
कभी कभी संग संग नाचने की
कोई उम्र तय  नहीं होती .
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बाहर बरस रही है उमंग
भीतर उमस भरी उदासी है
कभी कभी बारिश में
मन देह के पार चला आता है .
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बारिश का पानी पारदर्शी होता है
वह  आईना न नहीं होता
कभी कभी अपना अक्स ही  
इस भूल भुल्लिये में गुम जाता है .
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बारिश का पानी सिर्फ पानी होता है
साफ़ स्वच्छ निर्दोष एकदम निर्मल
कभी कभी हम इसमें चुपके से
अपने रंग मिला आते हैं .