गुरुवार, 1 अगस्त 2013

कभी कभी -२


तुम मुझे पुकारो
पूरी निशब्दता के साथ
कभी कभी आवाजें
शब्दों के पार चली आती हैं .
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भरपूर उम्र गुजर गई
हमारी देहों से होकर
कभी कभी दीवार पर टंगा केलेंडर
बहुत मुहँ चिढाता है .
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मेरे पास तमाम वजह थीं
तुम्हे याद रखने की
कभी कभी लगभग बेवजह
झूठ बोलने को जी करता है .
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तुम मोहल्ले से क्या गईं
उड़ गईं सारी चिड़िया भी
कभी कभी चिड़िया भी
वीराने से घबरा  जाती हैं .
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तुम्हारे जर्जर घर के आंगन में
उग आये हैं आवारा बिरवे
कभी कभी इन बिरवों से
सिर फुटव्वल को मन करता है .
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मुझे सब याद है
तुम भूल गईं सब कुछ
कभी कभी भूलने और याद के
मायने कितने एक होते हैं .
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बड़े जतन से संभाल कर रखे
तुम्हारे खतों को हौले से छूता हूँ
कभी कभी कागज  भी
घुंघुरू से  बज उठते  हैं .
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कल अनायास आ गई
तुम्हारी यादों की बारात
कभी कभी दर्द भी
कितने भेष भरते हैं  .
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उस दिन तुम आ गईं छज्जे पर
सुनकर मेरे आने की आहट
कभी कभी बीते हुए पल
वापस लौट आते हैं यूंही .
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मेरी उदासी
मेरी कविता की हमजोली हैं
कभी कभी एकाकीपन में
ये सहेलियां खूब धमाल करती हैं .
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सफ़ेद कबूतर के पंख सा कागज
किरणें बिखेरती स्याही ,खूबसूरत पैन
कभी कभी लेपटॉप पर थिरकती उँगलियाँ
थम सी जाती हैं इन्हें याद करके .


मुझे पता है

मुझे पता है कि आसमान का रंग नीला है नीलेपन का यह कौन सा शेड है नहीं मालूम किसी बात के कुछ-कुछ पता होने से कुछ नहीं होता लेकिन ...