सोमवार, 5 अगस्त 2013

कभी कभी


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वह अवसाद के गहरे समन्दर में उतरा रही है 
मैं शिद्दत से पुकार रहा हूँ -वापस लौट आओ 
कभी कभी बेचैन आवाजें सिर्फ
मायूस गोताखोर बनीं रह जाती हैं .
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मेरी निजी जिंदगी में बहुत उदासी है 
इसलिए सरेआम ठहाके लगाता हूँ 
कभी कभी फर्जी हंसी भी
बड़े काम की होती है .
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सात समंदर पार से खबर है 
करोड़ों की लॉटरी लगने की 
कभी कभी चीटर कौक* भी 
मेरी मुफलिसी पर हँसते  हैं .
*ठग
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एक दिन उसने कहा था -धत 
अफसानानिगार ने उसे कहानी बना डाला 
कभी कभी कुछ किस्सों का 
कभी उपसंहार नहीं होता .
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ये तुम क्या कुछ लिखते  हो 
मैं तो समझ नहीं पाती 
कभी कभी अपना लिखा ही 
पहेली -सा बन जाता है .
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जेब में रखा मोबाइल थरथराता है 
मैं नहीं चाहता उसे सुनना 
कभी कभी ध्वनि तरगों से पहले 
आशंकाएं चली आती हैं .
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आज जिंदगी कितनी स्याह सफ़ेद है 
तुम होती तो ये न होता 
कभी कभी किसी के न होने से 
इन्द्रधनुष क्षितिज का रास्ता भूल जाते हैं .
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खोया -पाया

मुझे आज अलस्सुबह पुराने दस्तावजों के बीच एक जर्द कागज मिला दर्ज थी उस पर सब्ज रंग की आधी अधूरी इबारत वह प्रेमपगी कविता नहीं थी, शायद या ...