सोमवार, 19 अगस्त 2013

कभी कभी : एक उदास दिन में लिखी कविताएँ




लाइब्रेरी में बैठ कर किसी एक
किताब को बांचना बड़ा मुश्किल है
कभी कभी शेल्फ में रखी तमाम किताबें
मुझे भी मुझे भी का कोरस गाती हैं .
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शेल्फ में रखी किताबों को
मैं बड़ी एहतियात से छूता हूँ
कभी कभी जरा सी लापरवाही से किताबें
बच्चों की तरह मुहँ फूला ल्रेती हैं .
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कल तक जो थीं  मेरे दिल के पास
आज वह रद्दी वाले के तराजू में हैं
कभी कभी किताबों का भी
आदमी -सा हश्र होता है .
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मैं किताबों को पढ़ता नहीं
उनसे बतियाता हूँ
कभी कभी लोगों को लगता है
मैं उम्र के साठवें पड़ाव पर हूँ .
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आतंकवादी से लेकर नेताओं तक की
दाढ़ियों में तिनके ही तिनके हैं
कभी कभी तिनकों से बने घोंसलों में
किंग कोबरा भी रहते हैं .
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 मैं हूँ पानी केरा बुदबुदा
अस मानुस की जात
कभी कभी नहीं हमेशा से
सिर्फ काक्रोच ही कालजयी होते हैं .



खोया -पाया

मुझे आज अलस्सुबह पुराने दस्तावजों के बीच एक जर्द कागज मिला दर्ज थी उस पर सब्ज रंग की आधी अधूरी इबारत वह प्रेमपगी कविता नहीं थी, शायद या ...