शनिवार, 10 अगस्त 2013

कुछ और यादें : दिल पर अंकित कुछ शब्दचित्र

अगड़म सगड़म दिनों में 
मैं खूब डायरी लिखता हूँ 
कभी कभी यही अनगढ़ इबारतें 
मेरी हिमायत को आ जाती हैं .
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गौरेया को गुम हुए 
अब अरसा हुआ 
कभी कभी सेविन सिस्टर्स* आ जाती हैं 
तो रौनक लौट आती है .

*भूरे रंग की एक चिड़िया जो सात के समूह में रहती हैं और जब चहकती हैं तो लगता है बहुत सी लड़कियां आपस में बतिया रही हों .हिंदी में ये सतभाई कहलाती हैं .क्या इसकी वजह हिंदी वालों की लड़कियों से जन्मजात अदावत है ?
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यादें होती ही हैं 
किसी गुलाब के कांटे सी 
कभी कभी उनका चुभना भी 
मन को रक्ताभ बना देता है .
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मौसम विभाग ने कहा था 
आज तेज बारिश होगी 
कभी कभी तेज धूप निकल कर 
तकनीकी को खूब मुहँ चिढ़ाती है . .
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ईद सालभर में एक बार आती है 
फिर रहती है कई दिन मुसलसल 
कभी कभी खुशियों की 
कोई मियाद नहीं होती .
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हरियाली तीज पर
तुम बेसाख्ता याद आईं 
कभी कभी मेहँदी रची हथेलियाँ 
दिल पर छप जाती हैं .
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तुम्हें याद करते हुए 
अकसर मैं हांफ जाता हूँ 
कभी कभी याद रखना भी 
किस कदर थकन भरा होता है .
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मंटो को याद करते हुए

रेत के बनते –बिगड़ते टीलों के इस तरफ एक मुल्क है ,एक मन्दिर है ठंडा पानी उगलता हैण्ड पम्प है दूसरी ओर भी ऐसा ही कुछ होगा गरम हव...