गुरुवार, 15 अगस्त 2013

कभी कभी : अगडम सगड़म दिनीं में


कलम की धमक से 
हिल जाती हैं सरकारें 
कभी कभी लेखक भी 
कैसे कैसे चुटकुले गढ़ लेते हैं .
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सोशल मीडिया पर उनके ख्याल 
बड़े क्रांतिकारी होते हैं 
कभी कभी प्रिंट मीडिया में जाकर 
यह नए मुखौटे ओढ़ लेते हैं .
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एक रिटायर्ड संपादक 
दिन भर बने रहते हैं समाज सुधारक 
कभी कभी उनकी हिलती हुई दुम 
असलियत की निशानदेही कर जाती है .
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चेहरे से टपकती मनहूसियत 
वेश भूषा बेढंगी 
कभी कभी तुरंत पता चल जाता है 
ये बंदा तो कवि है .
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वे रात दिन दुम हिलाते हैं 
कोई देख ले तो छुपा लेते हैं 
कभी कभी ये पापी पेट 
कैसे कैसे खेल सिखा देता है .
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वह नहीं सीख पाई 
अभिनय का ककहरा 
कभी कभी केवल देह 
डी.लिट बना देती है .
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उनकी देह से खो गई है 
रीढ़ की हड्डी 
कभी कभी उसका न होना 
कितना सुकून देता है .
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मेहनत करो आगे बढ़ो 
कुछ न कुछ बन ही जाओगे 
कभी कभी नसीहतें 
सच कहने से कतराती हैं .
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तुम मुझे कुछ न दो
मुझे यूं ही रहने दो
कभी कभी कुम्भकार के रीते हाथ 
कमाल का शिल्प गढ़ते हैं  .
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आंगन टेढ़ा था 
वह यह सोच कर नहीं नाची
कभी कभी समतल सतह पर भी 
पैर फिसल जाते हैं . .
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एक हाथ में कलम की तलवार 
दूसरे में कागज की ढाल 
कभी कभी कम्प्युटर बहादुरों के खिलाफ 
ये हथियार कितने अधूरे पड़ जाते हैं .
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महापुरुषों के चरण छूने से 
मैं बहुत झिझकता हूँ 
कभी कभी उनके चरणों की रज में 
घातक जीवाणु पाए जाते हैं .
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कल फिर घुडदौड होगी 
अस्तबल से निकलेंगे अहंकारी घोड़े 
कभी कभी प्यादों तक से 
 घोड़े  हार  जाते हैं .
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महापुरुष जी घर आये 
सहम उठे सारे बच्चे 
कभी कभी सम्मानितजन 
खौफ का दौना लिए आते हैं .
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कविता लिखना या न लिखना 
मेरा नितांत निजी मामला है 
कभी कभी हमारी निजता 
कैसे गुल खिलाती है .
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मेरी  कविताएँ कविता कम 
शिकायती पत्र अधिक होती हैं 
कभी कभी हमको उम्रभर 
 लिखने का सलीका नहीं आता .
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उसके घर आंगन में 
बरस रही है बारिश 
कभी कभी यह सोच कर 
खोया हुआ छाता बहुत याद आता है .
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मेरे छाते की परिधि
बहुत कम निकली
कभी कभी मन बेचारा
यूं भी भीग जाता है .
Top of Form

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बच्चा बना रहा है 
कागज की नाव 
कभी कभी कागज़ी लम्हे 
स्मृति का हिस्सा बन जाते हैं .
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बच्चा जानता है बनाना 
सिर्फ कागज का हवाईजहाज़
कभी कभी बारिश में सपने 
उड़ान को तरसते हैं
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एक दिन वह आई थी 
बारिश में नहाई हुई 
कभी कभी वे भीगे पल 
मन ढूँढता रह जाता है .