शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

कभी कभी : डायरेक्ट दिल से


गुलेल से निकले पत्थर ने 
बेध दी चिड़िया की आँख 
कभी कभी लक्ष्य बेधने के लिए 
अर्जुन नहीं क्रूर होना  ही काफी है .
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कुछ लोग नींद में
लगातार सपने बटोरते हैं
कभी कभी ऐसा लगता है
मेरे सपनों की नींद से अदावत है .
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वह कहीं नहीं है सदेह
फिर भी रहती है आसपास
कभी कभी किसी के होने में
देह कब आड़े आती है .
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पिंजरे में बैठा तोता
आदमी की तरह बोलता है
कभी कभी आजाद हवा में वह
कितना बेगाना हो जाता है .
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अब रोता हुआ बच्चा भी
झुनझुनों से नहीं बहलता
कभी कभी बचकानी ख्वाहिशें
कितनी हाईटेक हो जाती है .
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आजकल कोई बच्चा
आसानी से नहीं सोता
कभी कभी उन्हें सुलाने में
लोरियाँ बेअसर हो जाती हैं .
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जश्न का मौका है
नाचने गाने का दस्तूर है
कभी कभी ऐन मौके पर
कोई गीत याद नहीं आता .
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चिता सज चुकी है आत्मीयजन की
पूरी हो चुकी है प्रस्थान की तैयारी
कभी कभी ऐसे मौके पर
गिरता हुआ सेंसेक्स कितना रुलाता है .
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डाक टिकट लगे लिफाफे में
तुम्हें लिखे खत आजतक रखे हैं
कभी कभी कुछ पैगाम
ऐसे ही अफसाने बन जाते हैं .
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आज पता लगा वह कबूतर तो मर गया
जो तुम तक ले जाता था मेरे खत
कभी कभी किसी के साथ
झूठी उम्मीदें भी मर जाती हैं .
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