सोमवार, 12 अगस्त 2013

कुछ यूं ही लिखी गईं पंक्तियाँ

गमले में खिला है लाल गुलाब
शायद ही किसी ने उसे निहारा
कभी कभी खूबसूरती भी
यूं ही नज़रंदाज़ हो जाती है.
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चिड़िया ले आती है
दबाकर चोंच में चुग्गा
कभी कभी बच्चों के लिए
सुबह आहार बन कर आती है.
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 मैं देर तक चुप बैठा रहा
उसने कहा तुमने कुछ कहा क्या
कभी कभी चुप्पी भी
अपनी बात कह देती है .
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 बीमारी बुढ़ापा और गरीबी देख
राजकुंवर बन गए थे बुद्ध 
कभी प्रबुद्धजनों को  
इतिहास पर यकीन नहीं आता .
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अम्मा हो चली है बूढ़ी
ठीक से चल भी नहीं पाती
कभी कभी ममता भी
ओल्डऐज होम का पता पूछती है .
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चाँद पर चरखा कातती अम्मा का
अब कोई बच्चा नहीं पूछता हाल
कभी कभी बच्चे भी
कितनी जल्द सयाने हो जाते हैं .
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मैं अखिरीबार कब रोया था
मुझे कुछ भी याद नहीं
कभी कभी रोने के लिए
एकांत का टोटा पड़ जाता है .
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मुझे पता है

मुझे पता है कि आसमान का रंग नीला है नीलेपन का यह कौन सा शेड है नहीं मालूम किसी बात के कुछ-कुछ पता होने से कुछ नहीं होता लेकिन ...