शुक्रवार, 25 सितंबर 2015

मेरी कविता में


मैं अपनी कविता में
कभी किसी को नहीं बुलाता।
मेरी कविता में
कोई सायास नहीं आ सकता।
इसमें जिसे आना होता है
वह आ ही जाता है
अनामंत्रित।
जैसे कोई मुसाफिर आ बैठे
किसी पेड़ के नीचे
उसके तने से टिककर
बेमकसद, लगभग यों ही।
बैठा रहे देर तक
अपनी ख़ामोशी को कहता सुनाता।

मेरी कविता में
डरे हुए परिदों और
मायूस बहेलियों के लिए
कोई जगह ही नहीं है।
पर अँधेरे में दिशा भूला
हर परिंदा यहाँ आ कर
जब चाहे अपना बसेरा बना ले।

मेरी कविता में
किसी की कोई शिकायत
आद्र पुकार या चीत्कार
या मनुहार कभी नहीं सुनी जाती।
इसके जरिये वशीकरण का
कोई काला जादू भी नहीं चलता।
यह किसी को कुछ नहीं देती
न कुछ माँगती है।
लेन देन का कारोबार इसे नहीं आता।

मेरी कविता में
कुटिल मसखरे अपनी ढपली
अपना राग लेकर नहीं आते।
न वीरता का परचम लहराते
योद्धाओं के लिए इसमें जगह है।
इसमें कोई मस्त मलंग जब चाहे
अपनी धुन में गाता गुनगुनाता
जब चाहे तब आ सकता है।

मेरी कविता में
इतिहास में रखे
नृशंस राजाओं के ताबूतों को
सजाने के लिए जगह नहीं।
अनाम फकीरों की
गुमशुदा आवाजों को सुनने के लिए
इसके कान तरसते हैं।

मेरी कविता में
ऐसा बहुत कुछ है
जो है परंपरागत समझ से बाहर
पर उपलब्ध सच के आसपास।
सच को सच मानने में
बड़ी दिक्कत है।

यकीन करें
मेरी कविता और मेरी जिंदगी में
बित्ते भर का भी नहीं है। 

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