शुक्रवार, 11 सितंबर 2015

सुबह ऐसे आती है

पुजारी आते हैं नहा धोकर
अपने अपने मंदिरों में
जब रात घिरी होती है.
वे जल्दी जल्दी कराते हैं  
अपने इष्ट देवताओं को स्नान
इसके बाद वे फूंकते हैं शंख
बजाते हैं घंटे घड़ियाल
सजाते हैं आरती का थाल
करते हैं आरती
गाते हैं भजन
उन्हें यकीन है कि
इतने शोरगुल के बाद
सुबह आ ही जायेगी
अँधेरे की चादर के पीछे से.

कमोबेश धरती के सारे धर्म
प्रतिदिन सुबह को औपचारिक रूप से
ऐसे ही बुलाते आये हैं
और उन्हें कलगी वाले  मुर्गे की तरह
सदियों से ग़लतफ़हमी है
कि सुबह उनके सद्प्रयासों से आती  है.

उन्हें नहीं मालूम कि
सुबह इस तरह से
किसी के बुलावे पर कभी नहीं आयी 
वह तो बिन बुलाए आ जाती है
कभी भी कहीं भी
जब कोई मासूम बच्चा नींद में
रात के अँधेरे से डर जाता है.
जब किसी बच्ची का मन
दिन के उजाले में
अपनी गली में इक्क्ल दुक्क्ल
खेलते हुए पूरी धरती को
नापने के लिए मचलता है.
जब रात को खाली पेट सोया आदमी
अपने फर्ज़ी सपनों से बाहर आकर
नए सिरे से जीने का अहद लेता है.

सुबह की पूरी कोशिश रहती है
वह भव्य देवालयों से पहले
जितनी जल्दी हो सके पहुंचे
गंदगी से बजबजाती उन कुरूप बस्तियों में
जहाँ बीमार बच्चों और
सुबकती हुई माओं की
आवाज़ें आती हैं.
और वहां के अंधकार को दे दे
निर्णायक मात.

सुबह बड़ी बिंदास होती है
अँधेरे से उसकी पुरानी अदावत है
वह उसके खिलाफ अपनी लड़ाई
खुद लडती है
और रोज लड़ती है
उसे अपनी लड़ाई में
किसी भी  धर्माचारी की
दखलंदाजी कतई पसंद नहीं.


सुबह उनके लिए बेनागा आती है
जिनके पास करने के लिए
कोई प्रार्थना भी  नहीं है.