गुरुवार, 10 सितंबर 2015

मैं सोचता हूँ ....


मैं प्रेम करते हुए सोचता हूँ
यह प्यार ही है
या देह के भीतर उपजे
किसी हार्मोन की कारस्तानी
कोई किसी की तरफ अकारण
यूं झुका तो नहीं जाता.

मैं प्रेम करते हुए सोचता हूँ
कोई भी काम प्यार की तरह
इतना आसान कैसे हो सकता है
बिना पूर्व तैयारी और रणनीति  के 
प्यार करना तो दूर  
युद्ध तक नहीं लड़े जाते.

मैं प्रेम करते हुए सोचता हूँ
इतनी मुश्किल जिंदगी में
जब खुल कर सांस लेना दूभर हो 
लोग प्यार करने के लिए
कहाँ से निकाल लाते हैं
बचेखुचे समय में से इतना अवकाश

मैं प्रेम करते हुए सोचता हूँ
प्यार करते हुए पूरी कायनात
खुद-ब-खुद क्यों महक उठती है
देह में भरी सारी ऊब कैसे
देखते ही देखते हो जाती
अपने आप वहां से  नदारद .

मैं प्रेम करते हुए सोचता हूँ
देह किस कदर उदार हो जाती है  
बिना जात या धर्म की शिनाख्त किये
डूबने का आतुर हो उठती है
कामनाओं के अथाह  सागर  में
बिना गहराई की थाह लिए.

मैं प्रेम करते हुए सोचता हूँ
बिना प्यार के जिंदगी चल रही थी ठीक ठाक
लेकिन सच यही है कि
स्टैंड पर खड़ी साइकिल की तरह
बस उसका चक्का घूम रहा था
निर्बाध निर्द्वंद लगभग बेमकसद.

मुझे पता है

मुझे पता है कि आसमान का रंग नीला है नीलेपन का यह कौन सा शेड है नहीं मालूम किसी बात के कुछ-कुछ पता होने से कुछ नहीं होता लेकिन ...