मंगलवार, 15 सितंबर 2015

कुछ नहीं पता ....

मसखरा हंसता है धीरे धीरे
बड़ी एहतियात के साथ
उसे पता है ठहाका लगाने पर
बहुत देर तक दुखेगा   
कमर से चिपका पेट
और जर्जर पसलियां.

बब्बर शेर दिखाता है करतब
पूरी मुस्तैदी के साथ
रिंग मास्टर के हंटर की
फटकार का इंतज़ार किये बिना
दोनों को अच्छे से मालूम है
अपने अपने किरदार .

तोते के खेल दिखाती लड़की की
शफ्फाक जांघें कंपकपाती रही ठंड से
वह कम्बल में दुबक कर
चुस्की ले ले पीना चाहती है
गर्म भाप से अंटी चाय
और दिनभर की थकन .

पतली रस्सी पर थिरकते
नर और मादा की शिराओं में
चरमोत्कर्ष पर है उत्तेजना
वे एक दूसरे की ओर देखते
गा रहे हैं मगन होकर
प्यार का कोई आदिम गीत.

सरकस के पंडाल से
रिस रहे हैं तमाशबीन
सधे हुए घोड़े ऊँघ रहे हैं
अपनी बारी का इंतज़ार करते
किसी को  नहीं पता
कल सुबह कैसी होगी.


खोया -पाया

मुझे आज अलस्सुबह पुराने दस्तावजों के बीच एक जर्द कागज मिला दर्ज थी उस पर सब्ज रंग की आधी अधूरी इबारत वह प्रेमपगी कविता नहीं थी, शायद या ...