शुक्रवार, 11 सितंबर 2015

लोग घर वापस जा रहे हैं

लोग घर वापस जा रहे हैं
कंधे पर लटका कर गोलाकार टिफिन
जिसमें अब भी पड़े हैं   
रोटी के कुछ सख्त कुतरे हुए कोने
भूख चाहे जैसी भी हो
बचा रहता है फिर भी कुछ न कुछ.
लोग घर वापस जा रहे हैं
अपने थके हुए हाथ-पैर के साथ
लंबे लंबे डग भरते हुए  
जल्दबाजी है उन्हें वापस लौटने की
लटक जाते हैं वे लपक कर
बस या ट्रेन के पायदान से.
लोग घर वापस जा रहे हैं
बच्चों को सुनाने जीवन अनुभव
रटते अनमोल वचन, हितोपदेश गढ़ते
वे जानते हैं कि उन्हें जरूरत है  
पौष्टिक भोजनसही शिक्षा से कहीं अधिक
जीवन के सच्चे जुझारूपन की.
लोग घर वापस जा रहे हैं
जिंदगी के एक और फिजूल दिन को
अपनी स्मृति से मिटाते   
अपने आप से भीषण युद्ध लड़ते
जिसे अब मात्र सत्रह दिन ही नहीं
चलते रहना है अनवरत सामर्थ्य रहने तक.
लोग घर वापस जा रहे हैं
उंगलियों की लकीरों पर गिनते
साप्ताहिक अवकाश के बचे हुए दिन
मिलने वाले बोनस का जोड़ते हिसाब
क्योंकि उनके लिए जिन्दा बने रहने की  
यही है एक पतली शाश्वत उम्मीद.
लोग घर वापस जा रहे हैं
आराम करने और कल की थकन के लिए
फिर से तैयार होने नहीं
बल्कि इसलिए कि मशीनों को
मिल सके जरूरी आराम
और हो जाए ठीक से उनकी साफ़ सफाई.