गुरुवार, 24 सितंबर 2015

तिलचट्टे

जब इस धरती पर कुछ भी न बचेगा 
तिलचट्टे फिर भी रहेंगे
उनकी अमरता पर कोई विमर्श  नहीं
जबकि आदमी उसे पाने को  
सदियों से जूझ रहा है.

तिलचट्टे बदबू फैलाते
अँधेरे और सीलन में निरंतर पनपते हैं
वे खतरे और रौशनी का सुराग पाकर
भागते हैं आठ पैरों के सहारे  
फिर भी वे मार डाले जाते हैं
तिलचट्टे अमरता को  नहीं जानते .

तिलचट्टे तभी तक हैं बचे हुए
जब तक वजूद है 
घनीभूत कालिमा और कायर आद्रता का
आदमी के पास नहीं है
उनको जड़मूल नष्ट करने की तकनीक
विज्ञानं सम्मत नासमझी  में उनकी जान बसती है.

आदमी जानता है तिलचट्टे की सारी खूबियाँ
फिर भी कतराता है उस जैसा बनने से 
बना सकता है वह चाहे तो  
उसकी हुबहू अनुकृति
पर अजरता के लिए उसे
तिलचट्टा बनना मंजूर नहीं है .

धरती पर जब कुछ न बचेगा
तो ये बचे हुए तिलचट्टे करेंगे
समस्त जल वाष्पित हो जाने के बावजूद
समुद्र मंथन जैसा कुछ
अमृत और विष तलाशेंगे शायद  
तिलचट्टे आदमी बनने की कोशिश करेंगे .