मंगलवार, 1 सितंबर 2015

हस्तिनापुर के सैनिक

हस्तिनापुर से गये थे सैनिक
कुरुक्षेत्र के मैदान में
वहां जाने का मकसद और 
जिंदा बचे रहने की उम्मीद लिए बिना
हालंकि उन्होंने तब तमाम मनाहियों के बावजूद
सपने देखने स्थगित नहीं किये थे.
हस्तिनापुर से गए थे सैनिक
अस्त्र शस्त्र और ढोल नगाड़े लिए
जिनकी उपयोगिता के बारे में
वे सिरे से थे अनभिज्ञ
उनके भीतर बलबला रही थी
मासूमियत से भरी राजभक्ति.
हस्तिनापुर से गए थे सैनिक
अपने बीवी बच्चों को उम्मीद दिलाकर
कि वे जल्द लौट आयेंगे वहां से
विजयघोष करते ध्वजा फहराते
उन्होंने यह सब कहने को कहा था
उनको मालूम नहीं था वापसी का रास्ता.
हस्तिनापुर से गए थे सैनिक
अपने राजा की शान की खातिर
वे वहां धर्म ,और मर्यादा की व्याख्या
सुनने के लिए नहीं आये थे
सारथी कृष्ण ने धनुर्धर पार्थ से क्या कहा
उन्हें उसका कुछ पता नहीं.
हस्तिनापुर से सैनिक खुद –ब-खुद नहीं गए थे
ले जाए गए थे जबरिया हांक कर
उनको तो वहां मरना ही था अंतत:
उनके पास न तो कर्ण जैसे कवच कुंडल थे
न इच्छा मृत्यु का वरदान
न सुदर्शन चक्र ,न कुटिलता का कौशल.
हस्तिनापुर से गए सैनिकों के बारे में
इससे अधिक किसी को नहीं पता
अलबत्ता रजवाड़ों की भव्य वापसी के किस्से
हर किसी ने खूब सुने हैं .
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